आशीष कुमार :
फैजाबाद रेलवे कॉलोनी में रहने वालों के लिए एक कॉलोनी बनाई गई, जिसका नाम 40 क्वार्टर था। जिसमें रेल कर्मचारियों के साथ एक अनोखा रिशता था। यह 40 क्वार्टर आज भी बहुत सारी यादों को अपने साथ समेटे हुए है। इसमें विभिन्न प्रकार की जातियों के लोगों का निवास व जमावड़ा हुआ करता था। सभी रेलवे कर्मचारियों का निवास था। जातियों की बात करें तो मुस्लिम, यादव, पाण्डे, अनुसूचित जातियों, के तथा अन्य जातियाँ भी शामिल थी। इसमें अनुसूचित यानी, हेला, यमुना पारी, चमार, समुदाय की जातियों के लोग ज़्यादा थे। कुछ लोगों ने अपने क्वार्टर के आगे झोपड़ी भी बना रखी थी। सभी बहुत ही खुश मिजाजी के साथ अपना जीवन व्यतीत करते थे। मुझे याद है, मेरे बचपन में हर तरीके के त्योहार यहाँ पर मनाये जाते थे। सावन में एक बड़ा सा नीम का पेड़ हुआ करता था, जो अभी नहीं है। उस नीम पर एक बड़ा सा झूला बँधा हुआ करता था। जिसमें सावन के पूरे एक महीने लोग सावन का मजा लेते हुए पैंग मार कर झूला झूलते थे। इसके साथ ही अन्य त्योहारों का भी एक अलग मजा हुआ करता था। यहाँ के समुदाय के लोगों में होली, दिवाली, ईद, बकरीद व मोहर्रम जैसे त्योहारों का भी चलन था। यहाँ अलग-अलग जाति, धर्म, वर्ग के लोग रहने से इनके बच्चों के बीच बढ़िया दोस्तियाँ हुआ करती थी। साथ में स्कूल जाते, खेलते और घूमने भी जाते थे।
इस कॉलोनी में खुद से नए संबंध बनाने का मौका था। जो मौका अभी धीरे-धीरे कम होते-होते, बहुत कम हो गया है। जिसे लोग बड़े ही धूम-धाम से मनाते आये हैं और अपना जीवन मज़े ले कर जीते रहे। यहाँ के पुराने रेल कर्मचारियों की एक खास बात यह थी, सभी मिलजुल कर प्रेम भाव में रहते हैं। सभी का अपना-अपना काम रहता था, जैसे लाइन मैन, खलासी, सफाई कर्मी, क्लीनिंग मैन, इत्यादि प्रकार के कामगार रहते थे। अपने परिवार के साथ सबका जीवन यापन करते थे।
40 क्वार्टर नाम इसका क्यों था, क्योंकि कामगारों को देखते हुए, ये क्वार्टर बनाये गए थे, जहाँ पर 40 परिवार के लोग रहते थे। पुराने कर्मचारी जैसे-जैसे रिटायर हुए, वैसे ही क्वार्टर जो बनाये गए थे जर्जर होते गए। नई भर्तियों को लाया नहीं गया। इन परिवारों के बच्चों को दुबारा रेल में भर्ती नहीं किया गया। जिसकी वजह से लोग दूसरे कामों में चले गए। इस कॉलोनी की एक खास बात और थी इसको बहुत सोच-समझ कर बनाया गया था। छतों पर जो लेंटर पड़ता था, वो ऐसा लगता था, रेल की पटरियों से छत बनाई गई है, छतों के उपर पानी निकालने के लिए पाइप ऐसी लगी होती थी, जैसे किसी जानवर का मुँह बना होता था। पानी की सप्लाई हमेशा आती रहती थी। पानी जाने के बाद हर घर में हाउदी बनी होती थी। जिसमें पानी स्टोर किया जाता था। जिससे पानी की समस्या कम होती थी। ऐसी बहुत सी सुविधा यहाँ के क्वार्टर मे होती थी। अभी जब से अयोध्या का विस्तार हुआ है, पुराने कर्मचारियों के जाने के बाद इस कॉलोनी की हालत जर्जर हो चुकी है। इस पूरी कॉलोनी को ध्वस्त किया जा रहा है। किसी और के नाम दुबारा अलौट नहीं किया गया। आज हालत यह है कि पूरी कॉलोनी को तोड़ा जा रहा है। बहुत सारे लोग पलायन कर चुके हैं, कुछ लोग जाने को तैयार है, चालीस क्वार्टर अपनी बहुत सी यादें समेट कर अभी खत्म होने की कगार पर है। अभी यहाँ के लोग पूरी तरह से जा चुके हैं, कुछ लगभग 10 क्वार्टर हैं जिनमें कुछ परिवार अभी रह रहे हैं। बस अभी कुछ दिनों तक हैं, 40 क्वार्टर की ये छोटी-छोटी सी यादें अभी नहीं रह गयीं। आस पास के सभी क्वार्टर की यही हालत है। उन सभी को तोड़ा जा रहा है। सुनने में आ रहा है प्लेटफार्म को चौड़ा किया जायेगा, यही कह कर तोड़ा जा रहा है। सफाई कर्मचारियों का एक बड़ा तबका इन क्वाटरों में रहा करता था। जिसमें घरेलू कामगारों का भी रहना इन्हीं जगहों पर था। अभी की अगर बात की जाय तो बहुत सारे पुराने कर्मचारियों को रिटायर होने के बाद जाना था। परन्तु इस जगह पर से काफी यादों को लिए वो जाना तो नहीं चाहते थे लेकिन रेलवे ने अपना विस्तार बढ़ाने के लिए सभी के क्वार्टर को खाली करवा कर तोड़-फोड़ दिया और यहाँ से जाने के नोटिस पकड़ा दिये। जिसकी वजह से यहाँ से सभी को जाना पड़ रहा है। 40 क्वार्टर अब इतिहास होने की तरफ बढ़ चला है। सिर्फ यादों में इसको जिंदा रखा जायेगा।

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