बिन्दु द्वारा संकलित :

सितंबर 2024 में हुई भारी बारिश ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले के रुद्रापुरा गाँव में सहरिया जनजाति के लोगों के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है। यह क्षेत्र पहले से ही जलवायु परिवर्तन और असमान विकास का सामना कर रहा था, लेकिन इस बार की बारिश ने 26 घरों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। इन घरों के विनाश के साथ-साथ महत्वपूर्ण दस्तावेज़ों के नुकसान ने समुदाय के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

सहरिया जनजाति और उनकी जीवनशैली

सहरिया जनजाति भारत की विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूह (PVTG) में से एक है, जो की ऐतिहासिक रूप से जंगल के संसाधनों पर निर्भर रहते थे पर अब मूलतः मज़दूरी से जीवन यापन करते है। मज़दूरी के चलते, सहरिया समाज के लोग निरंतर पलायन करते रहते हैं। घर प्रायः मिट्टी के बने होते हैं, जो पारंपरिक जीवनशैली और पर्यावरण के अनुकूल होते थे, लेकिन आधुनिक समय में यह उनके लिए संकट का कारण बन रहे हैं, खासकर जब अत्यधिक वर्षा होती है।

भारी बारिश का प्रभाव

सितंबर 2024 में लगातार हुई भारी बारिश के कारण मिट्टी के बने घरों को गंभीर नुकसान पहुंचा। गाँव के 26 घर पूरी तरह से ध्वस्त हो गए। इससे न केवल लोगों का निवास स्थान छिन गया, बल्कि उनके जीवन के आधारभूत दस्तावेज़ भी बर्बाद हो गए, जिनमें राशन कार्ड, आधार कार्ड, और अन्य सरकारी प्रमाण पत्र शामिल थे। दस्तावेज़ों के बिना, वह सरकार की विभिन्न योजनाओं से वंचित हो गये हैं।

पर्यावरणीय प्रभाव

रुद्रपुरा और उसके आसपास के क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के कारण असामान्य मौसम पैटर्न का सामना कर रहे हैं। बारिश के कारण न केवल मिट्टी के घर ध्वस्त हो गए, बल्कि फसलों को भी भारी नुकसान हुआ। जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर रहने वाली सहरिया जनजाति को इस प्रकार के मौसम में गंभीर आर्थिक और सामाजिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

आश्रय का अधिकार (Right to Shelter)

भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार नागरिकों को जीवन के आवश्यक तत्वों तक पहुंच का अधिकार देता है, जिसमें आवास का अधिकार भी शामिल है।

आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 (Disaster Management Act, 2005)

आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 (Disaster Management Act, 2005) के तहत राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह प्रभावित लोगों को त्वरित राहत और पुनर्वास प्रदान करे। इसमें समय सीमा भी निर्धारित है, ताकि प्रभावित लोगों को जल्द से जल्द सहायता मिल सके। इस कानून के अंतर्गत कुछ प्रमुख प्रावधान हैं:

  1. आपदा के बाद राहत और पुनर्वास: प्रारंभिक राहत 72 घंटे के भीतर दी जानी चाहिए। आधिकारिक राहत वितरण की प्रक्रिया में 30 से 60 दिनों के भीतर पूरी सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
  2. क़ानूनी दायित्व (धारा 12 and 13): धारा 12: राज्य सरकार को प्रभावित क्षेत्रों में प्रभावित लोगों की स्थिति का मूल्यांकन करना होता है और उस मूल्यांकन के आधार पर राहत कार्य शुरू करने होते हैं। धारा 13: राज्य सरकार को तुरंत प्राकृतिक आपदा से प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास की योजनाएं तैयार करनी होती हैं। यह योजनाएं 30 से 60 दिनों के भीतर पूरी की जानी चाहिए।
  3. दस्तावेजों के पुनर्निर्माण की प्रक्रिया: दस्तावेज़ों का पुनर्निर्माण भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि राशन कार्ड, आधार कार्ड, और अन्य सरकारी दस्तावेज़ों के बिना नागरिक सरकारी योजनाओं से वंचित रह सकते हैं। इन दस्तावेजों के लिए राज्य सरकार को 30 से 45 दिनों के भीतर पुनर्निर्माण प्रक्रिया शुरू करनी होती है।

राहत राशि और सरकारी नीति

राज्य सरकार ने प्रभावित क्षेत्र ग्वालियर में राहत कार्य शुरू ज़रूर किए हैं, जिसमें तत्काल सहायता और राहत राशि वितरण की जा रही है, परंतु रुद्र्पुरा बस्ती के लोग को सरकार से कोई भी राहत नहीं मिली है, अभी तक। लोगों को ये भी डर है की दस्तावेज नष्ट हो जाने के कारण, कहीं सरकार उनकी सहायता करने से इंकार ना कर दे, या राहत राशि के वितरण में प्रक्रियात्मक अड़चले न आए। रूद्रपुरा के समुदाय के पूर्ण पुनर्वास के लिए एक दीर्घकालिक कार्यवाही की आवश्यकता है।

आगे की राह

रुद्रपुरा गाँव के सहरिया जनजाति के लोग वर्तमान में खुद के बनाये अस्थायी शिविरों में रह रहे हैं और सरकार के बनाये कानून का इंतजार कर रहे हैं। राज्य और केंद्र सरकार को तुरंत इस समुदाय के लिए उचित पुनर्वास योजना तैयार करना चाहिए, जिसमें उन्हें न केवल स्थिर आश्रय मिले, बल्कि उनके लिए जीवनयापन के साधन भी सुनिश्चित हों। साथ ही, पर्यावरणीय संरक्षण के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

यह लेख मूलरूप से मीडियम पर प्रकाशित हुआ था।

फोटो फीचर्ड आभार : मीडियम

Author

  • बिंदु/Bindu

    बिंदु हरियाणा के पलवल की रहने वाली हैं। उन्होंने कानून और बाद में मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की है। वर्तमान में वह उत्तरी मध्य प्रदेश में जेनिथ के साथ एक कहानीकार के रूप में काम करती हैं, जहाँ वे जमीनी स्तर की कहानियों को लिखित और दृश्य रूपों में कैद करती हैं।

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