रिया व आकांशा:

प्राचीनकाल में जब लोगोंं की संख्या कम थी और चारों ओर घना जंगल हुआ करता था। उस समय जो कुछ थोड़े बहुत लोग थे, जब वह बीमार होते थे तो उनका इलाज जंगल से प्राप्त जड़ी-बूटियों से किया जाता था। उस समय जो लोग इलाज करने का काम करते थे उन्हें वैद्य या ओझा बोला जाता था। आज भी कईं जगह डॉक्टर को वैद्य बोला जाता है। उस समय यदि किसी व्यक्ति की अकारण मृत्यु हो जाती थी या उसे अचानक कोई बीमारी हो जाती थी तो कहा जाता था उस व्यक्ति पर काला-जादू किया गया है या वह व्यक्ति डायन बन गया है। उस समय लोगोंं में जागरूकता व शिक्षा न होने के कारण लोग इस अंधविश्वास की चपेट में आने लगे। इस अंधविश्वास के चलते जादू-टोना या झाड़-फूक या काला जादू जैसी कुरीतियों की उत्पत्ति हुई और धीरे-धीरे यह कुरीतियाँ बढ़ती गयी और एक समस्या के रूप में उभरती गयी। 20वीं सदी के शुरुआत में झाड़-फूक या जादू-टोना प्रथा बहुत बड़े पैमाने पर फ़ैल चुकी थी जिसका बुरा प्रभाव हमे आज भी समाज में देखने को मिलता है। 

समाज के कुछ पक्ष सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, भौगोलिक परिस्थितियों के कारण आज भी आधुनिकता, शिक्षा, समानता और स्वतंत्रता से वंचित हैं। इस कारण से समाज के कुछ पक्ष आज भी  झाड़-फूक या जादू-टोना या डायन या टोहनी जैसी प्रथाओं का अनुसरण करते हैं। सामान्यत: इस प्रकार की प्रथाओं का शिकार समाज की महिलाओं को बनाया जाता है। जिसके कई उदाहरण मौजूद हैं – 

  • वर्ष 2020 में झारखण्ड के गढ़वा ज़िले में तीन आदिवासी महिलाओं पर आरोप लगाया गया कि वो जादू-टोना करती हैं और इसके चलते गाँव वालों ने उनको बुरी तरह से पीटकर उनकी हत्या कर दी।
  • झारखण्ड के सिंहभूम ज़िले में भी वर्ष 2021 में एक आदिवासी महिला के साथ कुछ ऐसा ही हस्र हुआ। 
  • वर्ष 2021 में असम की एक 63 वर्षीय महिला पर यही आरोप लगाकर उसे नग्न कर पीटा गया फिर सिर काटकर उनकी हत्या कर दी। 
  • वर्ष 2022 केरल राज्य में दो महिलाओं की मानव बलि के रूप में नृशंस हत्या ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। यह यहाँ तक सिमित नहीं है, 
  • राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2022 में, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में मुख्य रूप से जादू-टोना से जुड़े लगभग 85 हत्या के मामले दर्ज किए गए। 

असम, बिहार और तेलंगाना जैसे अन्य राज्यों ने भी इस तरह के मामलों में  रिपोर्ट दर्ज की है। यह सभी वह घटनाएं हैं जो दर्ज की गई हैं, यकीनन ऐसी और भी घटनाएं होंगी जो रिपोर्ट न हो सकीं। हैरानी की बात तो यह है कि कई बार तो झाड़-फूक या जादू-टोना या डायन प्रथा के आरोप की आड़ में महिलाओं के रिश्तेदार ही निजी या पारिवारिक दुश्मनी या बदले के आशय के चलते उनकी हत्या कर देते हैं। इस विषय में एक कहावत “भाई की विधवा ज़मीन में हिस्सा मांगेगी, डायन है मार दो” प्रचलित है। कई स्थानों पर ऐसे मामलें भी सामने आये जहाँ महिलाओं के साथ लैंगिक सम्बन्ध बनाने के लिए जब उन महिलाओं ने मना किया तो लोगों के सामने उनकी छवि बिगाड़ने तथा बदला लेने के उद्देश्य से उनको डायन या चुड़ैल घोषित करके उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करके उनकी हत्या कर दी गयी। 

ऐसी प्रथाओं को रोकने के लिए व इन प्रथाओं को दंडनीय बनाने के सम्बन्ध में भारत में राष्ट्रीय स्तर पर एक विशेष कठोर कानून नहीं है। कुछ राज्यों ने ज़रूर इस विषय पर कानून बनाए हैं। इन कानूनों के होते हुए भी ऐसे मामले सामने आ रहे हैं और लोगोंं के मानव अधिकार विशेषतौर पर महिलाओं के मानव अधिकारों का लगातार रूप से उल्लंघन हो रहा है। 

हालाँकि राष्ट्रीय स्तर पर एक कानून है जो झाड़-फूक प्रथा में उपयोग होने वाली जादुई दवाइयों के प्रचार को रोकने के लिए है। इसके बावजूद भी इस प्रकार की प्रथाओं का प्रचलन निरंतर रूप से हो रहा है।

भारत में इस प्रथा को समाप्त करने  के लिए क्या कानून बनाए गए है?

हमारे देश में आज भी कई राज्यों जैसे बिहार, झारखण्ड, असम, ओड़िसा, केरल एवं अन्य राज्यों में यह प्रथा  प्रचलित है, और इसके चलते आज भी महिलाओं के साथ शारीरिक एवं मानसिक अत्याचार किये जाते हैं एवं उनकी हत्या कर दी जाती है। कई राज्यों ने इस प्रथा को समाप्त करने के लिए कानून बनाए हैं, जो कि निम्न हैं –

  1. बिहार राज्य ने देश में पहली बार इस प्रथा के खिलाफ कदम उठाया और डायन प्रथा निवारण अधिनियम, 1999 बनाया है। जो जादू-टोना या डायन प्रथा पर रोक लगाने एवं इनकी आड़ में किये जाने वाले अपराध, अत्याचार एवं हत्या रोकने के लिए बनाया गया। इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को डायन घोषित करता है या डायन समझता है और इसके चलते उस महिला के साथ शारीरिक व मानसिक अत्याचार करता है या करने का प्रयास करता है तो ऐसे अपराधी को 6 महीनों से लेकर 1 वर्ष तक की सजा हो सकती है और 2000 रूपए तक का जुर्माना भी लग सकता है।
  2. बिहार के बाद झारखण्ड राज्य ने भी इस विषय पर कानून बनाया जो डायन प्रथा निवारण अधिनियम, 2001 है। इस कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को डायन घोषित करता है या डायन समझता है तो उस व्यक्ति को 3 माह तक की सजा हो सकती है और 1000 रूपए तक का जुर्माना हो सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को डायन समझकर उसके साथ शारीरिक व मानसिक अत्याचार करता है तो उस व्यक्ति को 6 माह तक की सजा हो सकती है एवं 2000 रूपए तक का जुर्माना हो सकता है, और यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को डायन समझकर उसके इलाज के लिए उसके साथ शारीरिक अत्याचार व उस महिला को चोट कारित करता है तो उस व्यक्ति को 1 साल तक की सजा हो सकती है एवं 2000 रूपए तक का जुर्माना हो सकता है। 
  3. छत्तीसगढ़ राज्य ने भी इस प्रथा को रोकने के लिए कानून बनाया गया है जो छत्तीसगढ़ टोनही प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2005 है। इसके तहत यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन घोषित करता है या डायन समझता है तो उस व्यक्ति को 3 साल तक की सजा हो सकती है एवं जुर्माना भी लग सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन समझकर उसके साथ शारीरिक व मानसिक अत्याचार कारित करता है, तो उस व्यक्ति को 5 साल तक की सजा हो सकती है, एवं जुर्माना भी लग सकता है। यदि डायन समझकर उसके इलाज के लिए उसके साथ जादू-टोना, या अन्य कोई तंत्र-मंत्र की क्रिया करता है तो उसे कठिन कारावास के साथ 5 साल तक की सजा हो सकती है, एवं जुर्माना भी लग सकता है।
     
  4. राजस्थान में भी वर्ष 2015 में इस समस्या के निवारण के लिए एक कानून बनाया गया जो राजस्थान डायन-प्रताड़ना निवारण अधिनियम, 2015 है। इसके प्रावधानों के तहत यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन घोषित करता है या डायन समझता है तो उस व्यक्ति को 1 साल से लेकर 5 साल तक की सजा हो सकती है, एवं 50,000 रूपए तक का जुर्माना भी लग सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन समझकर उसके साथ शारीरिक व मानसिक अत्याचार करता है तो उस व्यक्ति को 5 साल से लेकर 7 साल तक की सजा हो सकती है, एवं 50,000 रूपए का जुर्माना भी लग सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन समझकर उसके इलाज के लिए उसके साथ झाड़-फूक,जादू-टोना, या अन्य कोई तंत्र-मंत्र की क्रिया करता है तो उसे कठिन कारावास के साथ 1 साल से लेकर 7 साल तक की सजा हो सकती है एवं 50,000 रूपए का जुर्माना भी लग सकता है। 
  5. असम में भी वर्ष 2015 में इस समस्या की रोकथाम के लिए कानून बनाया गया जो कि डायन शिकार (प्रतिषेध, रोकथाम और संरक्षण) अधिनियम, 2015 है इस कानून में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन घोषित करता है या डायन समझता है तो ऐसे अपराधी को 3 साल से लेकर 7 साल तक की सजा हो सकती है एवं 50,000 से लेकर 5,00,000 रूपए का जुर्माना भी लग सकता है, यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन समझकर उसके साथ शारीरिक व मानसिक अत्याचार कारित करता है या उस व्यक्ति की हत्या करता है तो ऐसे अपराधी को भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 [वर्तमान में भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 103(1)] के तहत मृत्यु दंड या जीवनकाल का कारावास हो सकता है एवं जुरमाना भी लग सकता है, यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन बताकर उस व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिए मजबूर करता है तो ऐसे अपराधी को मृत्यु दंड या जीवनकाल का कारावास या 20 वर्ष तक की सजा हो सकती है और 1,00,000 से लेकर 5,00,000 रूपए तक का जुर्माना भी लग सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन समझकर उसके साथ शारीरिक व मानसिक अत्याचार कारित करता है तो ऐसे अपराधी को कठिन कारावास के साथ 5 साल से लेकर 10 साल तक की सजा हो सकती है एवं 1,00,000 से लेकर 5,00,000 रूपए तक का जुर्माना भी लग सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन बताकर उसकी मर्यादा भंग करता है या उसे नग्न होने के लिए विवश करता है या नग्न अवस्था में पैदल चलने को विवश करता है तो ऐसे अपराधी को 5 साल से लेकर 10 साल तक की सजा हो सकती है एवं 10,000 से लेकर 50,000 रूपए तक का जुर्माना भी लग सकता है। यदि कोई व्यक्ति किसी भी व्यक्ति को डायन बताकर उसके साथ अत्याचार (जैसे- पत्थर मारना, उल्टा लटकाना, चेहरा काला करना, नाक काटना, सर मुंडवाना, मल खिलाना, आदि, घिनौने काम जो एक मानव की मर्यादा व इज्ज़त को भंग करते है) कारित करता है तो ऐसे अपराधी को 5 साल से लेकर 10 साल तक की सजा हो सकती है एवं 50,000 से लेकर 1,00,000 रूपए तक का जुर्माना लग सकता है। 
  6. रास्ट्रीय स्तर पर सिर्फ एक कानून है जिसमें झाड़-फूक के नाम पर लोगों से पैसे एठना व उनके विश्वास के साथ होने वाले खिलवाड़ करने जैसे अपराध के खिलाफ प्रावधान दिए गए है यह औषधी और चमत्कारिक उपचार (आक्षेपणीय विज्ञापन) अधिनियम, 1954 है इस कानून में प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी ऐसी दवाई या उपचार का विज्ञापन करता है जो किसी झाड़-फूक जैसे प्रक्रिया से सम्बन्ध रखती है तो उस व्यक्ति कोई 6 महीनों से लेकर 1 साल तक की सजा हो सकती है और साथ में जुर्माना लग सकता है। 

झाड़-फूक या जादू-टोना का आदिवासी समुदायों पर क्या प्रभाव पड़ता है?

जादू-टोना प्रथा का समाज पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है, विशेष रूप से इसका प्रभाव आदिवासी समुदायों में देखने को मिलता है क्योंकि – 

  1. आदिवासी समुदाय आज भी जंगल में निवास करते हैं और अपने जीवन यापन के लिए जंगल के प्राक्रतिक संशाधनों पर ही आश्रित रहते हैं। सामान्यतः आज भी लोगों की धारणा है कि भूत, पिशाच, डायन, चुड़ैल आदि जंगलों में निवास करते हैं चूंकि आदिवासी लोग आज भी उन जंगलों में ही रहते है तो आदिवासी लोगों को ही भूत, पिशाच, डायन, चुड़ैल समझा जाता है और आदिवासी समुदायों में से भी मुख्यतः महिलायें ही इस प्रकार की प्रथाओं के नाम पर मानव प्रताड़ना और मानव हत्या की शिकार बनती हैं क्योंकि पुराने समय से ही लोगों के दिमाग में यह अवधारणा है कि डायन या चुड़ैल या भूत एक महिला ही हो सकती है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि ऐसी महिलाएं जिनके पास थोड़ा बहुत पैसा या ज़मीन-जायदाद होती है उनसे उनकी ज़मीन और पैसे हड़पने के लिए उन्हें चुड़ैल या डायन घोषित कर दिया जाता है ताकि उनकी हत्या करके उनकी सम्पति उनसे छीन ली जाये। 
  2. बीमारियों का इलाज करने की आड़ में महिलाओं को शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। डायन, चुड़ैल, शैतान जैसे नाम देकर समाज में उनकी बेज्जती की जाती है और कई बार तो उनकी हत्या तक कर दी जाती है। 

समाज में इस प्रथा के कारण बड़े पैमाने पर मानव अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है जो कि एक गंभीर मुद्दा है। इस प्रकार की प्रथाओं या इस प्रकार की गतिविधियों के खिलाफ भारत सरकार को राष्ट्रीय स्तर पर कठोर कदम उठाना चाहिए। भारत सरकार को झाड़-फूक या जादू-टोना या डायन या टोहनी प्रथा को अपराध घोषित कर इसे समाप्त करने एवं ऐसे अपराध करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान लागू करने की आवश्यकता है। यह भी आवश्यक है कि सरकार जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों में भी इसके प्रति जागरूकता लाने पर काम करे। लोगों को इन गतिविधियों के खिलाफ आवाज़ उठाने को प्रेरित करने के लिए काम किया जाए। इन झाड़-फूक या जादू-टोना जैसी प्रथाओं में लोग अपना समय व पैसा व्यर्थ ना करे इसके लिए लोगों में जागरूकता लाने पर काम करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही आदिवासी समाज को भी इन प्रथाओं के खिलाफ व इन प्रथाओं की आड़ में लोगों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाने एवं इसको समाप्त करने के लिए एकजुट होकर काम करने की आवश्यकता है। 

Authors

  • रिया खत्री / Riya Khatri

    रिया, मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले से हैं और जेनिथ संस्था के साथ एक पैरालीगल के तौर पे काम करती हैं। रिया को कोरियन सिरीज़, लोग बहुत पसंद है। उन्हें चेस खेलना एवं किताबे पढ़ना पसंद है।

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  • आकांक्षा राजावत मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले की निवासी है। आकांक्षा कानून की विद्यार्थी है और वर्तमान में कानून की पढाई की द्वितीय वर्ष की छात्रा है। आकांक्षा को पढाई के साथ-साथ कला और शिल्प एवं रचनात्कमक चीज़ें बनाने में भी रुची है।

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