रिया खत्री एवं रोहित:
हाल ही में हमारे देश में तीन नये आपराधिक कानून लागू हुए हैं, जो कि भारतीय दण्ड संहिता 1860 (IPC), दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 (CrPC) एवं भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 (IEA) को निरस्त करके क्रमशः भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, एवं भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 के रूप में लागू किये गये है। इन नये कानूनों में कई नये प्रावधान बनाये गये हैं। कुछ नई कृत्यों को भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है। यह नये कानून सुधारात्मक विचारधारा, पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने, पीड़ित व्यक्ति के कल्याण, पीड़ित व्यक्ति को आर्थिक सहायता दिलाने के दृष्टिकोण से बनाये गये हैं। इसी मंशा से भारतीय न्याय संहिता, 2023 में एक नया अध्याय जोड़ा गया है जो विशेष रूप से महिलाओं एवं बच्चों के साथ हुए अपराधों के विषय में बात करता है। इस लेख के द्वारा हम इन नये कानून में महिलाओं के प्रति अपराधों के सम्बन्ध में बनाये गये प्रावधानों के बारे में जानेंगे –
महिलाओं के प्रति अपराध व अपराधों के दंड –
वैसे तो पुराने कानून भारतीय दण्ड संहिता, 1860 में भी महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों के लिए प्रावधान थे लेकिन सजा के लिए इतने कठोर प्रावधान नहीं थे। नये कानून भारतीय न्याय संहिता 2023 में भी महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के लिए न्यूनतम 10 वर्ष की सज़ा का प्रावधान है जिसे आजीवन कारावास या मृत्यु दंड तक बढ़ाया जा सकता है। और इस नये कानून में पीड़िता को अपराधी से मुआवज़ा दिलवाने एवं इलाज के लिए आर्थिक सहायता के लिए भी अलग से प्रावधान किये है।
यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को उससे शादी करने का झांसा देकर उस महिला के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाता है, तो इसे नये कानून के तहत इसे अपराध माना जायेगा। इस अपराध के लिए अपराधी को 10 साल तक की सजा का प्रावधान है। महिलाओं के प्रति हो रहे अन्य अपराधों जैसे- किसी महिला के साथ दहेज के लिए क्रूरता या दहेज मृत्यु कारित करना, किसी महिला का पीछा करना, किसी महिला की बिना अनुमति के उस महिला के निजी फोटोज खींचना, आदि के लिए भी इस नये कानून में कम से कम 10 वर्ष तक की सज़ा का प्रावधान है, जिसे आजीवन कारावास या मृत्यु दण्ड तक बढ़ाया जा सकता है।
बच्चों के प्रति अपराध व अपराधों के दंड
भारतीय न्याय संहिता 2023 में 16 साल से कम उम्र की लड़की के साथ बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के लिए कम से कम 20 वर्ष की सज़ा का प्रावधान दिया गया है, जो अधिकतम आजीवन कारावास या म्रत्यु दंड तक बढ़ सकती है। इसके साथ ही पीड़ित को अपराधी से मुआवज़ा दिलवाने एवं इलाज के लिए आर्थिक सहायता दिलाने हेतु भी प्रावधान बनाए गये हैं। इस नये कानून में यह भी प्रावधान है कि यदि कोई व्यक्ति किसी बच्चे से बाल मज़दूरी करवाता है तो ऐसे व्यक्ति को कम से कम 3 वर्ष तक की सज़ा हो सकती है एवं आर्थिक दंड के भी प्रावधान है।
इन तीनों नये कानून के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान-
- समय की बचत – इन नये कानून में कई ऐसे प्रावधान हैं जो कि निश्चित करते हैं कि समय को व्यर्थ किये बिना अभियोजन की प्रक्रिया या पुलिस की जाँच-पड़ताल को सही ढंग से किया जा सके। इसके लिए नया कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में जीरो एफ.आई.आर. (Zero FIR) के सम्बन्ध में प्रावधान बनाया गया है जिसमें कोई भी पीड़ित किसी भी अपराध की एफ.आई.आर. किसी भी पुलिस थाने में दर्ज करा सकता है। अर्थात जब किसी व्यक्ति के साथ कोई अपराध होता है और कई बार उसे पता नहीं होता कि किस पुलिस थाने में उसको जाकर रिपोर्ट लिखवानी चाहिए, किस पुलिस थाना का क्षेत्राधिकार कहाँ तक है, इसकी जानकारी न होने के वजह से एफ.आई.आर. लिखवाने में लोगों को समस्या होती थी। लेकिन इन नये कानून ने इस समस्या को ख़त्म कर दिया है। अब कोई भी पीड़ित व्यक्ति, किसी भी पुलिस थाना में उसके साथ हुए अपराध की रिपोर्ट लिखवा सकता है ताकि किसी भी अपराध की जाँच पड़ताल होने में देरी ना हो और समय पर उचित कार्यवाही की जा सके।
- पारदर्शिता – इन नये कानून के अनुसार पीड़ित व्यक्ति एवं आरोपी दोनों को ही एफ.आई.आर. की प्रतिलिपि पुलिस अधिकारी द्वारा नि:शुल्क प्रदान की जाएगी। पुलिस द्वारा की गयी जाँच-पड़ताल की सूचना भी पीड़ित व्यक्ति को एवं आरोपी दोनों को ही प्रदान की जाएगी। यह पहल पुलिस अधिकारी के कार्य शैली में पारदर्शिता लाएगी और पीड़ित व्यक्ति को न्याय मिलने में एवं अपराधी को पकड़ने में और भी आसानी होगी। और इसके साथ ही पुलिस अपनी रोजनामचा (डायरी) की जानकारी भी सम्बंधित मजिस्ट्रेट को भेजेगी, जिससे मजिस्ट्रेट को भी पुलिस अधिकारी के जाँच पड़ताल के बारे में जानकारी रहेगी।
- पीड़ित व्यक्ति के अधिकार – यह नये कानून पीड़ित व्यक्ति के हित को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हैं। जैसे, किसी अपराध की एफ.आई.आर. की कॉपी पीड़ित व्यक्ति को दी जाएगी और पीड़ित व्यक्ति को यह भी अधिकार होगा कि वह सरकारी वकील के अलावा अपनी इच्छा अनुसार कोई दूसरा वकील भी चुन सकता है। और यदि लोक अभियोजक अभियोजन को वापस लेना चाहते हैं, तो इससे पहले न्यायालय द्वारा उस अभियोजन में पीड़ित व्यक्ति को भी सुनने का अधिकार भी इस नये कानून में दिया गया है और उसको सुनने के बाद ही न्यायालय उस अभियोजन में अपना फैसला देगा। इन नये कानूनों में महिलाओं के प्रति अपराध के खिलाफ़ जो भी जुर्माना लिया जायेगा वो पीड़िता को मुआवजे के रूप में दिया जायेगा।
- पीड़ित की सुरक्षा – भारतीय न्याय संहिता, 2023 में बलात्कार पीड़िता का कथन या तो महिला मजिस्ट्रेट के द्वारा लिया जायेगा और यदि महिला मजिस्ट्रेट की उपलब्धता नहीं है तो मजिस्ट्रेट के साथ एक महिला की उपस्तिथि में बलात्कार पीड़िता का कथन लिया जायेगा, और यह कथन ऑडियो या विडियो के रूप में भी लिया जा सकता है।
- टेक्नोलॉजी का उपयोग – इन तीनों नये कानून में टेक्नोलॉजी के उपयोग का भी ज़िक्र किया गया है। इसके लिए, कानून में भी प्रावधान बनाये गये हैं। जैसे कि अब कोई भी पीड़ित व्यक्ति फ़ोन के माध्यम से भी ई-एफ.आई.आर. दर्ज करवा सकता है। और पुलिस जाँच के दौरान अपनी प्रत्येक रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को ऑडियो या विडियो के रूप में भी भेज सकती है और यह रिपोर्ट शिकायतकर्ता को भी भेजी जायेगी। अभियोजन के दौरान साक्ष्य की प्रस्तुति भी इलेक्ट्रॉनिक डिवाइज़स के द्वारा की जा सकती है।
नये कानून की आलोचना
इन नये कानूनों में कई ऐसे प्रावधान बनाये गये हैं जो कि समय पर न्याय मिलना सुनिश्चित करता है। इन नये कानून में महिलाओं एवं बच्चों के प्रति बढ़ रहे अपराधों को लेकर कठोर कदम उठाये गये हैं। महिलाओं एवं बच्चों के साथ हो रहे अपराध के लिए ऐसे कठोर कानून की आवशयकता भी है। तकनीकी के इस युग को ध्यान में रखते हुये, इन नये कानून में तकनीकी का इस्तेमाल करने को प्रोत्साहन दिया गया है जो कम समय में उचित कार्यवाही करने एवं न्याय दिलाने में मददगार साबित होगा। दूसरी ओर इन नये कानूनों की आलोचना भी की जा रही है क्योंकि:
- इन नये कानून में महिलाओं एवं बच्चों के लिए तो अलग से प्रावधान बनाये गये हैं, लेकिन इसमें LGBTQIA+ समुदाय के लोगो के साथ हो रहे अपराधों के खिलाफ कोई प्रावधान नहीं दिये गये हैं जो कि यह इशारा करता है कि या तो कानून बनाने वाले लोग LGBTQIA+ समुदाय के लोगों के अस्तित्व को नकार रहे हैं या फिर यह कानून LGBTQIA+ कम्युनिटी के लोगों के साथ हो रहे अपराधों को नज़रंदाज़ कर दिया है। लेकिन सम्पूर्ण देश के लोग जिनके लिए यह कानून बनाये गये है उनके लिए तो मानव जाति की प्रत्येक मानव का समकक्ष महत्त्व है और LGBTQIA+ कम्युनिटी के लोगों का भी वही अस्तित्व है जो एक आम महिला या पुरुष का है और जो अधिकार अन्य व्यक्तियों के पास हैं, वही अधिकार LGBTQIA+ कम्युनिटी के लोगों के पास भी होने चाहिए। उनके भी हितों का संरक्षण होना चाहिए। सरकार के पास यह एक अच्छा मौका था जहाँ हम एक समावेशी समाज का उदहारण पेश कर सकते थे। लेकिन एक बार फिर से उनके अस्तित्व को नज़रअंदाज़ कर दिया गया है।
- नये कानून में वैवाहिक बलात्कार के सम्बन्ध में कोई प्रावधान नहीं हैं जबकि इस प्रकार की घटानाएं बड़े स्तर पर होती हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनयेफएचएस) के अनुसार, वर्ष 2019–2021 के बीच 18- 49 वर्ष की आयु की विवाहित महिलाओं में से 32% ने अपने वर्तमान पतियों द्वारा शारीरिक, यौन या भावनात्मक हिंसा का अनुभव किया। इतने बड़े स्तर पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ़ सुरक्षा और संरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है।
- नये कानून में जीरो एफ.आई.आर. दर्ज करने का प्रावधान तो बना दिया लेकिन इसके के बाद क्या होगा, कितने दिनों में जानकारी सम्बंधित पुलिस थाने के पास भेजी जाएगी, इस सम्बन्ध में कोई उल्लेख नहीं किया गया है।
- इसके साथ ही नये कानून में पुलिस के लिए यह आवशयक नहीं है कि उन्हें तुरंत ही एफ.आई.आर. दर्ज करनी पड़ेगी। जबकि पुराने कानून में यह प्रावधान था कि जब भी कोई संज्ञेय अपराध करीत होता था, जो पुलिस को रिपोर्ट दर्ज करना ही पड़ता था। लेकिन नये कानून के तहत पहले अपनी तरफ से जाँच करने के बाद, घटना के 15 दिन में एफ.आई.आर. करना है। रिपोर्ट दर्ज करने में यह देरी कई तरह से महिलाओं के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।
- नये कानून में कम गंभीर अपराध के लिए सज़ा के तौर पर अपराधियों से सामाजिक कार्य, सामाजिक सेवा करवाने की सजा का प्रावधान है जो कि एक दृष्टिकोण से सही साबित हो सकते हैं। लेकिन एक दृष्टिकोण से गलत भी साबित हो सकता है क्योंकि यदि किसी अपराध के लिए अपराधी को कोई भी सजा नहीं दी जाएगी भले ही वह अपराध छोटा अपराध क्यों न हो, तो प्रत्येक व्यक्ति छोटे-मोटे अपराध करने के बारे में सोचेगा और ये सुधार की जगह अपराध करने में लिप्त हो जायेगा जो कि समाज और देश के लिए हर प्रकार से घातक है।
- हमारे देश में अभी कईं पुलिस थाने इतने दूर-दराज़ एवं पहाड़ी इलाकों एवं जंगलों में बने हुए हैं, जहाँ बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। हमारे न्यायालयों में स्टाफ की कमी है, उपकरणों का अभाव है, पुलिस कर्मचारियों के पास उचित प्रशिक्षण का अभाव है। इन सभी खामियों के बावजूद यह देखना है कि किस प्रकार से तकनीकीकरण का उपयोग करके नागरिकों की न्याय तक पहुँच को बढ़ा सकते हैं।
तीन नये आपराधिक कानून – भारतीय न्याय संहिता 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023, महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराधों पर कठोर प्रावधान लाने के साथ-साथ पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा और न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। हालांकि, इन कानूनों में LGBTQIA+ समुदाय के अधिकारों और वैवाहिक बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दों पर विचार नहीं किया गया है। इन कानूनों की सफलता और प्रभावशीलता इस पर निर्भर करेगी कि कैसे इन्हें लागू किया जाता है और कैसे न्यायपालिका और कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ इनका पालन सुनिश्चित करती हैं।

Leave a Reply