नंदिनी शर्मा :
कभी-कभी बातों से लड़-झगड़कर उलझनों में गुम हो जाते हैं….
सब की खुशी का ध्यान कर फिर न जाने क्यों हम ही उदास रह जाते हैं
मम्मी-पापा का अभिमान हम बखूबी रखते हैं,
इस मान का मान रखते हुए अपने सपनों-खुशी को छोड़
उनके देखे हुए सपनों की जिम्मेदारी का बोझ उठा लेते हैं……
सभी की खुशी का ध्यान रखते-रखते अपने लिए समय निकालना भूल जाते हैं
जो सपने देखते हैं, हमारा उन पर चलना मुश्किल हो जाता है
और ज्यादा मुश्किल तब होता है,
जब हमारे सपने हमारे ही मम्मी-पापा को फ़िज़ूल लगते हैं
और उनके देखे गए सपनों हमेशा सही लगते हैं,
जिसके पीछे हमें चलना पड़ता हैं
हमारी खुशी नहीं, हमारी जिम्मेदारी समझकर…..
इस जिम्मेदारी के लिए हम अपने सपनों को खुद में समेटकर कहीं गुम हो जाते हैं
नहीं समझ आती वो चीजें जो मम्मी-पापा ने देखी हैं हमारे लिए, अपने सपने के रूप में……
हाँ मानते हैं वो हमें खुश देखना चाहते हैं
फिर न जाने क्यों हमारे सपनों में वो खुशी नहीं देख पाते हैं..
उनकी फिकर जायज़ है यह मानती हूँ मैं,
पर नहीं समझते वो उन सपनों को जिसमें बस्ती खुशी हमारी है…
हमारी खुशी को तोड़कर, वह डाल देते बोझ अपने सपनों का हैं
और फिर कहते हैं आगे तुम खुश रहोगे,
बिना जाने के क्या यह सच होगा,
हम बस उनके सपनों के साथ आगे बढ़ जातें हैं…………..
उनके आगे नहीं बोल पाते हैं हम
क्योंकि उनके मान की भी तो जिम्मेदारी हमारी है…..
फिर चुन ही लेते हैं जिम्मेदारी को
ओर चल पड़ते हैं उस ऊंचे सपनों को पूरा करने में
जो सिर्फ एक जिम्मेदारी हमारी है…!
जो सिर्फ एक जिम्मेदारी हमारी है…!

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