आधारशिला बालिकाएं :

युवानिया का यह विशेष अंक, हाशिये पर मौजूद समुदायों के अधिकारों की लड़ाई में अपना जीवन लगा देने वाले खेमराज भाई को समर्पित है। खेमराज भाई की पाँचवी पुण्यतिथि के मौके पर उनके साथ काम चुके साथियों और उन्हें जानने वाले प्रियजनों और दोस्तों ने इस अंक में उनकी यादों को साझा किया है। लड़कियों की शिक्षा पर खेमराज भाई ने खूब काम किया और चित्तौड़गढ़ की भदेसर तहसील के अमरपुरा गाँव में आधारशिला बालिका आवासीय शिक्षण केंद्र नाम से एक आवासीय स्कूल शुरू किया जिसमें वंचित परिवारों की लड़कियों को निशुल्क शिक्षा दी जाती है। यह लेख इसी आधारशिला स्कूल से पूर्व में पढ़ चुकी लड़कियों और वर्तमान में पढ़ रही लड़कियों की स्मृतियों का एक संग्रह है। खेमराज भाई के संघर्षों में उनकी साथी रही सुमन जी और उनकी बेटी प्रेरणा जो वर्तमान में आधारशिला स्कूल संचालित कर रहे हैं ने, लड़कियों के इन लेखों का संकलन किया है।

कमला, कक्षा 5:

मैंने बासा (खेमराज जी) को कभी देखा नहीं लेकिन उनके बारे में सुना ज़रूर है। सब बोलते हैं कि वो गरीबों की मदद करते थे। उन्होंने खाट आन्दोलन के जरिये जाति आधारित शोषण जैसे मुद्दे भी उठाये। बासा गरीब के घर जाकर उन्हें गेहूँ, तेल, समान देते थे। बड़े होते-होते हमें ये सुनने मिला कि खेमराज बासा को कैंसर हो गया, इतनी बड़ी बीमारी में भी वो गरीबों के लिए काम करते रहे। बीमारी में भी इलाके के बूढ़े व अन्य लोगों ने इलाज कराने के लिए जो बासा को पैसे दिए थे, उन पैसों को बासा ने एक बीघा ज़मीन ख़रीद कर आधारशिला स्कूल बनाने में लगा दिया। वो मानते थे कि स्कूल बन जाने से सभी लड़कियों को पढ़ने में सहयोग होगा। अगर बासा स्कूल नहीं बनवाते तो शायद आज वो ज़िन्दा होते, लेकिन बीमारी के नाते वो हमारे बीच नहीं रहे।

गायत्री नायक, कक्षा 10:

हम खेमराज बासा को तब से जानने लगे जब वे हमारे गाँव कुरेठा में आकर मीटिंग करते थे। तब मैं ग्यारह साल की थी। बासा मीटिंग में सभी बड़े-बूढों को बोलते थे कि तुम अपने बच्चों को पढ़ने के लिए हमारे स्कूल भेजो। तब मेरे गाँव से पाँच लड़कियाँ आधारशिला स्कूल में पढ़ती थी। वो सभी बोलती थी कि स्कूल बहुत अच्छा है और वहाँ अच्छे से पढ़ाते भी हैं। खेमराज बासा बहुत ही अच्छे और ईमानदार आदमी थे। वो हमेशा ही हर बात को बहुत आसान करके, अच्छे से समझाते थे और कभी गुस्सा नहीं करते थे हम पर।

वो गाँव-गाँव जाकर मीटिंग करते थे। वो सभी को एक समान मानते थे और सबको मिलकर रहने के लिए भी बोलते थे। बासा लोगों की बहुत सेवा करते थे और सभी को आगे बढ़ने का मौका भी दिया करते थे। मुझे खेमराज बासा की यह बात अच्छी लगती थी कि वो गरीब औरतों की स्थिति ठीक ना होने के कारण, उन औरतों के लिए खाने का सामान देते थे और उनका सहयोग करते थे।

कैंसर का इलाज करवाने के लिए जो उनके सहयोगियों ने पैसे जुटाए थे, सभी को बासा ने खुद पर ना खर्चा कर, स्कूल बनवाने में लगा दिया। वो मानते थे कि उनके बच्चे पढ़ें और आगे बढ़ें। हम सब मिलकर बासा का सपना पूरा करेंगे। बासा से यह सीख मिली कि हम भी बढ़े होकर उनके जैसा बने, लोगों को जागरूक करें व उनका सहयोग करें। मैं यह हमेशा अपने जीवन में याद रखूंगी।

बासा आज जहाँ भी रहे भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दे।

सुशीला भील, कक्षा 5:

मैं 8 साल की थी जब खेमराज बासा से मिली। बासा पढ़ाई की बात बताते थे। वह गाँव में आन्दोलन करते थे। गाँव में भेदभाव होता था, नीची जाति के लोगों को खाट पर बैठने नहीं देते थे, उनको उठा दिया जाता था। फिर बासा को यह बात पता लगी तो उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर इसके बारे में बात करी, और सभी को जागरूक करके खाट आन्दोलन भी किया। बासा हमें बहुत अच्छे से रखते थे।

मनीषा मीना, कक्षा 5:

खेमराज बासा का जन्म 1 जून 1951 में हुआ था। मैं खेमराज जी बासा को कभी मिली नहीं, मैंने उनकी सिर्फ फोटो ही देखी हैं। बासा ने गाँवों के लोगों की समस्या में उनकी मदद की है। गाँव-गाँव में जब वो घूमते थे, तो बासा सभी माँ-बाप को बोलते थे कि अपनी लड़कियों को पढ़ने के लिए स्कूल भेजो। उन्होंने लड़कियों को पढ़ाने के लिए स्कूल भी खोला। वो सभी को जागरूक करने का प्रयास करते थे। सुमन माई हमको बासा के कहानियाँ बताती है और स्कूल के बारे में भी बताती हैं। उन्होंने खाट आन्दोलन जैसे बड़े काम भी किए हैं और गाँव-गाँव में ज़रूरतमंद परिवारों को कंबल भी बांटे हैं। उनसे मिली सीख को हम लोगों को बतायेंगे और अपने गाँव की सभी लड़कियों को भी पढ़ने में मदद करेंगे। अच्छे से पढ़कर हम आधारशिला स्कूल का नाम रोशन करेंगे।

केसर मीना, कक्षा 8:

मेरे ननिहाल में, मेरी मौसी आधारशिला स्कूल में पढ़ती थी। मौसी मेरी मम्मी को भी बोला करती थी कि तू भी अपनी लड़कियों को मेरे साथ पढ़ने के लिए भेज दे। उनसे उनकी बात सुनकर मेरी बड़ी बहन को यहाँ पढ़ने भेज दिया। मेरी बहन ने आधारशिला में पाँच साल तक रह कर, अपनी पढ़ाई की। फिर मेरी बहन ने मुझे यहाँ भेज दिया। तब मैं 8 साल की थी जब बासा से मिली थी। बासा हमें घूमने के लिए ले जाते थे। वो, बेर खाने के लिए हम सबको अमरपुरा गाँव में ले जाते थे। खेमराज बासा एक अच्छे व्यक्ति थे और लोगों के बारे में बहुत सोचते थे, व उनको जागरूक कर, उनकी समस्या में भी मदद करते थे।

मैं इस तरह खेमराज बासा को जान पायी। मुझे उनकी ये बात अच्छी लगती थी कि वो बोलते थे कि तुम पढ़ोगे तभी तो आगे बढ़ोगे और कुछ कर पाओगे। सबको मदद करने वाले बासा से मुझे भी ये सीख मिली कि हमें भी दूसरों की मदद करनी चाहिए एवं हमें एक-दूसरे के साथ सदाचार का व्यवहार करना चाहिए। हम सभी लडकियाँ, पढ़-लिखकर बासा, सुमन माई, पलका दीदी एवं आधारशिला स्कूल का नाम रोशन करेंगे और बासा के जैसे दूसरों की मदद भी करेंगे व शिक्षा के प्रति उनको जागरूक करने के काम भी करेंगे।

निकिता कुंवर, कक्षा 8:

मेरे घर के पास एक लड़की, लीला भील रहती है, जो आधारशिला स्कूल से पढ़ी हुई है। जब खेमराज जी बासा एक दिन उसके घर आये थे, तब मैं पहली बार उनसे मिली। उस दिन मैं स्कूल नहीं गयी थी और घर के बाहर खेल रही थी। बासा ने मुझे बुलाया और पूछा कि मैं स्कूल जाती हूँ क्या। जब मैंने उनको बोला हाँ, मैं जाती हूँ तो बासा ने मुझसे अ से ज्ञ तक वर्णमाला बोलने के लिए बोला। जब मैं उनको बोली कि मुझे ये नहीं आता है तो बासा मुझसे पूछे कि मैं कितने साल की हूँ और कौन सी कक्षा में पढ़ती हूँ। तब में सात साल की थी और तीसरी कक्षा में थी। यह सुनकर बासा ने मेरे माता-पिता को बुलाकर उनसे बात की और मुझे यहाँ (आधारशिला स्कूल) लेकर आ गए। ऐसे मेरा बासा से परिचय हुआ। उन्होंने गरीब परिवारों के लिए बहुत काम किया और इस इलाके में बहुत सारे आन्दोलन भी किये।

बासा हमेशा बोलते थे कि अगर पढ़ोगे नहीं तो खेत में काम करोगे, मज़दूरी करोगे… अगर पढ़ोगे तो कुछ बन सकोगे और आगे बढ़ पाओगे, अपने हक़-अधिकार आदि कार्यों के लिए लड़ सकोगे।

कांता भील, कक्षा 10:

एक बार बासा हमारे गाँव में नारायणी दीदी के घर आये थे। उस दिन हम स्कूल नहीं गए थे और बाहर खेल रहे थे। हमको खेलते हुए देख कर खेमराज जी ने नारायणी मैडम से पूछा कि ये लड़कियाँ किनकी है और ये स्कूल जाती हैं या नहीं। तब नारायणी जी ने उन्हें बताया कि हम लोग का नाम स्कूल में तो लिखाया हुआ है, पर हम लोग कुछ दिन जाते हैं स्कूल और कुछ दिन नहीं भी जाते हैं। खेमराज जी बासा मेरे घर आये और मेरा और मेरी छोटी बहन का खेलते हुए का फोटो खींचा और साथ ही हमारे घर का भी फोटो लिया। फिर बासा ने घर पर चाय पी और हमारे मम्मी-पापा से बात करी, कि हम आपकी लड़कियों को हमारे साथ लेकर जाएंगे। तब मम्मी ने कहा कि हम इनको यहाँ स्कूल भेजते हैं, फिर भी ये नहीं जाती हैं। इनको मार-मार कर भेजने पर भी आधी छुट्टी में वापिस घर आ जाती हैं और फिर वापिस स्कूल नहीं जाती हैं। यह बात करके, बासा ने हमसे पूछा कि तुम दोनों मेरे साथ चलोगी? मैं तुम्हें पढ़ने के लिए ले जाऊँगा और तुम्हे कपड़े, खाना, और खेलने के लिए खिलौने दूंगा। हम दोनों बहनें जल्दी से नहा-धोकर तैयार होकर, किसी से बिना पूछ के, खेमराज जी के साथ जाने के लिए उनकी बोलेरो में जाकर बैठ गए। बासा और हमारे माँ-बाप तो शायद सोचे बैठे थे कि लड़कियाँ शायद कहीं जाकर छुप गयी हैं…फिर उन्हें पता चला कि हम जाने के लिए बोलेरो में तैयार बैठी हैं। तब हमारी मम्मी ने एक थैले में कपड़े भरकर, हमको लाकर दिया। जब हम आधारशिला आये थे तब मेरी छोटी बहन हीरा 8 साल की थी और मैं 10 साल की। हम 2016 में यहाँ आ गए थे।

मुझे बासा से ये सीख मिली है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाई आये, हमें उन कठिनाइयों का सामना करके आगे बढ़ना चाहिए। मेरी पढ़ाई में मुझे चाहे जितनी भी मुश्किल आये, फिर भी मैं अपनी पढ़ाई पूरी करुँगी और मेरे साथ की बाकी लड़कियों को भी जोड़ने के प्रयास करुँगी। अगर बासा हमे यहाँ पढ़ने के लिए नहीं लाते तो हमारा पता नहीं क्या होता, हम भी गाँव की लड़कियों की तरह ही होती। बासा और सुमन माई और पलका दीदी को मैं कभी नहीं भूलूंगी। अगर यह मुझे नहीं पढ़ाते तो मुझे भी मेरे बड़ी बहनों की तरह दुःख-दर्द झेलने पड़ते। अब तो हमारे खेमराज जी बासा नहीं रहे इस दुनिया में। पर उनकी यादें और सीख मैं अपने जीवन में हमेशा याद रखूंगी।

आशा मीणा, कक्षा 12:

हमारे गाँव की लड़कियाँ खेमराज बासा के स्कूल में रह कर पढ़ाई करती थी। गाँव की लड़कियाँ अकसर बोलती थी कि बासा के स्कूल में पढ़ाई बहुत अच्छी होती है। तब मैं भी आधारशिला में पढ़ने आई लेकिन तब मैं बहुत छोटी थी, मुझे यहाँ बासा ने नहीं रखा। फिर एक साल बाद मैं वापिस से फिर से इस स्कूल में आई फिर मुझे यहाँ रखा तब से मैं खेमराज जी बासा को जानने लग गयी। खेमराज जी बासा गाँव-गाँव जाकर लोगों को जागरूक करते थे अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए तैयार करते थे। गाँव से लड़कियों को पढ़ाने लाते थे। खेमराज जी बासा हमेशा हम लोगों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। उन्होनें बहुत से लोगों का भविष्य बनाया था, वह मेरे लिए एक भगवान की तरह थे। खेमराज जी बासा बहुत ही साधारण, सरल और दयाभाव वाले इंसान थे। आज भी खेमराज जी बासा को हम सभी बहुत याद करते हैं। बासा से मिलकर मुझे यह सीख मिली कि मैं भी अपने समाज की मदद कर सकती हूँ और एक अच्छी सामाजिक कार्यकर्ता बन सकती हूँ। मैं भी बासा की तरह स्कूल चलाऊँगी और लड़कियों को पढ़ाऊँगी। खेमराज बासा हम सब के लिए पिता समान थे।

गुड़िया और सपना, कक्षा 5:

गुड़िया और सपना वर्ष 2020 में आधारशिला स्कूल में आई थी। वे बताती हैं कि दोनों ने खेमराज बासा को देखा नहीं है, लेकिन उनके बारे में सुमन माई, गाँव वालों से से हमने सुन रखा है। बासा गरीबों की बहुत मदद करते थे। वे लड़कियों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करते थे वे हमेशा चाहते थे कि गाँव की सभी लड़कियाँ पढ़ाई करें और स्कूल जाएँ। बासा हमेशा दूसरों के लिए सोचते थे। गाँव में जाकर बैठक भी करते थे, उन्होने कई आंदोलन भी किए, वे गाँव में भेदभाव को खत्म करना चाहते थे। हम सब बासा को बहुत याद करते हैं, आज बासा के बनाए हुये स्कूल में रहकर हम सब पढ़ाई कर रहे हैं।

तन्नु मीणा, जेट की तैयारी :

जब 2011 में आधारशिला स्कूल आई थी तब मैं 6 साल की थी, मैं उस वक़्त पहली कक्षा में थी। मेरी दीदी पहले से इस स्कूल में पढ़ाई कर रही थी। खाने के लिए राशन हो या ठंड के दिनों में कंबल बाँटना हो, बासा ज़रूरतमंद लोगों की हर संभव मदद करते थे। बासा ने कभी भी अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं की, उनका व्यवहार सबके साथ अच्छा था। वे लड़कियों की पढ़ाई के बारे में ज़्यादा सोचते थे, वे चाहते थे कि लड़कियाँ पढ़ाई कर बहुत आगे बढ़े। मुझे बासा से यह सीख मिली कि हमें हमेशा दूसरों की मदद करनी चाहिए, हमें लोगों को शिक्षा की तरफ जागरूक करना चाहिए। हमें सभी के साथ अच्छा व्यवहार एवं गरीबों की सेवा करनी चाहिए। हम सभी लड़कियाँ पढ़-लिख कर बासा, सुमन माई, पलका दीदी एवं आधारशिला स्कूल का नाम रौशन करेंगे।

भगवती मीणा, कक्षा 8 :

मैं जब 10 साल की थी तब मैं खेमराज बासा से मिली। खेमराज बासा ने स्कूल खोली थी जिसमें मेरी बहन पहले से पढ़ाई कर रही थी। बासा ने यह स्कूल सिर्फ लड़कियों की पढ़ाई के लिए ही खोली थी, वे चाहते थे कि सभी लड़कियाँ पढ़ाई करें। बासा और सुमन माई दोनों गाँव में साथ जाते थे। वे जाकर गाँव में लड़कियों को और उनके माता-पिता को समझाते थे कि पढ़ाई कितनी ज़रूरी है। मैंने बासा से यह सीखा कि मैं भी उनकी तरह लोगों को जागरूक करूंगी। गाँव में कोई लड़की पढ़ नहीं रही है तो उन्हें पढ़ने के लिए कहूँगी। गरीब लोगों की सेवा करूंगी।

हीरा भील , कक्षा 10 :

जब बासा मेरे गाँव पहली बार आए थे, तब मैं 8 साल की थी। उनकी बात मुझे आज भी याद है जब उन्होनें गाँव में बोला था कि यदि किसी भी घर की एक बेटी पढ़ जाएगी तो उसकी अगली सात पीढ़ियाँ भी पढ़ेगी। वे शिक्षा के बारे में हमारे मम्मी-पापा से भी बात करते थे। बासा की सारी बातें मुझे याद हैं, वे हमेशा गरीबों की मदद करते थे, उनकी ज़मीन के हक़ के लिए लड़ा करते थे। मुझे बासा की यह बात अच्छी लगती है कि बासा हमेशा आगे की ओर बढ़ने के लिए कहते थे और कभी पीछे मुड़कर न देखने की बात हमेशा लड़कियों को कहते थे।

देवू कुमारी भील, स्नातक (1 साल):

मैं देवू कुमारी भील खेमराज जी बासा के बारे में बताना चाहती हूँ कि वो एक ऐसे व्यक्ति थे जिसने लोगों को एक बेहतर इंसान बनाया। उन्होने ऐसे कई लोगो को ज़मीन दिलवाई और उनके हक-अधिकार के लिए लड़ाई लड़ी। मेरी पहली बार बासा से तब मिली थी जब मेरे अंकल की लड़की आधारशिला में पढ़ती थी, उसका नाम संतोष कुमारी भील था। उसे देख कर मैंने भी बोला कि ममी मुझे भी पढ़ने जाना है, लेकिन तब मेरी मम्मी ने मना कर दिया था क्यूंकि उस समय मैं छोटी थी, फिर भी मैं दो महीने बाद आधारशिला स्कूल आ गई थी। मेरे साथ मेरे गाँव की एक लड़की भी आई थी। हमे शुरू में एक-दो दिन तो अच्छा नहीं लगा पर फिर कुछ दिनों के बाद मेरा मन यहाँ पर लग गया। बासा का व्यवहार बहुत अच्छा था, उन्होंने हमें बहुत कुछ सिखाया और वो हमें घुमाने भी ले जाते थे।

मेरे साथ वो लड़की जो आई थी उसका नाम हुडी था, वो बहुत रोती थी और कहती थी कि मुझे यहाँ पर नहीं रहना क्यूंकि मेरा मन यहाँ पर नहीं लग रहा है। फिर वो अपने घर वापस चली गई, और मैं भी उसके साथ चली गई बिना किसी से पूछे। बासा दूसरे दिन मेरे गाँव आ गए और पापा से बातचीत की कि आपकी लड़की वापस आ गई। उन्हें देख के मैं डर के मारे गर में घुस गई, लेकिन बासा ने मुझे प्यार से समझाया और कहा कि पढ़ेगी तो तेरा समाज में नाम होगा। बासा हर व्यक्ति को बेहतर बनाने वाले इंसान थे, ऐसे कई लोग है जिनको बासा ने पढ़ाया और आज उनकी वजह से वो अच्छी पोस्ट पर हैं। ऐसी कई लड़कियाँ भी हैं जो कुछ न कुछ कर रही हैं, वो सिर्फ बासा की वजह से है।

बासा ने जो स्कूल खोला है वो सिर्फ ज़रूरतमंद बालिकाओं के लिए है, जो आज भी चल रहा है। बासा ने लोगों को ज़मीन दिलवाने के लिए ना जाने कितनी मार खाई, फिर भी उन्होंने हर लड़ाई को लड़ा। सब लोग गाँव क्षेत्र में बासा को याद करते हैं। जब भी हम गाँव जाते हैं तो कई लोग बोलते हैं कि बासा ने बहुत मदद की, तब हम बहुत परेशानी में थे और बासा ने हमें खाने के लिए अनाज दिया। वो सभी लोगो का भला चाहते थे, बासा ने कई सफल आंदोलन भी किए और लोग उनके साथ खड़े रहते थे। बासा लोगों के लिए काम करते और लोग अपने आप बासा के साथ जुड़ जाते थे। सर्दी में भी बासा हर बार किसी न किसी गाँव में ज़रूरतमन्द लोगों को ओढ़ने के लिए कंबल और पहनने के कपड़े दे के आते थे। बासा ने लिटने ही लोगों को शिक्षा से जोड़ा, आज हम कुछ बोल रहे हैं या किसी भाषण प्रतियोगिता में हिस्सा लेते हैं तो सिर्फ बासा की वजह से। उन्होंने ही सबसे पहले हमारे मन से डर को निकाला।

बासा एक बेहतरीन इंसान थे, उन्होंने क्षेत्र के हर व्यक्ति को जागरूक किया, ऐसी कई लड़कियाँ हैं जिनके माता-पिता दोनों ही नहीं थे लेकिन बासा ने उन्हें स्कूल में पढ़ाया और उनको अपने माता-पिता से भी अच्छा रखा। उन्होने बालिकाओं की बहुत ही मदद की चाहे वो शिक्षा से हो, अनाज से या अन्य किसी तरह से, हर चीज में बासा ने मदद की। सबसे बड़ी बात यह है कि वो लोगों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करते थे, चाहे वो छोटा बच्चा भी क्यूँ न हो, वो गंदा भी होगा तो भी बासा उसको गोदी मे उठा लेंगे। बासा की हर सोच, हर विचार लोगों को आगे बढ़ाने का संदेश देता है। बासा का हर संघर्ष हर व्यक्ति के लिए महत्वपूर्ण है। बासा की खासियत थी कि वो बच्चों के साथ खुद बच्चे बन जाते थे, उनको देखकर हम सब बहुत खुश होते थे। मैंने भी बासा की किताब को पढ़ा भी है और देखा भी है, उन्होंने कई महिलाओं जिनको टी.बी. की बीमारी थी, उनका इलाज करवाया था, उन्होंने महिलाओं की भी बहुत मदद की। मैं बासा को बहुत-बहुत धन्यवाद देना चाहती हूं… बासा जैसे गुरु को मैं कभी भी नई भूल सकती, उनके बारे में जितना भी लिखूँ उतना कम होगा, काश वो आज भी इस दुनिया में होते! बासा ने हमें सब कुछ दिया और वो जिसे हम कभी भूल नहीं सकते वो है उनकी दी हुई शिक्षा। उनका स्कूल आज भी चल रहा है, जिसका नाम हैं बालिका आवासीय आधारशिला आवासीय बालिका शिक्षण केंद्र और ये राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले की भदेसर तहसील के अमरपुरा गाँव में स्थित है।

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