भंवर मेघवंशी:

मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में अलीराजपुर से 16 किलोमीटर पैदल चलने पर जो गाँव आता था, वहाँ के निवासी खेमला और शंकर दोनों आदिवासी थे। गाँव का नाम था- छोटी गेंदरा। खेमला और शंकर से दोस्ती बना कर ही खेमराज चौधरी इस गाँव में बस गये थे। वह आदिवासियों की तरह रहते। उनके साथ पहाड़ों, नदियों व जंगलों से वन उपज इक‌ट्ठी करते। ज़मीन पर सोते। वह वही करते जो आदिवासी लोग करते थे। वही चीजें खाते जो वहाँ का आदिवासी समाज खाता। खेमराज जो राजस्थान के निम्बाहेड़ा-चित्तौड़गढ़ गाँव के चौधरी और कॉलेज से ग्रेजुएट थे, जिन्होंने वामपंथ को पी रखा था, क्रांति की बातें करते थे, जिसने समाज कार्य एवं अनुसंधान केंद्र तिलोनिया में काम किया, जिसने शंकर सिंह को रामलीला में जोकर की भूमिका करते देखकर उसकी अभिनय प्रतिभा को परखा तथा तिलोनिया ले जाकर सामाजिक कार्य से जोड़ा, वह अब तिलोनिया छोड़ कर अलीराजपुर के जंगलों के आदिवासी गाँवों में डोलता फिरता था। वह आदिवासियों को क्रांति के लिए संगठित कर रहा था। 80 के दशक में समाज कार्य के क्षेत्र में खेमराज किसी नायक से कम न थे।

जब तिलोनिया में काम करते-करते शंकर सिंह, अरुणा रॉय और निखिल डे ने कुछ नया, कुछ अलग करने का मानस बनाया तो उन्हें शंकर सिंह द्वारा सुनाए गए वो किस्से याद हो आए, जो शंकर सिंह ने इससे पहले एक बार अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान अलीराजपुर के छोटी गेंदरा में अनुभव किए थे।

हुआ यह कि जब तिलोनिया से खेमराज चौधरी अलीराजपुर के आदिवासियों के मध्य काम करने पहुँचे तब उन्हें एक न्यूनतम मानधन तिलोनिया संस्था द्वारा मिलता था, हालाँकि यह कोई प्रोजेक्ट नहीं था, महज नए इलाके में काम शुरू करने के लिए एक प्रोत्साहन राशि थी, जिसके जरिए वे अपने पाँव वहाँ जमा पाते। किसी अवसर विशेष पर कोई कार्यकर्ता तिलोनिया से छोटी गेंदरा पहुँच जाता था। एक बार खेमराज चौधरी ने वहाँ पर ‘आदिवासी जंगल मेला’ आयोजित किया। इसके लिए तिलोनिया से पूरी कम्युनिकेशन टीम को बुलाया गया, लेकिन गए सिर्फ शंकर सिंह ही। इस मेले में करीब एक हजार आदिवासी विभिन्न गाँवों से आए थे। उन दिनों छोटी गेंदरा तक न तारकोल की सड़क थी और न ही लाइट। इसलिए रात में उजाले के लिए किसी टेंट हाउस से किराए पर लाए गए पेट्रोमेक्स जलाए गए। लकड़ी के खंभे गाड़कर उन पर पेट्रोमेक्स लटका दिए गए। आदिवासी समाज की खासियत है कि वे कितने भी पैदल चलकर आए हों, उत्सव, पर्व, मेलों के मौकों पर घंटों नाचना उनका प्रिय काम है। जीवन को कम ज़रूरतों व उत्सवधर्मिता के साथ जीना कोई आदिवासियों से सीखना चाहे तो सीखा जा सकता है।

शंकर सिंह के जिम्मे पेट्रोमेक्स जलाए रखने की जिम्मेदारी थी। रात भर लोग नाचे-गाये, दूसरे दिन लोगों ने अलग-अलग पेड़ों तले बैठ कर समूहों में मीटिंगे की। छोटी गेंदरा के ग्रामीणों ने अपने-अपने घर ले जा कर इन आगंतुकों को खाना खिला दिया था। जब पूरे मेले के खर्चे का हिसाब हुआ तो वह था मात्र 80 रुपए। यह भी पेट्रोमेक्स का किराया चुकाने की वजह से हुआ खर्च था, वरना खर्च के नाम पर बिल्कुल शून्य ही हिसाब आता।

शंकर सिंह ने आदिवासी जंगल मेला के दौरान देखा कि आदिवासी आपस में मिलने पर न हाथ जोड़ रहे थे, न पैर छू रहे थे। मु‌ट्ठी बाँध कर उसे आसमान में उठाते हुए एक दूसरे को ‘ज़िंदाबाद’ कह रहे थे। शंकर सिंह को यह थोड़ा अजीब लगा क्योंकि ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ तो उन्होंने सुना था, पर यह सिर्फ ‘ज़िंदाबाद’ किसकी और क्यों? फिर भी गाँवों से आए आदिवासी जिस हिम्मत और अभिमान के साथ ज़िंदाबाद बोल रहे थे, वह उन्हें बहुत भाया। बाद में उन्होंने खेमराज से इसका मर्म जाना कि आदिवासी लोग ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ पूरा नहीं बोल सकते हैं, इसलिए सिर्फ ‘ ज़िंदाबाद’ बोला जाता है, पर इसका मतलब तो वही इंकलाब ज़िंदाबाद ही है। इस ज़िंदाबाद बोलने ने क्षेत्र के आदिवासियों को बड़ी ताकत दी है, क्योंकि इसके पहले सार्वजनिक परिवहन की बसों में सीट पर बैठे आदिवासी को कोई भी खड़ा कर देता था, लेकिन जब से इन्होंने मु‌ट्ठी बाँधकर ज़िंदाबाद कहना सीखा है, तब से वे बस में सवार होते ही मुट्ठी बाँधकर सीना तानकर मुँह फाड़कर एक बार ज़िंदाबाद बोल देते हैं। उस बस में सवार अन्य आदिवासी उसी तरह से मु‌ट्ठी हवा में लहराते हुए ‘ज़िंदाबाद’ का जवाब ज़िंदाबाद में दे देते हैं। इसका ज़बरदस्त असर हुआ है। अब किसी गैर आदिवासी या शहरी की इतनी हिम्मत नहीं है कि इन मुट्ठी तानकर ज़िंदाबाद बोलते आदिवासियों को सीट से उठा दे। इस ज़िंदाबाद ने आदिवासियों को ताकतवर बनाया है और अत्याचार व शोषण करने वालों में दहशत भर दी है। यह क्रांतिकारी परिवर्तन है।

शंकर सिंह को यह संबोधन बहुत अच्छा लगा। उन्होंने यह भी देखा कि बिना प्रोजेक्ट बहुत ही कम संसाधनों में भी हजारों लोग इकट्‌ठा हो सकते हैं। उनके मेले और मीटिंगें हो सकती हैं। आखिर मात्र 80 रुपए में एक हजार लोगों का मेला हो गया था, जो पूरी एक रात व दूसरे दिन शाम तक चला। लोग आए भी, गाए भी, खाए भी, सोचे भी, नाचे भी और अपने अधिकारों की बातें भी की।

इस मेले में आकर उन्होंने घर-घर खाना खाने के तरीके को भी सीखा। सादगी व कम खर्च की भी शिक्षा मिली, वरना एक हजार लोगों का मेला लगाने के लिए लोगों को लाने, ले जाने का वाहन खर्च, टेंट, माइक खर्च, सोने के बिस्तर और खाने का खर्च मिलाकर लाख रुपए से कम तो क्या खर्च होता, पर यहाँ तो सिर्फ 80 रुपए में ही मेला हो गया था।

शंकर सिंह को संगठन बनाने का, काम करने का यह मॉडल बहुत पसंद आया। यहाँ के अनुभव उन्होंने तिलोनिया जाकर अपनी संस्था में तो सुनाए ही, अरुणा रॉय व निखिल डे को भी सुनाए। अब तीनों की उत्सुकता चरम पर थी, तीनों ही तय कर चुके थे छोटी गेंदरा जाकर कुछ समय खेमराज के ‘मज़दूर किसान खेडुत संगठन’ के साथ काम किया जाए।

अंतत: 1986 में ये लोग ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी रास्ता पार करते हुए खेमराज के पास छोटी गेंदरा पहुँच गए। अब तक खेमराज का संगठन यहाँ ठीक-ठाक स्थापित हो चुका था। खेमराज चौधरी, उनकी पत्नी अनिता, अमित, राहुल बैनर्जी और एक इंजीनियर साथी वहाँ रहने लगे थे। ये सभी लोग छोटी गेंदरा की सरकारी स्कूल के एक कमरे पर कस्वा किए हुए थे। स्कूल में कुल जमा दो कमरे थे। दूसरे कमरे में एक शिक्षक रहते थे, जो मूलतः उत्तर प्रदेश के थे। स्वभाव से एकदम कंजूस, पूरे मक्खी-चूस। शिक्षक बड़े अजीब इंसान थे। खुद स्कूल के कमरे पर काबिज थे, बच्चों को बाहर पेड़ तले पढ़ाते थे। पूरे दिन बनियान और धारीदार चड्‌डी पहने रहते थे। जब शंकर सिंह, अरुणा रॉय व निखिल डे वहाँ रहने लगे तो उस टीचर से एक बार पूछा गया, “मास्टर जी, आप चड्‌डी-बनियान में क्यों रहते हैं?” मास्टर का जवाब था, “मैं जिन आदिवासियों के बच्चों को पढ़ाता हूँ, वो तो सिर्फ लंगोट लगाते हैं। इसलिए मैं भी उनकी तरह ही चड्‌डी में रहता हूँ, ताकि अलग नज़र न आऊँ।” पर उनका चड्‌डी-बनियान में रहने का असली कारण उनकी कंजूसी था। वे कभी कभार ऑफिस के काम से अथवा अपने घर जाने या शहर जाने को निकलते तब पैंट शर्ट पहनते। इस तरह मात्र एक ड्रेस में उनके कई साल निकल जाते। ऐसे थे मास्टर जी। वैसे उनको खेमराज और उनके संगठन तथा सामाजिक परिवर्तन की बातों से भी कोई लेना-देना न था।

एक बार की बात है, जैसा कि क्रांतिकारियों, एक्टिविस्टों और बुद्धिजीवियों की आदत होती है, दिन भर और कई बार देर रात तक विभिन्न मुद्दों पर बहस करते रहते हैं। एक रात देर तक शायद दो या तीन बज रहे होंगे रात के, तब तक देश दुनिया में हुई क्रांतियों पर बहस चल गई। एक से एक धुरंधर ने क्रांति पर अपने विचार रखना शुरू कर दिया। माहौल काफी गर्म था। अब आई क्रांति… तब आई क्रांति की गरमागरम बहस चल रही थी। तभी मास्टर जी ने कमरे का दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोलते ही उन्होंने अंदर प्रवेश करके कहा, “माफ कीजिए, क्या आपकी क्रांति आज की रात रूक सकती है? दरअसल मुझे सुबह ऑफिस के लिए जल्दी बस पकड़नी है, पर मैं आपकी क्रांति की बहस के कारण सो नहीं पा रहा हूँ। मुझे माफ कीजिए, अगर आपकी क्रांति आज की रात रुक जाती हो तो मेरे लिए बहुत अच्छा रहता।”

सारे लोग स्तब्ध । मास्टर जी ने यथार्थ का ऐसा चाबुक मारा कि सारे क्रांतिकारी चारों खाने चित्त। उस वक्त तो बहस खत्म कर दी गई, सुबह मास्टर जी अपने समय पर बस पकड़ पाने में कामयाब हो गए, लेकिन बाद के दिनों में यह सवाल एक व्यंग्योक्ति बन गया कि भाई साहब, आपकी क्रांति आज की रात रूक सकती है क्या, क्योंकि मुझे सोना है !

खेमराज चौधरी के साथ अरुणा रॉय और निखिल डे लंबा टिके। शंकर सिंह ने एक महीने का वक्त वहाँ गुज़ारा, इस दौरान सबने बहुत कुछ सीखा। एक घटना तो यादगार बन गई, खेमराज के साथ ये लोग कई पहाड़ियाँ उतरते-चढ़ते अपरान्ह के वक्त एक गाँव में पहुँचे जहाँ कुछ गाँवों के आदिवासियों की एक मीटिंग होनी थी। पहाड़ों की चढ़ाई, उतराई और फिर चढ़ाई…. बेहद बकाऊ सफर के बाद अंततः पहुँच जाने की खुशी और वहाँ एक पेड़ तले बैठे कुछ आदिवासियों को देखकर क्रांतिकारी साथियों को अच्छा लगा कि चलो मेहनत कामयाब हुई। इतना चलकर आए तो मीटिंग तो हो जाएगी। जब और लोगों के आने के बारे में पूछताछ की गई तो पता चला कि अभी सब आ जाएंगे। कोई रास्ते में है, तो कोई जंगल में, तो कोई खेत में। बस आने ही वाले हैं। आते रहेंगे, इसलिए मीटिंग शुरू की जा सकती है। मीटिंग शुरू हुई।

खेमराज ने मीटिंग रखने का उद्देश्य बताना शुरू किया ही था कि एक आदिवासी ने मीटिंग में प्रवेश किया। आदिवासियों में एक परंपरा है कि जैसे ही कोई नया व्यक्ति प्रवेश करता है, वह घेरे में बैठे हरेक व्यक्ति को जाकर नमन करता है। परंपरानुसार उस आदिवासी ने वहाँ मौजूद हरेक व्यक्ति के सामने आकर ज़िंदाबाद कहा, खेमराज को अपना उ‌द्बोधन रोक देना पड़ा। जब वह व्यक्ति बैठ गया तो खेमराज शुरू हुए- “हम इसलिए आए हैं ताकि आप लोगों के हक की बात आज की जा सके…।” तब तक दो और आदिवासी आ गए, उन्होंने भी एक एक को ज़िंदाबाद कहा, उनके बैठने पर खेमराज फिर से बोलने लगे, लेकिन वे अपना वाक्य पूरा कर पाते इससे पहले ही कुछ और आदिवासी आ गए। उन्होंने भी एक एक के सामने जाकर ज़िंदाबाद कहा, खेमराज फिर शुरू हुए, फिर कुछ और लोग आ गए। फिर संबोधन, फिर ज़िंदाबाद, खेमराज अपने आने का मकसद पूरा कर पाते, इसके बीच में कई लोगों का आगमन हो गया। बार-बार के व्यवधान से बात पूरी ही नहीं हुई। लेकिन खुशी की बात यह थी कि लगभग पाँच बजते-बजते मीटिंग में अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई। लोगों का आना भी रूक सा गया। ऐसा लगने लगा कि सूर्यास्त से पहले एक दो घंटे अच्छी बातचीत हो जाएगी। खेमराज ने इस बार पूरी तसल्ली और आत्मविश्वास के साथ बात शुरू कर दी। सब कान लगाकर सुन रहे थे। शंकर सिंह अन्य साथियों को भी मजा आ रहा था। चलो देर से ही सही, लेकिन मीटिंग जम गई थी।

अचानक वहाँ बैठे आदिवासियों में से किसी एक ने अजीब सी आवाज़ निकाली। बस फिर क्या था, सब लोगों ने अपने अपने तीर कमान संभाले और आसमान में देखते हुए अजीबोगरीब हुई… हुरं की आवाज निकालते हुए भागने लगे। मीटिंग उखड़ गई। अफरातफरी मच गई। खेमराज और उनके साथी कुछ समझ पाते इससे पहले ही सब लोग आसमान में तीर बरसाते हुए भाग खड़े हुए। मीटिंग स्थल पर बच गए सिर्फ खेमराज के साथ आए लोग और आदिवासी युवक खेमला। किसी को भी कुछ भी समझ नहीं आया। सबके दिमाग में एक ही सवाल या, आखिर यह हुआ क्या है? इतनी मेहनत से पैदल चलकर बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग करने आए। पहले तो ‘ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद’ ने बात न होने दी और अब यह आसमान में क्या आफत आ गई कि सब उसके पीछे भागने लगे। उस दिन शाम होने तक मीटिंग में आए आदिवासी किसी आसमानी चिड़िया के पीछे भागते रहे।

मीटिंग स्थल पर बचे रह गए एकमात्र आदिवासी युवक खेमला ने बाद में बताया कि आसमान में किसी को उस वक्त जो चिड़िया दिखाई दी, वह बहुत दुर्लभ है। उसके पंखों से धनुष का तीर बनता है, जो कि प्रत्येक आदिवासी के लिए बहुत ज़रूरी होता है। इस चिड़िया का निकलना, दिखना बहुत शुभ माना जाता है। इसलिए उसके दिखाई पड़ते ही किसी ने आदिवासी जुबान में विशेष हर्षध्वनि की और उक्त चिड़िया का नाम लिया। बस फिर क्या था, सब दौड़ पड़े। वैसे भी वहाँ मौजूद आदिवासियों के लिए संगठन की मीटिंग से ज़्यादा महत्वपूर्ण तो उस चिड़िया के पंख थे, इसलिए सब उठ खड़े हुए और चिड़िया का शिकार करने की कोशिश करने में लग गए।

खेमराज के साथ गए शंकर सिंह व अन्य साथी इस घटना से हतप्रभ थे। उनके लिए इतनी दूरी की यात्रा के बाद मीटिंग न होने का दुःख था, लेकिन आदिवासियों में दुर्लभ चिड़िया के दिख जाने का उल्लास था। इनका दिन भले ही खराब हुआ हो, उनका तो दिन सफल हो गया था।

इस तरह क्रांति, समाज परिवर्तन, ढाँचा बदलने, नया समाज बनाने की बातों व प्रयासों के मध्य शंकर सिंह का भी झाबुआ के छोटी गेंदरा आना जाना लगा रहा। वे अब तक भी तिलोनिया संस्था के सक्रिय पूर्णकालिक कार्यकर्ता थे। उनका परिवार भी तिलोनिया संस्था परिसर में ही रहता था, जबकि अरुणा रॉय ने तिलोनिया संस्था को छोड़ दिया। निखिल डे भी उन्हीं के साथ थे। सबका मन झाबुआ के आदिवासियों के मध्य लगने लगा। खेमराज के काम की एप्रोच आकर्षित करने वाली थी, लेकिन दो तरह के अंतर्द्वदों ने उन्हें छोटी गेंदरा का स्थायी बाशिन्दा बनने में रूकावट पैदा कर रखी थी।

पहली बात तो ‘समानता’ का जो क्राइटेरिया था, वह ग्रहण करने से, आत्मसात करने या स्वीकारने से ज़्यादा थोपने जैसा था। जैसे कि छोटी गेंदरा की रसोई में एक ही किस्म की काली दाल सुबह और शाम हर रोज़ बनती थी क्योंकि इलाके में ज़्यादातर लोगों को वही दाल खाने को मिलती थी, इसलिए सहजता से मिल सकने वाली हरी सब्जियों से भी परहेज किया जाता था। चाय भी काली बनती थी। गुढ़ खाने की मनाही थी। तर्क यह था कि आदिवासियों को यह नहीं मिलता है। सादगी के नियम अति कठोर थे, जिनका पालन कठोरता से किया जाता था। लेकिन वह मन में नहीं उतर पाया था, इसलिए जब भी कार्यकर्ताओं में से कोई शहर जाता तो वहाँ पूरी भड़ास निकलती। जो भी मिलता, दबाकर खाया जाता। जिन चीजों को समानता के लिए गाँव में छोड़ा, वही शहर में जमकर खाई जाती। यह सादगी न केवल गैरज़रूरी बल्कि अव्यवहारिक भी थी।

लगभग ऐसा ही नियम वहाँ काम करने के लिए दिए जाने वाले मानधन को लेकर भी था। उन दिनों न्यूनतम मज़दूरी 7 रुपए प्रतिदिन थी, जिसका 210 रुपए प्रतिमाह बनता था। 40 रुपए यात्रा व अन्य खर्च दिया जाता था। इस तरह मासिक 250 रुपए दिए जाते थे। यह राशि मित्रों, सहयोगियों से व्यक्तिगत रूप से ली जाती थी। प्रोजेक्ट नहीं था। न्यूनतम मज़दूरी में न्यूनतम ज़रूरतों को पूरा करते हुए जीने का यह अभ्यास काफी कठोर था। इसके लिए भी शंकर सिंह, अरुणा रॉय, निखिल डे तैयार थे। किंतु खेमराज का कहना था कि यहाँ वही लोग काम कर सकते हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक हो। जो घर से साधन संपन्न हो, जिन पर घर परिवार की ज़िम्मेदारी न हो। शंकर यह नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसका अपना परिवार है, जिसका पूरा भार उस पर है, वह केवल 250 रुपए में कैसे चला पाएगा? उसका नहीं निभेगा। उसका यहाँ काम कर पाना संभव नहीं है।

यह खेमराज का सुझाव भी था और एक तरह से निर्णय भी, क्योंकि वह शंकर सिंह की परिस्थितियों को बहुत अच्छी तरह से जानते थे। उनका मकसद था कि शंकर सिंह कहीं और जाकर अच्छी नौकरी करें, अपने परिवार की ज़िम्मेदारी निभाएँ, अरुणा व निखिल यहाँ काम कर सकते हैं, क्योंकि उनकी ऐसी कोई मजबूरी या ज़िम्मेदारी न थी।

शंकर सिंह के लिए यह समय फिर से असमंजस का था। वे भी गरीबों के लिए काम करना चाहते थे, उनको भी संस्थागत काम के बजाय संगठनात्मक काम करना था। इसी तरह सादगी से रहकर लोगों के मध्य लोगों के लिए काम करने की अदम्य इच्छा थी और वो भी अरुणा रॉय व निखिल डे के साथ ही काम करने का दृढ़ संकल्प। हिम्मत बटोर कर एक दिन शंकर सिंह ने अपने समझदार युवा मित्र निखिल डे से कहा- “निखिल, यही काम हम लोग मेरे अपने गाँव में क्यों नहीं कर सकते?”

जब शंकर सिंह ने प्रस्तावित किया कि मेरे अपने इलाके के किसी गाँव में अथवा मेरे ही गाँव में संगठन बनाने का काम किया जाए तो मैं अपने परिवार को साथ रखते हुए काम कर लूँगा। शंकर सिंह की इस आत्मीय इच्छा का सम्मान करते हुए अरुणा रॉय व निखिल डे ने जवाजा इलाके में ही काम करने को सहमति प्रदान कर दी।

उस दिन शंकर सिंह व उनकी कठपुतलियाँ बहुत खुश हुये। उनकी घर वापसी होने वाली थी। अपने ही गाँव में अपने परिचित लोगों के मध्य रहकर सामाजिक बदलाव का काम करने की बरसों पुरानी मुराद अब पूरी होने की आस जगी थी।

कठपुतलियाँ इसलिये खुश थी कि उनको फिर से लोगों के मध्य जाने का मौका मिलेगा। वरना जब से छोटी गेंदरा आई थीं, वे रातों में चलने वाली बिना बात की बहस से तंग आ चुकी थीं। यहाँ करने को बहुत कुछ था, पर लोग कहने में इतने व्यस्त थे कि कथनी व करनी का संजोग ही नहीं बैठ रहा था। इसके अलावा भी कुछ बातें थीं। जो सामाजिक कुरीतियाँ और मुद्दे तिलोनिया और उसके आस-पास के गाँवों के थे, वे अलीराजपुर के आदिवासियों में नहीं थे।

2006 में एक आंदोलन के दौरान खेमराज जी के साथ

यहाँ जल, जंगल, जमीन की बातें थीं, खूब हरियाली थी और पहाड़ थे। लेकिन कठपुतलियों व उनके प्रिय कलाकार को अपने इलाके में अपने लोगों के बीच लौटना था, इसलिये लौट गये ।

नोट: यह लेख उनकी किताब कितनी कठपुतलियाँ से लिया गया हैं ।

Author

  • भंवर मेघवंशी सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और पत्रकार हैं। वे अपना समय सिरदियास में अंबेडकर भवन की देखरेख में और देश भर में घूमकर पत्रकारिता करने में व्यतीत करते हैं । उन्होंने मैं एक स्वयंसेवक था और कितनी कठपुतलियाँ जैसी किताबें लिखी हैं।

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