सुमन चौहान :

मैं खेमराज जी के आखिरी दिनों के बारे में लिख रही हूँ। मैं उनसे 2003 में मिली, तब मैं उनको नहीं जानती थी, बस नाम सुना था और सुना था कि वो चित्तौड़ में काम करते हैं, क्योंकि मैं उनके मुद्दों में बाड़मेर से लोगों को लेकर आई थी। 2003 में उनसे बात हुई, फिर मैं यहाँ चित्तौड़ में प्रयास संस्था में काम करने के लिए आई, फिर धीरे-धीरे बात करते-करते हम लोगों ने साथ रहने का सोचा। खेमराज जी विचारों से सच्चे इंसान थे और लोगों के लिए एक जुनून के साथ काम करते थे, जब भी किसी का फोन आ जाए या कोई पीड़ित व्यक्ति आ जाता तो तुरंत उसके गाँव में पहुंच जाते थे। अगर आप अपने गाँव में उन्हें बुलाओ तो पहले वो पूरे गाँव से बात करते फिर आपके मुद्दे पर आगे की बात चलाते। तो इस तरह से खेमराज जी अपने काम को अंजाम देते थे। 

आखिर आखिर तक भी खेमराज जी का एक तय नियम था, वो था प्रतिदिन फील्ड में जाना। वो दिन में कम से कम एक गाँव में ज़रूर जाते थे, चाहे सुबह, शाम या दोपहर। गाँव जाते थे तो लोगों को यह कहकर आते थे, “अब मैं नहीं बचूंगा आपको अभी मिलने आया हूँ, फिर शायद नहीं आऊंगा, मेरी बीमारी ऐसी है कि मुझे लेकर जाएगी।” जब खेमराज जी बीमार थे तो उनके दोस्त उनको मिलने आते थे, उनके कई दोस्त थे, हर दिन उनका कोई न कोई दोस्त हमारे यहाँ पर आकर रहते ही थे। वो मुझे कहा करते था, “सुमन उनके लिए अच्छा खाना बना, मेरे साथ यह लोग भी खाना खाएंगे।” वह खुद खाते नहीं थे पर दोस्तों के लिए कहते थे और सबको खाना खिला कर ही भेजते थे। 

उनके सब दोस्त यह कोशिश करते थे कि वह खुश रहें, इसलिए वो सभी उनके साथ खूब बातें करते, हँसी-मज़ाक करते, उनको भी अच्छा लगता था। उनके खास दोस्त थे देवीलाल जी, वह तो उनको बहुत मिलने आते थे, एक दिन छोड़कर वह मिलने आ जाया करते थे। उनको मिलकर खेमराज जी को बहुत संतुष्टि होती थी कि मेरा बचपन का दोस्त मुझे मिलने के लिए इस तरह से आ रहा है। परिवार से तो उनके रिश्ते अच्छे नहीं थे, इसलिए परिवार के लोग बहुत कम आते थे। उनके दोस्त शंकर जी और निखिल जी, यह दोनों भी आए थे और पूरा दिन खेमराज जी से बातें करके खाना-वाना खाकर शाम को गए। एक दोस्त अरुणाचल प्रदेश से भी खेमराज जी को मिलने आई, पूरा दिन साथ रही, हमारे साथ खाना, बातें करी और फिर वह भी शाम को चली गई। 

खेमराज जी के पास समय कम था, खेमराज जी और जीन चाहते थे वह कहते थे कि मैं 5 साल और ज़िंदा रहूँ। समाज में लोगों के साथ और काम करने की उनकी इच्छा थी। सामाजिक बुराइयों से लड़ने का काम उनको अच्छा लगता था। खेमराज जी को लड़ना उन लोगों से अच्छा लगता था जो लोग भेदभाव करते थे, जातिगत और ऊँच-नीच का भेदभाव करते थे। ऐसे लोगों के वह सख्त खिलाफ रहते थे। चाहे वह कोई बड़े सामाजिक कद का व्यक्ति हो या कोई सरकारी कर्मचारी, वह सबके मुँह बोल देते थे कि आप यह गलत कर रहे हैं, आप किसी गरीब के साथ ऐसा नहीं कर सकते। अपने कार्यक्षेत्र में काम करने की उनकी इच्छा पूरी नहीं हुई थी, वह कहा करते थे, “सुमन अगर मैं और ज़िंदा रह पाता तो लोगों के लिए और ज़्यादा काम कर पाता।” उनके काम के बदले उन्हें लोगों से क्या मिलेगा, उससे उन्हें कुछ लेना-देना नहीं था। उनके लिए लोगों के लिए काम करते रहना ही सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण था। वह मुझे कहते थे, “मुझे कुछ हो जाए सुमन तो तुम लोगों का साथ देना, उनके लिए काम करते रहना।”

खेमराज जी को आधारशिला बालिका संस्थान की बालिकाओं से बहुत प्रेम था। वह प्रतिदिन उनसे बात करते थे। बीमारी की हालत में भी दिन में एक बार वह बालिकाओं को देखने ज़रूर जाते थे। उनकी मरने की इच्छा बिल्कुल नहीं थी, कहते थे मैं 5 साल और जिंदा रह जाऊं तो बहुत अच्छा रहेगा, अभी तो मेरे खुशी के दिन आए ही हैं और मैं जा रहा हूँ। इस तरह बीमारी से उन्होंने पूरे एक साल लड़ाई लड़ी। उनके अंदर आखिरी वक़्त तक जीने की इच्छा थी, उनके भीतर की हिम्मत और ताकत आखिरी वक्त तक बरकरार थी लेकिन कैंसर की बीमारी ने आखिर में उनसे जिंदगी छीन ही ली और 15 जून 2019 को खेमराज जी ने इस दुनिया को आखिरी अलविदा कहा।  

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  • सुमन चौहान / Suman Chouhan

    सुमन जी, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वह खेतिहर खान मज़दूर शक्ति संगठन और आधारशिला विद्यालय के साथ जुड़ी हुई हैं और कई सालों से आदिवासी बालिकाओं के शिक्षा और स्थानीय मुद्दों पर काम कर रही हैं।

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