बापूनाथ जी:
काली छाट, यहाँ कालबेलिया परिवार रहते हैं, बड़े-छोटे पत्थर की चट्टानें होने के कारण उस स्थान को काली छाट के नाम से जाना जाता है। कुछ कालबेलिया समाज के लोग इस गाँव की सीमा में रहते हैं, गाँव का दूसरा नाम कांटी है। एक कालबेलिया परिवार ने वहाँ पर कुछ खेती की ज़मीन निकाल रखी है जिस पर वे खेती करते थे। खेत के पास एक तालाब भी है, और तालाब के पास काश्तकारी भूमि है, उस पर भी वे खेती करके अपना जीवन-यापन करते थे। साथ ही अपने जीवन-यापन के लिए देसी शराब भी निकाल कर बेचते थे। कालबेलिया लोगों के बच्चे गाँव के ही स्कूल में पढ़ने जाते थे। इस गाँव में कुछ आपराधिक प्रवृति के लोग भी थे, आस-पास के गाँव के लोग उन्हें अपराधी के रूप में देखते थे। इस कारण से कालबेलिया समुदाय के उन परिवारों पर पुलिस की लगातार दबिश रहती थी।
इसके पीछे एक बड़ा कारण था कि उनके पास तालाब के पास की काश्तकारी भूमि ज़्यादा थी और आस-पास के लोग उन पर चोरी के झूठे केस लगा रहे थे। वे लोग पुलिस से बहुत ही परेशान थे। गाँव के लोग बच्चों को कहते थे कि चोरों के बच्चे पढ़ने आ गए हैं। गाँव के लोगों का ताना सुनना पड़ता था, परंतु बच्चे पढ़ते ही रहते थे। इस परिवार की महिलाएँ घर पर ही रहती थी और शराब बनाती थी तथा खेती का काम देखती थी। परिवार के सारे पुरुष जंगल में छिपे रहते थे, जंगल में ही सोते थे क्योंकि पुलिस रात-दिन उनके पीछे पड़ी रहती थी। परिवार के पुरुषों के लिए महिलाएँ खाना बनाकर जंगल में ही पहुँचाती थी।
यह लोग बहुत परेशान थे। चित्तौड़गढ़ ज़िले के विभिन्न तहसीलों में कालबेलिया समाज के लोगों के साथ जो अन्याय अत्याचार हो रहा था, खेतिहर खान मज़दूर संगठन के खेमराज भाई तथा (प्रयास का कार्यकर्ता) मैं बापूनाथ इन मुद्दों पर काम कर रहे थे। कालबेलिया समाज को ऊपर उठाने के लिए हमने मिलकर कई सामाजिक सम्मेलन भी करवाये। बच्चों को शिक्षा से जोड़ने का प्रयास किया और कालबेलिया समाज के लोगों के गाँव में संगठन का निर्माण किया गया।
जब कालीछाट के परिवार पर पुलिस लगातार दबाव डाल रही थी तब खेमराज भाई और मैंने सोचा कि समाज के लोगों के साथ अन्याय हो रहा है। कार्यकर्ताओं की बैठक में कालीछाट के कालबेलिया परिवार की समस्या सुनी गई, मुझे ज़िम्मेदारी दी गई कि परिवार से विस्तार में जानकारी ली जाए। जब मैंने कालीछाट के कालबेलिया परिवार से संपर्क किया तो वहाँ केवल महिलाएँ ही मिली। उन्होंने जानकारी दी कि पुलिस बहुत परेशान करती है। उनके परिवारों का सर्वे किया गया। पुरुष के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की तो महिलाओं ने बताया कि पुरुष तो जंगल में छिपे हैं, वे वहीं सोते हैं। जब मैंने कहा कि पुरुषों से बात करनी है तो एक महिला घर से निकल कर जंगल की ओर गई और आगे जाकर आवाज़ लगाई। ऐसे ही धीरे-धीरे जंगल तक अलग-अलग लोगों ने आवाज़ लगायी और परिवार के मुखिया तक आवाज़ पहुंची। वहाँ से एक आदमी आया और घर से दूर खड़ा हो गया, वह आदमी मुझे जंगल में ले गया। फिर जंगल में ही बैठक की गई। पुरुषों ने बताया कि हम पर पुलिस द्वारा झूठे मुकदमे लगाये गये हैं। पुलिस बार-बार दबिश दे रही थी, आस-पास के गाँव के लोग तालाब की भूमि लेने के लिए हम यहाँ से भागाना चाहते हैं। लोग हमारे ऊपर झूठे केस थाने में दर्ज करवाते थे।
उसके बाद मैंने अतिरिक्त ज़िला पुलिस अधिकारी, चित्तौड़गढ़ से संपर्क किया और बताया कि यह लोग (कालबेलिया परिवार) सरेंडर करना चाहते हैं, परंतु उनका कहना है कि पुलिस उन पर झूठे मुकदमे नहीं लगाये व दूसरा यह कि तालाब के पास काश्त भूमि में उनकी खेती जारी रहे। उसके बाद इस परिवार को चित्तौड़गढ़ लाया गया, परंतु उसके पहले हमने ज़िले के पत्रकारों को साथ में ले जाकर कालीछाट के कालबेलिया परिवार से मिलवाया और इसकी पूरी कवरेज करवायी। कालीछाट के कालबेलिया दूसरे दिन सुबह ज़िला चित्तौड़गढ़ में एक वकील के घर के पास गये और वहीं से पैदल-पैदल ज़िला कार्यालय की ओर बढ़े और रास्ते में पुलिस आ गई। उन सभी ने वहीं सरेंडर किया। सारे पत्रकार जो कालबेलिया लोगों से मिल कर आये थे, उन्होंने अपने-अपने अखबारों में इस खबर को लिखा।

Leave a Reply