सदरे आलम:

मैं हूँ बवाना
बवाना पुनर्वास कॉलोनी
कुछ लोग मुझे बवाना जे. जे. कॉलोनी के नाम से भी पुकारते हैं
मुझे कहाँ-कहाँ से उजाड़ कर बसाया गया
क्या तुम सुनना चाहोगे उस आपबीती को
हम है Swept of the map
झाड़ू लगाकर शहर से बाहर
हम हैं सिंघू बॉर्डर के पास दूर दराज़ में बसी
कॉमन वेल्थ गेम्स के मुँह पर तमाचा
झंडा चौक का तिरंगा देश के ज़िम्मेदारों पे हँसता है
उसी चौक की लस्सी हमारे दिलों को ठंडक देती है
लेकिन यादों में फिर भी है उजाड़े जाने की आपबीती
यमुना पुश्ता, लोहा पुल, गैस गोडाउन, नीम तल्ला, मूलचंद बस्ती,
सावन पार्क, मंडावली
सरस्वती विहार, बनुवाल नगर, अशोक विहार, विकासपुरी,
उजाड़ दी इन बस्तियों को तुम्हारी अंग्रेज़ों की जी हुज़ूरी.
जब तुमने पटका था लाकर बियाबान में
न सिर्फ उजड़ा था हमारा घर
न सिर्फ छिन गए थे रोज़गार
छिन गया था हमारा स्कूल
छीन ली गई हमारे हाथों से कॉपी, किताबें और पेन
अब जब दिखते हैं बच्चे स्कूल से बाहर
अब जब बैठे हैं हज़ारों अशिक्षित
जो हैं बहुत परेशान
तो मिल जाते हैं शहर को सस्ते मज़दूर
और न्यूनतम मज़दूरी 17000 और मज़दूरों की आमदनी 7000
और ख़ूब आमदनी है कारख़ाने के मालिकों की
वह बच्चे जिनका छिन गया था स्कूल
उन बच्चों की तरफ़ से
कारख़ानों के मालिक को आमदनी मुबारक !!!

फीचर्ड फोटो आभार The Wire

Author

  • सदरे आलम सामाजिक कार्यकर्ता हैं । वह दिल्ली में बवाना और भलस्वा की झुग्गियों में रह रही बालिकाओं और असंगठित कार्य में जुड़ी हुई महिलाओं के साथ में मिलकर उनके मुद्दों पर काम करते हैं ।

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