कमलचंद :

भारत की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा मेहनतकशों का है, लेकिन यह विशाल आबादी ही इस देश की सबसे उपेक्षित आबादी है। अधिकारों और जीवन स्थितियों के मामले में तो वे उपेक्षित हैं ही साथ ही उनके बारे में प्रामाणिक जानकारी और आंकड़ों का भी आभाव है और तो और अपने वतन से दूर मज़दूरों के मुद्दे चुनावी मुद्दे बनते ही नहीं हैं। 

भारत जैसे विकासशील देश में बाल श्रम, एक ऐसी समस्या है जिसे हमारे समाज में लगातार नज़रअंदाज किया जा रहा है, लेकिन इसके परिणाम बेहद विनाशकारी होते हैं। बच्चों का काम करना न केवल उनके शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करता है, बल्कि यह उनके बचपन और उनके भविष्य के अवसरों को भी छीन लेता है। 

दूसरी ओर, मज़दूर महिलाओं का समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होता है, फिर भी उन्हें अपने कार्यस्थलों पर और समाज में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। चाहे वे खेतों में काम करने वाली मज़दूर हों, ईंट-भट्ठों में, कपड़ा उद्योग में, या घरों में काम करने वाली घरेलू कामगार, उनकी समस्याएँ अक्सर समाज के ध्यान से ओझल रहती हैं। इस संकलन में हम प्रवासी मज़दूरों, महिलाओं और बच्चों के कुछ प्रमुख समस्याओं पर ध्यान देंगे, जिनका सामना ये मज़दूर करते रहते हैं।

आज 1 मई है और हम इस दिन को मई दिवस या अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस या मज़दूर दिवस के रूप में मना रहे हैं। ऐसे में मैंने सोचा कि क्यों न इस देश के युवाओं से प्रश्न पूछे जाएँ या यूँ कहिये उनके मन में सवाल पैदा किया जाए, कि आज के इस दौर में मई दिवस का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है?

यह दिन श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए निरंतर संघर्ष की याद दिलाता है। कई देशों में, यह दिन रैलियों, मार्च, प्रदर्शनों और अन्य आयोजनों के साथ मनाया जाता है, जिन्हें श्रमिक संघों, श्रमिक संगठनों और कार्यकर्ताओं द्वारा आयोजित किया जाता है। इन आयोजनों में अक्सर विभिन्न मुद्दों पर प्रकाश डाला जाता है, जैसे कि आय असमानता, नौकरी की सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, और सुरक्षित कार्य स्थितियाँ आदि। मई दिवस की स्थापना के लिए एक महत्वपूर्ण घटना 1886 में शिकागो की हे मार्केट घटना थी, जहां श्रमिकों ने आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग के लिए हड़ताल की थी। यह विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गया, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई और कई को चोटें आईं, लेकिन इसने अंततः श्रमिक आंदोलन के लिए व्यापक समर्थन और जागरूकता उत्पन्न की और 3 वर्षों बाद, वर्ष 1889 में समाजवादी और श्रमिक दलों द्वारा बनाई गई संस्था सेकंड इंटरनेशनल (Second International) ने घोषणा की कि अब से 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के रूप में मनाया जाएगा।

मई दिवस श्रमिक आंदोलन की उपलब्धियों और वर्षों के दौरान श्रमिकों के अधिकारों को बढ़ाने में हुई प्रगति पर चिंतन करने का भी समय है। यह उन बलिदानों को श्रद्धांजलि देने का अवसर है जो अतीत के श्रमिकों ने दिए और एक न्यायपूर्ण और निष्पक्ष समाज के लिए लड़ाई जारी रखने की प्रतिबद्धता को फिर से स्थापित करने का अवसर है।

कुल मिलाकर, मई दिवस दुनिया भर के श्रमिकों की दृढ़ता, एकता, और एकजुटता का उत्सव है और सामाजिक और आर्थिक न्याय के लिए चल रहे संघर्ष की एक शक्तिशाली याद दिलाता है। मई दिवस का महत्व और भी बढ़ गया जब डेविड रिकार्डो और कार्ल मार्क्स जैसे क्लासिक अर्थशास्त्रियों ने उत्पादन के मुख्य स्रोत के रूप में श्रम को यह कहते हुए प्रमुख स्थान दिया कि श्रम न केवल उत्पादन में, बल्कि अन्य सभी आर्थिक गतिविधियों में भी एक महत्त्वपूर्ण कारक होता है। इस प्रकार श्रमिक किसी भी देश के आर्थिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। श्रमिकों की इसी भूमिका को एक पहचान देने और श्रमिक आंदोलनों के गौरवशाली इतिहास को याद करने के उद्देश्य से भी ‘मई दिवस’ अथवा ‘अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस’ मनाया जाता है।

विश्व के अधिकांश देशों में मई दिवस को एक ‘अवकाश’ घोषित किया गया है, विडंबना यह है कि नई पीढ़ी ‘मई दिवस’ को केवल एक अवकाश के रूप में ही जानती है। लोगों के ज़हन में ‘मई दिवस’ और श्रमिकों की भूमिका धीरे-धीरे धूमिल होती जा रही है। मज़दूर जब-जब अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर आवाज़ उठाता है तब-तब उनकी आवाज़ को दबाने का हर संभव कोशिश की जाती रही है। अतः स्पाइस के शब्दों में हमें यह याद रखने की ज़रूरत है, “एक समय आयेगा जब हमारी ख़ामोशी उन आवाज़ों से ज्यादा ताक़तवर होगी जिन्हें तुम आज दबा डाल रहे हो…”

Author

  • कमलचंद झारखण्ड के परेवा गाँव से है और पिछले 20 सालो से सामाजिक कार्य कर रहे है। वर्तमान में वह दिल्ली में रहकर श्रुति संस्था के साथ जुड़कर काम कर रहे है ।

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