रिया खत्री (सहयोग- राजू राम):
राजस्थान के एक तथाकथित उच्च जाति के व्यक्ति ने मध्य प्रदेश राज्य के एक आदिवासी मज़दूर को 10,000 रूपए उधार देकर उसके पूरे परिवार को 6 वर्षों तक खेती और घर का काम करने लिए मजबूर किया। शुरुआत में उसको बोला गया कि खेत पर 10 महीने तक काम करने के 50,000 रूपए भी दिए जाएंगे। मज़दूर इस झांसे में आकर अपने परिवार को लेकर काम के लिए चला गया, लेकिन 10 महीनों तक काम करने के बाद भी उस मज़दूर को एक रुपया भी नही दिया गया और इस काम में मज़दूर के तीन छोटे-छोटे बच्चों और पत्नी से भी जबरन काम करवाया गया। और इस तरह 6 साल तक यह परिवार साहूकार के खेत पर बंधुआ मज़दूरी करता रहा, जिसके बदले उनको कोई मजदूरी नही दी गई, बल्कि साहूकार ने उनके द्वारा लिये गए ऋण को 1,50,000 रूपये तक बढ़ा दिया। वर्ष 2016 में, 6 साल बंधुआ मज़दूरी करने के बाद उस परिवार को सरकारी अधिकारियों की मदद से बंधुआ मज़दूरी से मुक्त कराया गया।
यह कहानी हमको बताती है कि किस तरह काम और पैसे का झांसा देकर साहूकार या बिचौलिये सामाजिक और आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों का शोषण करते हैं। यह शोषण यहीं खत्म नहीं होता, मुक्त होने के बाद भी पुनर्वास के लिए उनको सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
हाल ही में, वर्ष 2023 में वैश्विक दासता सूचकांक (Global Slavery Index), 2023 के अनुसार, भारत में तकरीबन 8 मिलियन (80 लाख) लोग अभी भी ‘आधुनिक दासता’ के जाल में फंसे हुए हैं। बंधुआ मज़दूरी, दास प्रथा का ही भाग है। बंधुआ मज़दूरी कोई नया शब्द नहीं है, भारत में सालों से यह प्रथा चली आ रही है। ज़्यादातर बंधुआ मज़दूर आदिवासी या दलित समुदाय से होते हैं। हमारे देश में दलित और आदिवासी लोगों की सामाजिक और आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के कारण उन्हें गाँव के जमींदार या साहूकार से ऋण लेना पड़ता था, इसका प्रचलन अभी भी है, इसके बदले इन मज़दूर लोगों को या तो बिना मज़दूरी के या नाममात्र की मज़दूरी पर काम करने को मजबूर किया जाता है। ऋण नहीं चुका पाने के कारण परिवार के लोगों को भी इस प्रकार का काम करना पड़ता है और इस तरह लोगों को पीढ़ी दर पीढ़ी बंधुआ मज़दूर बनकर काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। देश में ज़्यादातर बंधुआ मज़दूरी कम आय वाले राज्य जैसे – झारखण्ड, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, और मध्य प्रदेश आदि राज्यों में देखने को मिलती है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को गरिमा और सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार प्रदान करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 23 के अनुसार देश में किसी भी प्रकार की बंधुआ मज़दूरी प्रबंधित है। इस प्रचलित बंधुआ मज़दूरी प्रथा को समाप्त करने के लिए एक कानून बंधुआ मज़दूर प्रथा (उन्मूलन ) अधिनियम, 1976 बनाया गया है। लेकिन बंधुआ मज़दूरी आज के समय में भी हो रही है और आज के समय में इसका रूप भी बदल गया है।
बंधुआ मज़दूर प्रथा (उन्मूलन ) अधिनियम, 1976 का क्या उद्देश्य है?
इस कानून के मुख्य उद्देश्य निम्न हैं:
- बंधुआ मज़दूरी प्रथा का पूर्ण रूप से अंत करना।
- समाज के आर्थिक एवं सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्ग के लोगों का आर्थिक एवं शारीरिक रूप से शोषण रोकना।
- प्रत्येक व्यक्ति को अपनी इच्छा से अपना रोज़गार चुनने के लिए स्वतंत्रता देना।
- किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के बिना कोई काम करने के लिए बाध्य न किया जाये इसी उद्देश्य से यह अधिनियम बनाया गया है।
इस कानून के अनुसार बंधुआ मज़दूरी क्या है?
बंधुआ मज़दूरी का मतलब ऐसी मज़दूरी से है, जिसमे एक व्यक्ति से उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करवाया जाता है, और उस काम के बदले में उस व्यक्ति को कोई वेतन भी नही दिया जाता है, या ना के बराबर वेतन दिया जाता है, यह बंधुआ मज़दूरी की श्रेणी में आता है। इस अधिनियम के अंतर्गत ‘बंधुआ मज़दूरी प्रथा’ को एक ज़बरन काम करवाने की एक श्रेणी के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसके तहत किसी व्यक्ति द्वारा लिया गया ऋण चुकाने के बदले ऋणदाता के लिये काम/मज़दूरी करता है तो वह बंधुआ मज़दूर कहलाता है। यह पूरी व्यवस्था “बंधुआ मज़दूरी प्रथा” कहलाती है।
निम्नलिखित कार्य बंधुआ मज़दूरी की श्रेणी में आते है जहां ऋणदाता, मज़दूर को कर्ज देने के बदले ऐसा करार करते हैं जिसमें –
- मज़दूर को अग्रिम राशि का भुगतान करके उससे काम कराना,
- किसी परंपरा या सामाजिक दायित्व के चलते ऐसा काम करने का करार करना,
- सालों से चली आ रही पारिवारिक प्रथा के तहत किसी व्यक्ति विशेष के घर पर काम करना,
- पूर्वजों द्वारा लिए गए कर्ज को चुकाने के लिए काम करना,
- किसी जाति विशेष में जन्म लेने के कारण बंधुआ मज़दूर की तरह काम करना,
- न्यनतम मज़दूरी या जहाँ सरकार द्वारा कोई न्यूनतम मज़दूरी निर्धारित नहीं है वहाँ ऐसा काम करने वाले को सामान्यतया दी जाने वाली मज़दूरी से कम मज़दूरी पर काम करना,
- ऋणदाता का ऋण नहीं चुकाने या करार के हिसाब से काम नहीं करने पर मज़दूर द्वारा अपनी किसी सम्पत्ति या श्रम के उत्पाद को बेचने या उसे बाज़ार मूल्य पर बेचने का अपना अधिकार खो देना भी इसी प्रथा का हिस्सा है,
- यदि ऐसे करार से मज़दूर से उसकी काम करने की आज़ादी या उसके जीविका के माध्यम छीन जाते हैं तो भी यह बंधुआ मज़दूरी मानी जाएगी,
- आंशिक बलात श्रम भी इसी श्रेणी में आता है,
- अन्य किसी भी प्रकार का जबरन कराया हुआ काम जहाँ व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध काम करना पड़ता है या किसी अन्य जगह पर अपनी मर्जी का काम करने की आज़ादी ना होना भी बंधुआ मज़दूरी का ही एक प्रकार है।
इस अधिनियम के अंतर्गत अधिकारी, उनकी शक्तियां एवं दायित्व –
इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा राज्य के प्रत्येक ज़िला में ज़िला कलेक्टर को कुछ शक्तियाँ एवं दायित्व दिए गए हैं। लेकिन वह चाहे तो किसी अन्य अधिकारी को अपनी शक्तियाँ एवं दायित्व दे सकते हैं।
राज्य सरकार द्वारा चुने गए ज़िला मजिस्ट्रेट को निम्न शक्तियाँ एवं दायित्व दिए गए हैं-
- ज़िले में बंधुआ मज़दूरी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए लोगो में जागरूकता का काम करना।
- ज़िले में बंधुआ मज़दूरी प्रथा को समाप्त करने के लिए बंधुआ मज़दूरों के लिए आर्थिक संसाधनों की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए बंधुआ मज़दूरों को छुड़वाने के लिए कार्य करना।
- इस अधिनियम के लागू होने के बाद भी ज़िला में कहीं बंधुआ मज़दूरी हो रही है या नहीं इसकी जानकारी के लिए समय-समय पर जाँच बिठाना और स्वयं के संज्ञान से बंधुआ मज़दूरी व्यवस्था को समाप्त करने के लिए कदम उठाना, और इस जांच के दौरान यदि कोई व्यक्ति बंधुआ मज़दूरी करवाते हुए मिलता है तो उस व्यक्ति के खिलाफ तुरंत कार्यवाही करना इत्यादि।
राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम को विधिवत रूप से लागू करने के लिए एक समिति भी बनाई जाएगी जो कि ‘जागरूकता समिति’ कहलाएगी। यह समिति प्रत्येक ज़िले में 2 स्तर पर होगी एक समिति ज़िला स्तर पर और एक समिति अनुभाग स्तर पर बनाई जाएगी।
ज़िला स्तरीय समिति: इस समिति का अध्यक्ष ज़िला कलेक्टर होगा, और 3 व्यक्ति अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से होंगे और 2 व्यक्ति समाजिक कार्यकर्ता के रूप में होंगे और कम से कम 2 व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत एजेंसी से होंगे, और 1 व्यक्ति आर्थिक सलाहकार के रूप में होगा। यह सभी सदस्य ज़िला कलेक्टर एवं राज्य सरकार द्वारा चुने जायेंगे।
अनुविभाग स्तरीय समिति: इस समिति का अध्यक्ष अनुविभागीय अधिकारी होगा, 3 व्यक्ति अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से होंगे और 2 व्यक्ति समाजिक कार्यकर्ता के रूप में होंगे और कम से कम 2 व्यक्ति ग्रामीण क्षेत्र में कार्यरत एजेंसी से होंगे और 1 व्यक्ति आर्थिक सलाहकार के रूप में होगा। यह सभी सदस्य अनुविभागीय अधिकारी एवं ज़िला मजिस्ट्रेट द्वारा चुने गए होंगे।
जागरुकता समिति के दायित्व निम्न लिखित है–
- इस अधिनियम के प्रावधानों का ठीक तरह से पालन सुनिश्चित करना एवं इसके लिए समय-समय पर ज़िला कलेक्टर को सलाह देना।
- बंधुआ मज़दूरी व्यवस्था से छुड़ा कर लाए गए मुक्त बंधुआ मज़दूरों के लिए रोज़गार एवं पुनर्वास की व्यवस्था करना।
- मुक्त बंधुआ मज़दूरों को ग्रामीण बैंक एवं सहकारी संस्थाओं से विधिक एवं न्यायपूर्ण प्रकार से ऋण दिलाने की व्यवस्था करना।
- ज़िले में इस अधिनियम के अंतर्गत कितने अपराध आ रहे हैं इसकी जानकारी रखना।
- बंधुआ मज़दूरी का पता लगाने के लिए ज़िले के अलग-अलग स्थानों पर सर्वे करना।
- साहूकारों या ऋणदाताओं के विरुद्ध केस लड़ने में मुक्त बंधुआ मज़दूरों की सहायता करना एवं उनको विधिक सलाह प्रदान करना।
- छुड़ाये गए बंधुआ मज़दूरों के नाम एवं अन्य जानकारियां जैसे कि – उनके काम एवं वेतन का रिकॉर्ड एवं मज़दूरों को दिए गये लाभ का रिकॉर्ड रखने के लिए जागरूकता समिति को रजिस्टर बनाकर भी रखना होगा जिसमें समिति यह सारा रिकॉर्ड रखेगी।
इस अधिनियम के अंतर्गत अपराध और सजा के प्रावधान –
इस अधिनियम के अंतर्गत किये गए अपराध और उनके लिए सजा के प्रावधान कुछ इस प्रकार हैं –
- यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति या मज़दूर को कोई काम करने के लिए उस व्यक्ति या मज़दूर की इच्छा के खिलाफ काम करने के लिए मजबूर करता है तो ऐसे व्यक्ति को तीन साल की सजा हो सकती है और 2000 रूपए तक जुर्माना भी लग सकता है।
- यदि ऋणदाता किसी व्यक्ति या मज़दूर को किसी काम के लिए पहले से कुछ अग्रिम राशि देता है तो ऐसे ऋणदाता को तीन साल की सजा हो सकती है और 2000 रूपए तक का जुर्माना भी लग सकता है।
- यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के लागू होने के बाद भी किसी ऐसी परंपरा या समझौता या ऐसी कोई संविदा बनाता है जिसके द्वारा वह व्यक्ति किसी मज़दूर को या उस मज़दूर के किसी परिवार के सदस्य को मज़दूरी करने के लिए मजबूर करता है तो ऐसे व्यक्ति को तीन साल की सजा हो सकती है और 2000 रूपए तक जुर्माना भी लग सकता है और उस व्यक्ति से लिया गया जुर्माना बंधुआ मज़दूर को दिया जायेगा।
- इस अधिनियम के अंतर्गत निर्देशित है कि ऋणदाता इस अधिनियम के लागू होने के 30 दिन के भीतर उसके अधीन काम कर रहे बंधुआ मज़दूर को उसकी सम्पति वापस दी जाये जिसको ऋणदाता ने ऋण के बदले में ली थी, लेकिन कोई ऋणदाता ऐसा नहीं करता है तो उस ऋणदाता को 1 साल की सजा हो सकती है और 2000 रूपए तक जुर्माना भी लग सकता है।
- यदि कोई भी व्यक्ति किसी भी अन्य व्यक्ति को इस अधिनियम के अंतर्गत कोई अपराध करने के लिए उकसाता है तो ऐसे व्यक्ति को वही सजा दी जाएगी जो उस अपराध को करने वाले व्यक्ति को दी जाएगी, चाहे उसके द्वारा अपराध को अंजाम दिया गया हो या नहीं।
- जब इस अधिनियम के लागू होते ही सभी प्रकार के ऋण माफ़ कर दिए जाते हैं, लेकिन फिर भी यदि कोई ऋणदाता किसी मज़दूर से ऋण के बदले में कोई वसूली करता है तो उसको 3 साल की सजा हो सकती है और इसके साथ जुर्माना भी लग सकता है।
इस अधिनियम में बंधुआ मज़दूरों को छुड़ाने के एवं छुड़ाए गए बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास के लिए प्रावधान –
पुलिस एवं तहसीलदार की मदद से जब बंधुआ मज़दूरों को बंधुआ मज़दूरी से छुड़ा कर लाया जाता है तो उन बंधुआ मज़दूरों को बंधुआ मुक्ति का प्रमाण पत्र दिया जाता है। इन मुक्त बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास की व्यवस्था के लिए वर्ष 1978 में एक योजना बनाई गयी थी। इस योजना का वर्ष 2016 में नवीनीकरण किया गया और इस योजना को ‘केंद्रीय क्षेत्र योजना’ नाम दिया गया। इस योजना के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकार को मज़दूरों के पुर्नवास की व्यवस्था करने के लिए फण्ड दिया जायेगा जिसके अनुसार प्रत्येक वयस्क पुरुष को कुल 1 लाख रूपए और महिलाओं एवं बच्चों को 1,25,000 रुपयों की पुनर्वास सहायता राशि प्रदान की जाएगी। इसमें से आवश्यकता के अनुसार 30,000 तक नकद सहयता राशि भी दी जाती है। इसके अतिरिक्त पुनर्वास पैकेज में भूमि अथवा आवास आदि से सम्बंधित लाभ भी मूल योजना में शामिल किए जाएंगे जो कि निम्न हैं –
- घरेलू स्थान तथा कृषिगत भूमि का आबंटन,
- भूमि विकास,
- पशु पालन, डेयरी, मुर्गी पालन, सुअर पालन की व्यवस्था करना आदि,
- मज़दूरी, रोज़गार, न्यूनतम मज़दूरी दिलाना आदि,
- लघुवन उत्पादों का संग्रह तथा उनका संसाधन,
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति,
- बच्चों के लिए शिक्षा आदि शामिल है।
बंधुआ मज़दूर प्रथा (उन्मूलन ) अधिनियम, 1976 के अंतर्गत ऋण माफ़ी के प्रावधान –
इसके लिए निम्न प्रावधान है-
- जिस समय से यह अधिनियम लागू होगा उसके बाद से ही सम्पूर्ण देश में चल रही किसी भी प्रकार की बंधुआ मज़दूरी को अवैध घोषित कर दिया गया।
- यदि किसी बंधुआ मज़दूर को किसी जमींदार या साहूकार को कोई ऋण चुकाना है तो इस अधिनियम के लागू होते ही यह माना जायेगा कि उस बंधुआ मज़दूर ने वह ऋण चुका दिया है।
- कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा से या बिना इच्छा के किसी भी व्यक्ति के अधीन बंधुआ मज़दूरी नहीं करेगा।
- कोई भी ऋणदाता इस अधिनियम के लागू होने के बाद से किसी भी मज़दूर को ऋण या पहले से कोई धनराशि इस उद्देश्य से नहीं देगा कि वह मज़दूर बाद में उस ऋणदाता के अधीन किसी भी प्रकार की बंधुआ मज़दूरी करेगा।
- कोई भी जमींदार या साहूकार किसी भी मज़दूर को उसके अधीन बंधुआ मज़दूरी करने को नहीं बोलेगा।
- इस अधिनियम के लागू होते ही ऐसे समस्त संविदा, परम्पराएँ, समझौते अवैध व अमान्य हो जाएंगे जिनके अधीन कोई बंधुआ मज़दूरी करता है या करवाता है।
- यदि किसी बंधुआ मज़दूर की कोई सम्पति उसके द्वारा लिए गए ऋण के बदले में ऋणदाता के कब्जे में है तो इस अधिनियम के लागू होते ही एसी कोई भी संपत्ति ऋणभार से मुक्त हो जाएगी।
- इस अधिनियम के लागू होने से जो ऋण माफ़ हुए है उनके बदले में कोई भी ऋणदाता बंधुआ मज़दूर से किसी भी प्रकार का भुगतान वसूल नही कर सकता।
आज भी देश में एसी कुप्रथाएँ चल रही हैं और आर्थिक व सामाजिक रूप से कमज़ोर वर्गों का शोषण हो रहा है। सबसे पहले हमें लोगों को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक करना होगा और उनको यह बताना होगा कि बंधुआ मज़दूरी एक रोज़गार नहीं यह एक गंभीर अपराध है और यह मज़दूरों का आर्थिक और शारीरक शोषण है, क्योंकि कई लोग तो बंधुआ मज़दूरी को रोज़गार समझते हैं। लेकिन हमें हमारे समाज को इस अपराध से मुक्त करना होगा अन्यथा कई जीवन इसमें बर्बाद हो जायेंगे।
यदि आपको लगता है कि किसी स्थान पर बंधुआ मज़दूरी हो रही है तो इसकी शिकायत सम्बंधित अधिकारी से ज़रूर करें और उस मज़दूर को नजदीकी ज़िला विधिक प्राधिकरण से दी जाने वाली सेवाओं के बारे में ज़रूर अवगत कराएँ।

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