लाखन देवाजी पवार:
सभी साथियों को ज़िंदाबाद, आज हम मज़दूर और मज़दूरी के बारे में बात करने वाले हैं। साथियों मैं जिस क्षेत्र में फिलहाल काम कर रहा हूँ, उसके बारे में मैं आपको बताना चाहता हूँ। वैसे तो मैं सामाजिक क्षेत्र में सन 1998 से कार्यरत हूँ लकिन समाज की भयावह स्थिती मुझे सन 2018 से करीब से देखने को मिली जब मैं मेरे घर छुट्टी पर आया था। उस वक्त मैं बैंक में सहायक मेनेजर का काम कर रहा था और साथ ही छोटू भाई वसावा का संगठन भिलीस्थान टाईगर सेना का महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष भी था। हमारे गाँव में प्याज का काम चल रहा था और मेरे भील समाज के ज़्यादातर औरतें खेत मज़दूरी का काम कर रही थी। उस वक्त महाराष्ट्र में सवर्ण समाज के लोगों ने ऐसा माहौल बनाया था कि गाँव के लोग गाँव में ही कम मज़दूरी पर काम करेंगे और बाहर ज़्यादा मज़दूरी पर काम नहीं करेंगे। और अगर कोई विरोध करेगा तो उसे गाँव वाले मिलकर मारेंगे या उनका गाँव में राशन-पानी बंद कर देंगे।
एक के बाद एक गाँवों में फ़रमान निकलने लगे और यह फ़रमान मेरे गाँव तक भी पहुँच ही गया। सारे गाँव के बड़े-बुजुर्ग जमा हुये। पहले तो वो लोग गाँव की भिलाटी में आये और खेत मज़दूरी करने वाले मज़दूरों को धमकाया कि आप लोग गाँव में ही 200 रुपये के रोज़दारी पर काम करो, बाहर गये तो हम आपको और उस आदमी को भी मारेंगे जिसने आपको काम दिया। इस सारे बवाल के बीच मज़दूर औरतों की एक टोली बाहर के गाँव में 300 रुपये की मज़दूरी पर काम करने के लिए रवाना हो रही थी, गाँव वालों को जब पता चला तो उन्होंने उस टोली को बीच रास्ते में ही रोक लिया और उस आदमी को मारा जो भील आदिवासी औरतों को अपने खेत पर काम के लिए ले जा रहा था। साथ ही उन्होंने महिला मज़दूरों के साथ भी धक्का-मुक्की की। जब बवाल ज़्यादा बढ़ गया, तब हमको पता चला। फिर हम सब कार्यकर्ता जमा हुए और मज़दूर औरतों को साक्री पुलिस स्टेशन ले गये। जिन्होंने अपराध किया, उनके खिलाफ एफ.आइ.आर. दर्ज कराई गयी। हमने बाकी के मज़दूर लोगों को काम पर जाने से रोक दिया। इस घटना से फायदा यह हुआ कि 200 रु. की जगह अब मज़दूरी 250 रु. हो गई। मेरी गर्मी की छुट्टी खतम हो गई, लेकिन यह घटना मेरे दिल और दिमाग में इस कदर बैठ गई कि ज़्यादा से ज़्यादा एक हफ्ते के भीतर ही मैंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और ठान लिया कि जीयुंगा तो मज़दूरों के लिये और मरुंगा तो मज़दूरों के लिये।
नौकरी से इस्तीफा देने के बाद मैं सामाजिक काम में जुट गया और तभी मेरे पुराने वरिष्ठ साथी शांतीलाल मीना जी का मुझे संदेश आया कि मज़दूर अधिकार मंच (ट्रेड युनियन) में काम करोगे? मुझे बहुत अच्छा लगा और मैंने तुरंत ही यूनियन को जॉईन किया। इनके साथ जुड़कर मुझे गन्ना कटाई क्षेत्र के बारे में बहुत कुछ नया सीखने और देखने को मिला। जब मैंने काम शुरू किया तब गुजरात राज्य में प्रति टन गन्ना के लिए 330 रु. देने की बात चल रही थी। लेकिन भाव मिलेगा या नहीं कुछ फिक्स नहीं था। इसलिए हमारी पूरी टीम मिलकर अभियान चला रही थी कि भाव नहीं मिलने पर सभी हड़ताल करेंगे। उस वर्ष सरकार ने आखरी महिने मे 476/- रु. प्रति टन का नोटीफीकेशन निकाल दिया और हम सब बहुत खुश हो गये। सीजन खतम हो गया और मज़दूर वापस आ गये।
इसी बीच महाराष्ट्र के गन्ना कटाई मज़दूरों के ढेर सारे मामले हमारे पास आये जिसने हम सभी को अंदर से झकजोर दिया और सोचने पर मजबूर कर दिया कि क्या वाकई में हम आज़ाद हैं भी या नहीं। हमने महाराष्ट्र के करीब 690 बंधुवा मज़दूरों को मालिकों के चंगुल से आज़ाद कराया, जिनका बहुत ही भयावह तरीके से शोषण हो रहा था। लाखों रुपये एड्वांस देकर मज़दूरों से उनकी क्षमता से आधिक ज़्यादा उनसे काम करवाया जा रहा था। सैकड़ों मज़दूरों को पैसे की वजह से बंधक बनाया जा रहा था और जानवरों की भांति उन्हें पीटा जा रहा था। पैसे न चुका पाने पर औरतों और बच्चों को रख लिया जाता है। ज़्यादातर नौजवान लड़कियाँ यौन शोषण का शिकार हो रही हैं, नई नवेली दुल्हन को रखैल बना लिया जाता है और उसके पती को किसी भी झूठे इल्जाम में फंसाकर जेल में डाल दिया जाता है या तो मार-मार कर भगा दिया जाता है।
हालाँकि महाराष्ट्र में गन्ना कटाई दर इस साल सभी यूनियन की लड़ाई की वजह से बढ़ गई है, जिसमें मज़दूर अधिकार मंच का बहुत बड़ा योगदान रहा है, लेकिन अन्याय और अत्याचार कम होने का नाम नहीं ले रहा है। जहाँ एक ओर गुजरात में कोई भी अप्रिय घटना सुनने को नहीं मिलती, वहीं महाराष्ट्र में ये सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। सभी मज़दूर, आदिवासी हैं, अशिक्षित हैं और आर्थिक रूप से बहुत ही कमज़ोर भी। हमारा सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि हमारे आदिवासी संगठन इन विषयों के बारे में बात करते नहीं दिखते, किसी भी ग्रुप, संगठन या नेता को इन मज़दूरों की कोई सुध ही नहीं है।

Leave a Reply