अनिल, सहोदय ट्रस्ट:

तुरी समुदाय अनुसूचित जाति का एक समुदाय है जो मुख्यतः बिहार, झारखण्ड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में रहते हैं। 2011 के सेन्सस के अनुसार इनकी जनसँख्या 1 लाख 98 हज़ार 344 है। इनका पारंपरिक काम बांस से घरेलू, या खेत में प्रयोग होने वाले सामान और त्यौहार, पर्व या शादी में उपयोग होने वाले सामान बनाना है जैसे- सूप, खचिया (मौनी), डलिया, चटाई आदि।

बिहार के गया जिले में बाराचट्टी थाना के सुंदरसाही गाँव में श्री शम्भू तुरी के घर के सामने उनके आम के पेड़ की छांव में, सहोदय की टीम से अनिल (संस्थापक) और आदित्य (छात्र), तुरी समुदाय के कुछ लोगो से मिले और उनके अनुभव जाने। मुख्यतः शम्भू तुरी, उम्र 38 वर्ष, और अमुक तुरी, उम्र 55 वर्ष, और उनके परिवार से बात हुई। गाँव के कुछ और लोग भी अपनी बात साझा किये। ये लोग कई पीढ़ियों से बांस के सामान बनाते आ रहे हैं और यह काम अभी भी कर रहे हैं। परिवार के सभी लोग इस काम में लगे रहते हैं, तब भी एक मजबूत खचिया या मौनी बनाने में दो से तीन दिन लग जाते हैं और इसका दाम ज़्यादा से ज़्यादा 500 से 600 रुपये मिल पाता है। कुछ भी बनाने से पहले बांस ढोकर लाना, उसे काटना, छिलना और सुखाना भी पड़ता है। इसके लिए सोनापुरिया प्रजाति का बांस झारखंड के गिरिडीह से लाते हैं। इस प्रजाति का बांस यहाँ (सुंदरसाही) की मिट्टी में नहीं उग पता है।

सुंदरसाही गाँव में तुरी समुदाय के लगभग 70 परिवार रहते हैं और ये सभी लोग इस काम में लगे रहते हैं। इतने सालों से यह काम करते रहने के बावजूद इनमें से ज़्यादातर लोगो के पास खेती की ज़मीन नहीं के बराबर है। कुछ लोग बकरिया भी पालते हैं, पिछले साल बकरियों से शम्भू ने लगभग 25000 कमाए थे। वे बताए कि ज़मीन होती तो थोड़ी और बकरिया और गाय रखने की व्यवस्था तैयार करते। उसी तरह वे सोचते हैं कि और पैसा कमाते तो उनके बच्चे भी अच्छे स्कूल में पढ़ाई कर पाते। लेकिन इनकी आर्थिक स्थिति कभी बहूत मज़बूत नहीं हो पाई, फिर भी किसी तरह बांस के काम से अपना गुज़ारा कर लेते हैं।

शम्भू के घर के सामने 4-5 मुनगा के पेड़ लगे हैं, पिछले साल मुनगा बेचकर 4200 कमाए लेकिन मौसम में परिवर्तन के कारण इस साल मुनगा अच्छे से नहीं फल दिए। अब महुआ भी कम निकलता है, लेकिन इन लोगों के पास महुआ के पेड़ नहीं हैं।

इनका गाँव के दोनों ओंर जंगल और पहाड़ है। एक ढेरा पहाड़ है जहाँ के जंगल से इंधन के लिए लकडियाँ मिल जाती हैं, लेकिन वो भी केवल उनको जिनके परिवार में ज्यादा सदस्य नहीं हैं, नहीं तो लकड़ी भी खरीदना पड़ता है। जानवर के लिए चारा और पत्ते भी जंगल से मिल जाते हैं। जंगल में मौसम के अनुसार कई फल-सब्जियाँ भी मिल जाती हैं जैसे- कोणार्क का साग (मई), बांस के करेल (सावन-भादो), खेक्शा या चथैल, (भादो), बांस खोखड़ी (मशरूम), ज़मीन पे उगा खोखड़ी जिसे ये लोग टेकनश बोलते हैं, यह सावन-भादों में निकलता है। अभी के समय में केंदुआ, प्यार जो अंगूर जैसा होता जिसे शायद दतरंग भी कहते है, कटहल और अन्य फल मिलते हैं। शम्भू ने अनिल को जंगले घुमाने और ये सब पेड़-पौधे दिखाने के आग्रह को स्वीकार किया। इन लोगों के अनुसार जंगल में ये सब पेड़-पौधों की संख्या अब घट रही है और बहुत से चिड़ियों की भी, जैसे बाज या गिद्ध, जंगल में नीलगाय, सूअर, कुतरा, हिरन, मोर, तीतर, मैना, गोरैया इत्यादि मिल जाते हैं।

गाँव के पास एक नदी भी है जिसका नाम धरधरी है, इसमें थोडा पानी अभी बचा है। गाँव में तालाब नहीं है, कुआं सब भर दिए क्योंकि गाँव के कई लोग झगड़ा करके उसमें आत्महत्या किये थे। इस गाँव में कई जाति-समुदाय के लोग रहते हैं, लेकिन इनके यहाँ कोई सामुदाइक सभा या बैठक नहीं होती है। इनका मानना है कि अब सामुदाइक रिश्ते कमज़ोर हो रहे हैं, लोग आपस में मिलते नहीं हैं।

इनके बच्चे कुछ बाहर कमाते हैं और ज़्यादातर इस बांस के काम में रूचि नहीं लेते हैं, क्योंकि वे लोग इसमें ज़्यादा कमाई नहीं पाते और आज के समय में महंगाई और ज़रूरतें बहुत बढ़ चुकी हैं। दूसरी बात यह कि सरकार ने बांस की इनकी इनकी पारंपरिक काला को बढ़ावा दें के लिए ना तो कोई पहल की है और ना ही समुदाय के लोगों को कोई सरकारी मदद मिली है। कभी -कभी इनको गाँव के महाजन से कर्जा लेना पड़ता है और फिर वे लोग मन-माने दाम पर इनका सामान खरीदते हैं। सामान इनका लेकिन दाम कोई और ही तय करता है। इधर कुछ सालों से कुछ संस्थाओं की मदद से कुछ ट्रेनिंग मिली है और बाहर जाकर इन्होने अपनी काला का प्रदर्शन किया है, लेकिन कमाई फिर भी नहीं बढ़ी है। इसके बाद भी समुदाय के लोग दिन भर परिवार के साथ इस काम में लगे रहते है और जीवन में बहुत बेचैन नहीं हैं। ये लोग रोज़गार के नए अवसर ढूंढ रहे है, बाज़ार में प्लास्टिक के सामान की मांग बढ़ने से इस कला के लिए पर्याप्त मांग और समाज या सरकार से पर्याप्त समर्थन के अभाव में, आशा धूमिल ही लग रही है। जबकि इनका काम और जीवन, पर्यावरण के साथ एक सुंदर सम्बन्ध को दर्शाता है और इस कला के समृद्धि में एक सामुदाइक जीवन और पर्यावरण की समृद्धि है, जो कि अभी के जलवायु परिवर्तन के समय में बहुत प्रासंगिक है।

फीचर्ड फोटो आभार : YKA

Author

  • सुनील कुमार, मध्य प्रदेश के ग्वालियर ज़िले में रहते हैं | उन्होंने ग्वालियर में जीवाजी विश्व विद्यालय से एम.एम (अर्थशास्त्र) और एल.एल.बी की शिक्षा प्राप्त की है | वह वर्ष – 2013 से समाज सेवा के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। वर्ष 2021 से सुनील, जेनिथ संस्था, ग्वालियर के साथ जुड़कर ग्वालियर मैं कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में, वह ग्वालियर में सहरिया समुदाय (आदिवासी) को न्याय तक पहुँचाने की लड़ाई में उनके साथ ज़मीनी स्तर पर कार्य कर रहे हैं।

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