सिद्धार्थ: 

बीते 8 अप्रैल को ‘अंतर्राष्ट्रीय रोमानी दिवस’ मनाया गया, आधिकारिक रूप से साल 1990 में पोलैंड देश के शेरोक शहर में पहली बार 8 अप्रैल को अंतर्राष्ट्रीय रोमानी दिवस के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गयी थी। जानकारी के लिए बता दें कि रोमानी, रोमा या जिप्सी समुदाय यूरोप के कई देशों में बसने वाला एक अल्पसंख्यक ख़ानाबदोश समुदाय है। पूर्वी यूरोप के एक देश रोमेनिया में इनकी संख्या सबसे ज़्यादा है, लेकिन रोमानी और रोमेनियाई लोगों में कनफ्यूज़ नहीं हो जाइयेगा, ये दोनों अलग हैं। रोमानी मूल रूप से पश्चिम-मध्य भारत के लोग हैं, लगभग हज़ार साल पहले भारत से यूरोप पहुँचने वाले रोमानी लोगों का इतिहास बहुत ही रोचक है। रोमानी समुदाय को यूरोप में लंबे समय तक एक बिलकुल अलग दिखने वाला रहस्यमयी समुदाय की तरह देखा जाता रहा। मध्यकालीन यूरोप में इनके मूल स्थान को लेकर कहा गया कि ये ईजिप्ट (मिस्र) के मूलवासी हैं, इसलिए इन्हें जिप्सी भी कहा जाने लगा। लेकिन 18वीं और 19वीं सदी के दौरान जब रोमानी लोगों की भाषा के आधार पर शोध हुए तो पता लगा कि इनका मूल पश्चिम और मध्य भारत में है। बाद में 20वीं सदी में डीएनए और आनुवांशिक शोध से इसकी पुष्टि भी हो गयी।

यूरोप में रोमानी लोगों के मुख्य रूप से दो समुदाय हैं। एक है ‘सिंती’ और दूसरा है ‘रोमा’; दोनों का इतिहास मिलता-जुलता है लेकिन इनके पलायन करने का समय और परिस्थितियाँ अलग-अलग हैं। रोमानी लोगों के इतिहास को समझने के लिए भारत पर अरब-तुर्क हमलों का इतिहास समझना ज़रूरी है। आठवीं सदी की शुरुआत (711-713 ई.) में अरब मूल के उमायेद साम्राज्य ने सिंधु नदी को पार कर पश्चिम भारत के सिंध और पंजाब इलाके पर आक्रमण किया था। इन हमलों का उद्देश्य भारत की अपार सम्पदा को लूटकर उमायेद साम्राज्य के विस्तार में उसका इस्तेमाल करना था। मुहम्मद बिन कासिम का नाम आपने सुना हो तो बता दें कि वह एक उमायेद जनरल ही था। उमायेद साम्राज्य अरब प्रायद्वीप, पर्शिया या फारस (मौजूदा ईरान, सीरिया और तुर्की), और उत्तरी अफ्रीका से लेकर यूरोप में स्पेन तक फैला हुआ था। इन हमलों के कारण सिंध और पंजाब के क्षेत्र में बड़ी तबाही हुई और बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान के साथ-साथ लोगों का विस्थापन भी हुआ। उमायेद आक्रांताओं के ये हमले 750 ई. तक चलते ही रहे, जब तक कि उमायेद साम्राज्य ही खत्म नहीं हो गया। इस दौरान सिंध इलाके से जिन लोगों ने पश्चिम की तरफ पलायन किया वही सिंती समुदाय के लोग हैं। ‘रोमा’ समुदाय की बात करें तो इनका पलायन 11वीं सदी की शुरुआत में हुआ जब अफगानिस्तान के तुर्क मूल के गजनाविद साम्राज्य ने पश्चिम भारत (मौजूदा पाकिस्तान, सिंध-पंजाब, राजस्थान और गुजरात का इलाका) पर हमले किए। 1001 से 1025 ई. तक महमूद गजनी के नेतृत्व में ये हमले चलते ही रहे। उमायेद हमलों की ही तरह इनसे भी काफी जान-माल का नुकसान हुआ और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। इस दौरान जिन लोगों ने पलायन किया वही ‘रोमा’ समुदाय के लोग हैं।  

भारत एक विशाल देश है ऐसे में पश्चिमी आक्रांताओं के हमलों से विस्थापित होकर रोमानी लोग पश्चिम की ही दिशा में क्यूँ गए, यह एक सोचने वाली बात है। इतिहासकारों का मानना है रोमानी लोग मुख्य रूप से शिल्पकार और कलाकार लोग थे, जो लोहार, बढ़इ, चमड़े के काम, पशुओं खासकर घोड़ों की देखभाल करने और भविष्य बताने जैसे काम करते थे। साथ ही ये नृत्य-संगीत, चित्रकला, कपड़ा बुनाई और रंगाई जैसी कलाओं में भी निपुण थे। ऐसे में इनके कौशल काफी कीमती थे। भारत के सभी इलाकों में इस तरह के काम करने वाले लोग मौजूद थे तो पूरब या दक्षिण जाने पर उन्हें प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता। अरबी और तुर्क आक्रांता भी इनके विविध कौशलों से परिचित थे, साम्राज्य विस्तार और युद्ध में भी इनका विशेष महत्व था, तो उन्होने भी रोमानी लोगों के पश्चिम की और बढ़ने को बढ़ावा ही दिया। 

दो रोमानी कलाकार, प्लोएस्ती रोमेनिया, 1930; फोटो आभार: Holocaust Encyclopedia

अब बात करते हैं इनके यूरोप पहुँचने की, तो शोधकर्ताओं ने जब सिंती समुदाय की भाषा पर शोध किया तो उन्हें इनमें फारसी भाषा के काफी कम शब्द मिले, जबकि पश्चिम एशियाई देश आर्मेनिया की भाषा के काफी शब्द इनकी भाषा में पाए गए। इसका मतलब ये हुआ कि उमायेद कालीन फारस के इलाकों में सिंती लोग ज़्यादा समय तक नहीं रहे। इसका एक प्रमुख कारण इस्लामिक साम्राज्यों द्वारा गैर-मुस्लिमों पर लगाए जाने वाले जज़िया टैक्स को भी माना जाता है। यह इनकी आय का एक बड़ा साधन था, नए इलाकों पर कब्ज़ा करने का एक मुख्य प्रेरक, जज़िया से होने वाली आमदनी भी थी। जानकारी के लिए बता दें कि 8वीं सदी के मध्य तक उमायेद साम्राज्य में केवल 8 से 10 फीसदी जनता ही इस्लाम की अनुयायी थी, बाकी जनता को जज़िया टैक्स देना पड़ता था। साथ ही 750 ई. में फारस में अबासिद विद्रोह के कारण उमायेद साम्राज्य का पतन होने पर हालात और खराब हुए और सिंती लोग पश्चिम एशिया के आर्मेनिया की और बढ़ चले। 

आर्मेनिया में उस समय बेजेंटाइन साम्राज्य का शासन था जो ईसाई धर्म के अनुयाई थे, उन्होने सिंती लोगों को शरण तो दी लेकिन एक बाहरी शरणार्थी समुदाय के रूप में ही। वहाँ सिंती (और बाद में रोमा) लोगों को ‘अथिंगानी’ (अछूत) कहा गया। बिलकुल अलग दिखने वाले और अलग वेष-भूषा वाले सिंती लोगों की बेजेंटाइन साम्राज्य में एक रहस्यमयी समुदाय की छवि हमेशा बनी ही रही। इसके कुछ फायदे भी थे तो कई नुकसान भी। इनकी कला और कौशल को तो स्थानीय लोगों ने हाथों-हाथ लिया लेकिन इनके अनदेखे धार्मिक रीति-रिवाज और परम्पराएँ वहाँ के ओर्थोडोक्स चर्च को रास नहीं आई। इस कारण यहाँ भी सिंती लोगों का उत्पीड़न किया जाने लगा, लगभग 200 साल यहाँ रहने के बाद 10वीं सदी में फिर से सिंती लोगों ने पलायन किया और ये सीमांत यूरोप के बाल्कन (रूस, युगोस्लाविया और यूक्रेन वाला इलाका) और ग्रीस प्रायद्वीपीय इलाकों तक जा पहुँचे। 14वीं सदी के मध्य तक सिंती लोग यूरोप में जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन में भी बस चुके थे।

इसी तरह रोमा समुदाय के लोग भी 10वीं सदी के आखिरी तक गजनाविद काल के फारस में जा बसे, इनमें से बहुत से लोग वहीं बस गए और उन्होने इस्लाम धर्म अपना लिया। आज के ईरान में लाखों की संख्या में रोमा लोग हैं जिन्हें लोरी समुदाय के नाम से जाना जाता है। लेकिन सिंती लोगों की ही तरह अलग रंग-रूप, वेश-भूषा, और धार्मिक रीति-रिवाजों के कारण यहाँ भी रोमा लोगों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और वो पश्चिम की तरफ पलायन करते रहे। 11वीं सदी के शुरुआती दशकों में वे भी अर्मेनिया पहुँचे जहाँ सिंती लोगों की तरह ही उन्हें ‘अथिंगानी’ (अछूत) कहा गया। बेजेंटाइन साम्राज्य और ओर्थोडोक्स चर्च के प्रभाव से उन्होने इसाइयत को स्वीकार किया। रोमा समुदाय के यूरोप के अंदरूनी इलाकों में पलायन का समय भी 14वीं सदी को ही माना जाता है, इसके कारण स्पष्ट नहीं हैं। इस दौर में तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य के उदय और उनके द्वारा रोमा लोगों पर इस्लाम अपनाने का दबाव या नहीं अपनाने पर जज़िया कर देने का आर्थिक दबाव इसका एक कारण माना जाता है।                 

ये तो थी रोमानी (सिंती और रोमा) लोगों की यूरोप तक पहुँचने की कहानी, लेकिन ऐसा नहीं था कि वहाँ इनके साथ कोई बहुत अच्छा व्यवहार किया गया। रोमानी लोग दिखने में तो अलग थे ही साथ ही इनके रहन-सहन के तरीके, वेश-भूषा, धर्म, और रीति-रिवाज भी यूरोप के बहुसंख्यक काकेशियन (श्वेत) समुदाय से अलग थे। परंपरागत रूप से ख़ानाबदोश जीवन शैली के कारण रोमानी लोगों को अक्सर शक की नज़र से देखा जाता और इनके साथ भेदभाव बहुत ही आम था। इन्हें ऑटोमन साम्राज्य के जासूसों के तरह भी देखा जाता था, यह अपने आप में एक बड़ा विरोधाभास था क्यूंकि ऑटोमन शासकों के उत्पीड़न के कारण ही रोमानी लोग यूरोप में शरण लेने को मजबूर हुए थे। 

यूरोप में रोमा और सिंती लोगों के साथ बड़े पैमाने पर उत्पीड़न किया गया, गुलामों के रूप में इनकी खरीद-फ़रोख्त एक आम बात थी। 1385 का एक दस्तावेज़ आज भी मौजूद है जो पूर्वी यूरोप के वालेखिया (वर्तमान में बुल्गारिया में आने वाला एक इलाका) के एक ईसाई मठ को 40 रोमा परिवार गुलाम के रूप में उपहार देने की पुष्टि करता है। औस्ट्रियन-जर्मन साम्राज्य की रानी मारिया टेरेसा के शासन काल (1740-1780) में रोमानी समुदाय के बच्चों को गैर रोमानी परिवारों को दे दिया जाता था। 17वीं और 18वीं सदी में औस्ट्रियन-जर्मन साम्राज्य में आने वाले स्विट्ज़रलैंड और नीदरलैंड के कई इलाकों में ‘जिप्सी हंटिंग’ का प्रचलन था, 1725 ई. में वहाँ के राजा फ़्रेडरिक विलियम प्रथम ने 18 साल से ऊपर के सभी रोमा लोगों को फांसी पर लटकाने का फरमान सुनाया था, और तो और किसी रोमानी का सर काटकर लाने वाले को राजा द्वारा इनाम भी दिया जाता था। इस तरह यूरोप से रोमानी लोगों को पूरी तरह समाप्त कर देने के प्रयास लगातार होते ही रहे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान केवल यहूदी ही नहीं थे जिन्हें हिटलर जड़ से मिटा देना चाहता था, उसकी लिस्ट में रोमानी या जिप्सी लोगों को भी यहूदियों जितनी ही प्राथमिकता दी गयी थी। यह अनुमान लगाया जाता है कि नाजी जर्मनी के कौंसनट्रेशन कैंपों में लगभग 5 से 8 लाख रोमानी लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इसका सबसे बड़ा असर सिंती समुदाय पर पड़ा, आज यूरोप में इनकी संख्या घटकर केवल 2 लाख ही बची है। 

मध्यकालीन यूरोप में रोमानी लोगों को एक रहस्यमयी समुदाय के रूप में देखे जाने को उनके उत्पीड़न का बड़ा कारण माना जाना चाहिए। दूर पूरब के देश भारत से आए इन लोगों के बारे में कुछ पता ना होना यूरोप के लोगों को भयभीत करता था। तुलनात्मक रूप से देखें तो फारस में लोरी समुदाय के रूप में रोमानी लोगों को पूरी तरह अपनाया भी गया, फारसी लोगों का भारत से संबंध यूरोप की तुलना में ज़्यादा मजबूत था और वो भारतीय परंपरा, कला, और साहित्य को बेहतर समझते भी थे। 10वीं सदी के फारसी साहित्य में लोरी लोगों को नृत्य-संगीत में माहिर गहरे रंग वाले खूबसूरत लोगों के रूप में वर्णित किया गया है। इसी दौर के मशहूर फारसी साहित्यकार फिरदौसी स्थानीय कलाओं और गीत-संगीत पर रोमानी लोगों के प्रभाव की काफी बात करते हैं। रोमानी लोगों की लोहे के औज़ार बनाने की कुशलता ने यूरोपियन लोगों को कड़ी प्रतिस्पर्धा दी, रोमानी लोगों की कुशलता से स्थानीय यूरोपियन लोग आर्थिक रूप से असुरक्षित महसूस करने लगे। इस वजह से उनके बारे में कई अफवाहें फैलाई गई, कहा गया कि ईसा मसीह को सूली पर लटकाने के लिए जिन कीलों का इस्तेमाल किया गया था, वो रोमानी लोहारों द्वारा ही बनाई गयी थी। इस तरह उन्हें भी ईसाई धर्म के दुश्मनों की तरह दिखाने के प्रयास किए गए। 

मध्यकालीन यूरोप में रोमानी लोगों को धर्म के दुश्मन के रूप में तो औध्योगिक क्रांति के बाद के यूरोप में उनकी ख़ानाबदोश जीवन शैली को प्रगति के दुश्मन की तरह देखा गया। यूरोप ही क्या भारत में भी ख़ानाबदोश समुदायों के लोगों को अविश्वास की दृष्टि से ही देखा जाता है। नट, कंजर, बंजारा, और पारधी जैसे लगभग 500 ऐसे समुदाय हैं जिन्हें 1870 के ब्रिटिश कालीन ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ के तहत ‘क्रिमिनल ट्राइब’ या अपराधी जनजाति घोषित किया गया था। 1952 में यह कानून तो हटाया गया लेकिन इन जनजातियों को तब भी ‘विमुक्त अपराधी जनजाति’ ही कहा गया। जब अपने ही देश में ऐसा व्यवहार हो तो गैर मुल्क में जहाँ आपको आपके रंग-रूप, भाषा और संस्कृति के कारण अलग से ही पहचाना जा सके, वहाँ ऐसा होना कोई आश्चर्य वाली बात नहीं है। साथ ही यूरोपियन लोगों द्वारा अश्वेत लोगों का शोषण-उत्पीड़न तो हमें इतिहास के हर दौर में देखने को मिलता है। रोमानी लोगों के केस में अलग बस ये है कि उनका शोषण एशिया, अफ्रीका, अमेरिका या औस्ट्रेलिया में नहीं बल्कि यूरोप में ही किया जाता रहा है।

फीचर्ड फोटो आभार: The Sunday Guardian

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  • सिद्धार्थ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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