हफ्सा नाज़:
कभी हम पर हँसती है, तो कभी हमे हँसाती है,
यह ज़िंदगी हर रोज़ नए रंग दिखाती हैl
पल में बदल जाती है, तो कभी एक-सी रहती है,
इसके खेल है अनोखे, यह सब रंग दिखाती है।
कभी उलझी रहती है, तो कभी ख़ुद ही सुलझ जाती है,
कभी एक मुठ्ठी के जैसे बंद, तो कभी रेत-सी फिसल जाती है।
कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है,
ए ज़िंदगी तू क्यों इतना सताती है?
कभी महका देती है मुझको, तो कभी सूखे पत्ते-सी मुरझा जाती है,
कभी तोहफा देती है खुशियों का, तो कभी गम भी दे जाती है,
यह ज़िंदगी बहुत कुछ दिखलाती है।
कभी मुश्किलें लाती है, तो कभी मुश्किल फ़ैसले करवाती है,
ए ज़िंदगी, तू क्यों इतना सिखाती है?
कभी दोस्त बन जाती है, तो कभी दुश्मन बन जाती है,
कभी गहरी लगती है तो कभी पानी सी साफ़ हो जाती है,
कभी समझ आती है तो कभी बेसुध कर जाती है।
ए ज़िंदगी, तू बड़ा सताती है,
ए ज़िंदगी, तू बड़ा सताती है।

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