ज्योति गोयल:
क्या शादी से पहले लड़की और लड़के का रिश्ता रखना और साथ रहना (लिव-इन रिश्ता) गलत है?
शादी एक बड़ा फैसला है, जिससे पहले आपको अपने साथी को अच्छे से जानना और सोच समझ कर चुनाव करना ज़रूरी है, इसलिए जान-पहचान करना ज़रूरी है। अपने होने वाले साथी की खूबियाँ और खामियाँ दोनों से परिचित होना भी ज़रूरी है। एक बुरी शादी या रिश्ता आपकी ज़िन्दगी के कई अहम साल ख़राब कर सकता है। किसी के साथ ज़िन्दगी बिताने का फैसला सोच-समझ कर, एक सही उम्र के बाद जब आप खुद ज़िम्मेदारी लेने लायक हो जाओ और फैसले लेने को सक्षम हो जाओ तब ही लेना चाहिए। इसलिए लड़का-लड़की का शादी से पहले रिश्ता रखना ज़रूरी है। मेरे अनुसार यह एक अच्छी बात है। शादी से पहले भले ही 4 रिश्ते बुरे निकल जाये या टूट जाये। पर शादी के बाद किसी बुरे रिश्ते को तोड़ पाना बेहद मुश्किल है।
क्या युवाओं को अपने समाज की सोच के अनुसार ही चलना चाहिए उनके खिलाफ नहीं जाना चाहिए?
कोई भी सभ्यता विकसित तब होती है जब वो निरंतर बदलाव या कहें कि समय की माँग के अनुसार बदलती रहे। बदलाव प्रकृति का नियम है। जो ठहर गया वो जम जायेगा, गल जायेगा, अनुपयोगी हो जायेगा और उसका पतन हो जायेगा। एक स्थाई व्यवस्था कभी फलती-फूलती नहीं। अच्छा समाज तब बनता है जब हम निरंतर समाज को पहले से बेहतर बनाने की कोशिशें करते रहें। इसके लिए ज़रूरी है समाज का विश्लेषण, उसके अच्छे-बुरे पहलुओं की खोजबीन और ज़रूरत के हिसाब से परिवर्तन। इसलिए, हमें समाज के साथ हाँ में हाँ मिलाने वाले युवा नहीं बल्कि खुद का दिमाग लगाने वाले युवा चाहिए। जिनमें प्रश्न करने की जिज्ञासा हो, कुछ हटकर सोचने की ललक हो। ताकि वो समाज को बढ़ोतरी की ओर ले जा सकें।
क्या लिव-इन रिश्तों से समाज में बने शादी के नियमों को खतरा है?
ज़रूरी नहीं खतरा हो, हो सकता है उन नियमों में कुछ बदलाव की ज़रूरत हो, या फिर हो सकता है वो नियम कुछ ठीक ना हो, या फिर हो सकता है नयी सोच से नये नियम बनाये जा सकते हों।
अभी हाल में ही सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिश्तों को मान्यता दे दी है। क्या यह मान्यता नहीं देनी चाहिए थी?
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मापदंड के हिसाब से देखें तो ये एक अच्छा कदम है।

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