सौरभ:

लिव-इन रिलेशनशिप के बारे में सुनकर सबसे पहले तो हमारे दोस्तों के दिमाग में आता है कि क्या गैर-शादीशुदा लोग साथ रह भी सकते हैं – क्या ये पाप नहीं? ज़्यादातर लोगों के लिए शादी ज़िम्मेदारी भरा, समाज की मान्यता और परिवार की आशीर्वाद प्राप्त व्यवस्था है, और शादी ना करते हुए साथ रहना सामाजिक दुष्कर्म, घृणित या छुपाने योग्य है। पर सच में ऐसा है क्या? 

आज-कल कई फिल्में आई हैं जिसमे बॉयफ्रेंड-गर्लफ्रेंड प्यार होने के बाद किसी एक के घर रहना शुरू कर देते हैं, या साथ मिलकर एक घर किराए पर ले लेते हैं और घर की ज़िम्मेदारियों को मिलकर निभाने का प्रयास करते हैं। वो साथ कपड़े धोते हैं, खाना बनाते हैं, नाचते-गाते हैं और रोमांस से भरी ज़िंदगी जीते हैं। वहीं अगर बात बिगड़ जाए तो मामला खत्म भी आसानी से कर लेते हैं – और घर-परिवार वालों से बहुत कुछ चर्चा नहीं करते। कई फिल्मों और सीरियलों (यूट्यूब पर टीवीएफ़ कंपनी के सीरियल ‘परमानेंट रूममेट्स’ को देखें) में परिवार के माँ-बाप भी ‘कूल’ दिखाए जाने लगे हैं। इनमें वो खुद ही अपने शादी ना करना चाह रहे युवा बच्चों को किसी के साथ रहने की सलाह दे देते हैं, या खुद ये जानते हुए कि उनके बच्चे लिव-इन में रह रहे हैं, उस बात को नज़रंदाज़ कर देते हैं। पर ये सब फिल्मों या टीवी पर फिर भी थोड़े अच्छे तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। असलियत में तो लिव-इन जोड़ों को हमेशा पकड़े जाने, अपने साथ परिवार या पुलिस द्वारा मारपीट होने, या साथ रह पाने में घर ना मिलने जैसी कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।

शहरों के रिहायशी मोहल्लों में शादीशुदा लोगों को घर दे देते हैं पर गैर शादीशुदा जोड़ों पर नाक-मुँह सिकोड़ते हैं। बैचलर लोगों को अच्छे घर नहीं मिल सकते, क्योंकि उससे दूसरे लड़की-लड़कों का आना-जाना होगा। असल में सारा मामला कंट्रोल का है, और जहाँ माँ-बाप और परिवार से दूर रहते लोग रहते हैं (जैसा कि शहरों में), वहाँ समाज अपने से ही इस तरह के नियमों की रखवाली करता है। किस जगह कौन रह सकता है वो वर्ग तो तय करता ही है (महंगी/सस्ती जगहों पर), पर साथ में जाति और धर्म भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। समलैंगिकता के संबंध के परिपेक्ष्य में भी हमें इस बात को समझना होगा। जब शादी करना ही मान्य नहीं है, या अगर शादी कर लें तो भयानक हिंसा या भेदभाव होने का खतरा हो, तो युवाओं को लिव-इन रिलेशनशिप ही सही कदम लगता है। अंततः साथ रहना और अपनी ज़िंदगियाँ साथ जीना ही तो प्यार करने के लिए ज़रूरी है। 

सामाजिक विषमताओं से भरे इस देश में प्यार करना आसान नहीं है। अक्सर युवा ये मानते हैं कि उनके चुने हुए पार्टनर को उनका परिवार या समाज शादी करवाने के लिए नहीं मानेगा, या वो खुद शादी जैसे रिश्ते के कसे हुए नियमों में नहीं फंसना चाहते तो लिव-इन कपल की तरह रहने लगते हैं। इसके नियम वो खुद बनाते हैं, और खुद तोड़ते हैं। आज़ादी से भरी ज़िंदगी जीने के लिए ऐसे कदम ज़रूरी हैं। 

शादीशुदा जोड़े का भारतीय समाज में उच्च सम्मान है, और गैर शादीशुदा जोड़ा छुप-छुपाकर रहता है। आज-कल बड़े शहरों में फिर भी इसे ‘कूल’ मान लिया जाता है, और कुछ लोग इसे अच्छा भी मानने लगे हैं। पर इसमें कुछ परेशानियाँ भी ज़रूर हैं। सबसे बड़ी मुश्किल है कि लोग जब किसी से रिश्ता बनाते हैं, साथ रहते हैं तो उसमें धोखा खाने का डर बना होता है, खास कर महिलाओं को। कई ऐसे केस बाहर आए हैं जहाँ परिवार से झूठ बोलकर रहते हुए लड़की प्रेगनेंट हो जाती है, और उसका प्रेमी डर से या धोखा देकर भाग जाता है। हिंसा के मामलों में भी ये डर होता है। परिवार सिर्फ नियम नहीं बनाते, सिर्फ निगरानी नही करते, पर सुरक्षा के इंतजाम भी करते हैं। ऐसे में जब उनके परिवार उनके झूठ को पकड़ लेते हैं तो मदद करने से भी मना कर देते हैं। या फिर आगे कहीं और शादी करवा कर मामले को रफा-दफा कर देते हैं। 

इन सबमें राज्य (सरकार, व्यवस्था) की इतनी ही भूमिका है कि वयस्क लोगों को साथ रहने में अगर परिवार या समाज या कोई और अड़ंगे लगा रहा तो उसे दूर करे, और कानून और न्याय व्यवस्था को मज़बूत करे। इसका मतलब पुलिस का राज नहीं है। लोगों को परेशान करना, ज़बरदस्ती पंजीकरण कराना या किसी को परिवार का सहमति पत्र लाने पर मजबूर करना नहीं है। उत्तराखंड में आए यूनिफॉर्म सिविल कोड के ऐसे नए नियम बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं। महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर जाति और धर्म के चश्मे से निगरानी की व्यवस्था को मजबूत करने के लिए बनाए गए हैं। जो चीज़ निजी है उसमे सरकारी दखल कहीं से भी सही नहीं है। जब शादीशुदा लोगों के लिए ऐसे बेकार नियम नहीं लाए गए, तो कानून के सामने तो सभी बराबर हैं – लिव-इन रिलेशनशिप क्यों नहीं?

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  • सौरभ, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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