अनुज बेसरा:
पुरखों ने कहा था
प्रकृति से जुड़े रहना।
पुरखों ने कहा था
प्रकृति से जुड़े रहना।
रोज़ सुबह उठकर बुधनी
खुले बाल, सफेद कपड़े और कोमल मन से
जाती थी सरना,
जहाँ पुरखे हमारे मर के भी
ज़िन्दा थे मसान बनकर।
गोहराती थी उन्हें, पेड़ों को आधार मानकर
समृद्धि के लिए।
बुधवा भी जाता था उसी सरना में
अपने पुरखों के लिए,
काफ़ी पसंद करता था वह बुधनी को।
उसकी यह कोमलता देख
शायद वह उसमें प्रकृति देखता था।
करके नेक दस्तूर ब्याह लाया उसे
अपने घर पूरे रीति-रिवाज से
परिवार के साथ-साथ गाँव वाले भी खुश थे
क्योंकि खस्सी-भात खाए थे
वे भी तन के।
सब कुछ ठीक था
सब खुश थे, गाँव वाले भी
तभी जाति बहिष्कार किए हुए खोईर से
आया एक मंदिर और गिरजा,
आधुनिकता और सभ्य होने का परिभाषा लेकर
चंगाई से चंगा होने
राम कथा से राममय होने का भूत
पुरखों को भुला रहा था,
गिरजाघर की चोटी ऊपर
उठ रही थी,
भगवान के मंदिर का क्षेत्रफल भी बढ़ रहा था
और उनका अतिक्रमण भी।
दोनों के रहनुमाओं का पेट निकल रहा था
लेकिन भक्तों के पेट अभी भी सूखे थे।
चंगाई स्वर्ग नरक का डर
उन्हें दबोच चुका था।
बुधनी अभी भी सरना जाती थी
लेकिन अब संकरे खोईर से, क्योंकि
जिस रास्ते वह जाती थी
वहाँ अब मंदिर बन गया था।
कोरोना की महामारी ने उनसे
उनके पति को छीन लिया था
लेकिन उसके लिए अभी भी वे ज़िन्दा थे
पुरखा मसान बनकर।
उसी सरना में
जहाँ वह नई फ़सल के दाने चढ़ाकर
भीतर पूजा कर, खाने से पहले
एक कांवर जमीन में उसके नाम से गिरा कर
जिंदा रखी थी।
पति के मरने के बाद
सभी की निगाहें उस पर टिकी थीं
क्योंकि जमीन उसकी एकड़ों में थी।
देवर, दिल ही दिल में खेलने लगे थे शतरंज
सफ़ेद कपड़े अब लगने लगे थे, फीके
क्योंकि साज़िश, ज़मीन उसकी हड़पने की
चल रही थी मन में।
एक दिन पड़ोस में
हुई एक बच्चे की मौत।
ठीकरा फोड़ा गया बुधनी के सर पर
सफ़ेद साड़ी तो डायन ही पहनती हैं
सोहराय में नंगा नाचती हैं अंधेरे में!
झूठी कहानियाँ गढ़ने लगे अनेक,
रास्ते से गुज़रते उसके, अब खोईर हो जाती सुनसान –
कहते डायन आ रही है।
देवर खुश था
शतरंज का खेल उसके पक्ष में था
अमावस्या की रात की सुबह
बुधनी का सर अलग था भुजाओं से,
लेकिन लोग खुश थे
कहने लगे पीछा छूटा एक दुष्ट डायन से।
शब्द अर्थ:
खोईर – गली || गोहराना – प्रार्थना करना, याद करना ||
फीचर्ड फोटो आभार: लिंक्डइन

Leave a Reply