सुमन चौहान:
चित्तौड़ के नाम से स्कूल की किताबों में महाराणा प्रताप की बहादुरी की कहानी ही पढ़ाई जाती है। लेकिन यह बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके सैनिक पराक्रमों के पीछे उनके सेनापति, पूंजा भील और उसकी भील सेना का बहुत बड़ा हाथ था। राणा प्रताप के वनवास काल में इन्ही भीलों ने इन्हे अपने घरों में पनाह दी थी।
एक ज़माने में जो भील राजस्थान के बहुत से ज़िलों में राजा थे, आज रोटी, कपड़ा और मकान के लिए भी मोहताज हैं। राजस्थान की भील जनसँख्या एक तरफ अपनी ज़िन्दगी चलाने की आर्थिक जद्दोजहद में फंसे हैं और दूसरी ओर सामाजिक ऊँच-नीच के चलते गाँव की दबंग जातियों के शोषण से जूझ रहे हैं।
इसी जीवन संघर्ष में लगी, चित्तौड़ ज़िले की रुपी बाई भील की कहानी आपके साथ साझा कर रहे हैं।
रुपी बाई भील, नाहरगढ़ पंचायत के भैरूखेड़ा ग्राम में रहने वाली एक बहादुर महिला है। रूपीबाई के पति, बाबूलाल भील का देहाँत 2019 में लंबी बीमारी के बाद हो गया था। पति के अचानक देहाँत के बाद रूपीबाई ने एक टूटे-फूटे कच्चे मकान में अपने दो लड़कों और दो लड़कियों को अकेले ही किसी तरह मज़दूरी करके पाला।
रूपीबाई का पति पास की सीमेंट फैक्ट्री में काम करता था। लम्बे समय से सीमेंट फैक्ट्री में काम करने के कारण उसके फेफड़ों में बीमारी हो गई जिसके कारण उसकी मृत्यु हो गई। आश्चर्य की बात यह है कि भैरूखेड़ा में सब महिलाएं विधवा हैं। इस इलाके के बहुत से आदमियों की कम उम्र में मृत्यु हो जाती है क्योंकि गरीबी के कारण उन्हें पत्थर खदानों में या सीमेंट फक्ट्री में काम करना पड़ता है।
रूपीबाई ने पति की मृत्यु के बाद श्रम विभाग में मुआवजे का केस लड़ा लेकिन सफल नहीं हुई।
रूपीबाई एक निडर महिला है और अपने गाँव की लीडर है। गाँव में जब भी कोई अधिकारी या अन्य कोई व्यक्ति आता है तो वही उससे बात करती है। गाँव की बाकी औरतें रूपीबाई को आगे करती हैं और उसकी बात मानती हैं। उनमें खुलकर बात करने की और बेजिझक नेतृत्व करने की क्षमता है।
इस बार चुनाव के समय उनके गाँव में जो भी नेता आया, उनसे रुपी बाई ने ही बात करी। नेताओं को गाँव की समस्या बताई और उनसे कहा कि गाँव में यह सुविधा नहीं है तो आप इसको करेंगे तो ही हम आपको वोट देंगे। एक निर्दलीय नेता के पक्ष में चित्तौड़ में जुलूस निकल रहा था जिसमें भैरूखेड़ा गाँव से लोगों को लाने की जिम्मेदारी रूपी भाई को दी थी। मैं उस दिन गाँव में गई तो सब औरतें तैयार हो रही थी। कोई बाल धो रही थी, कोई काढ़ रही थी। कोई नए कपड़े पहन रही थी। उनसे पूछने पर पता चला कि सभी इकट्ठा होकर रुपी बाई के साथ चुनाव की रैली में जा रही थी। रूपी बाई ने प्रत्येक घर की औरतों को इकठ्ठा किया और लेकर गई।
रूपी बाई ने नेता से कहा कि वो जहाँ पर रहती हैं वहाँ पर पानी की सुविधा नहीं है। उसे नेता ने पूछा कि बताओ क्या करें हम आपके गाँव में? तो उसने कहा हमें यहाँ पानी की टंकी चाहिए। यहाँ औरतों को बहुत दूर जाना पड़ता है पानी भरने के लिए। चुनाव में वोट मांगने आये नेताओं से वो बहुत बहस करती है। उनके मुँह पर उनसे कहती है कि आपने हमारे गाँव का तो विकास कुछ भी नहीं किया है और मुँह उठाकर वोट मांगने आ जाते हो। जब तुम्हारी ज़रूरत है तब आ जाते हो और हमारे गाँव की हमारी ज़रूरत पर कभी नहीं सुनते और कोई काम कभी पूरा नहीं करते हो। हमारे घरों के पट्टे नहीं बने हुए और आप लोग हमारे घरों के पट्टे बनवा सकते हैं। हम लोग इकट्ठा होकर जिला मुख्यालय पर जाकर हम लोगों ने कलेक्टर को भी ज्ञापन दिया गाँव की भूमि को आबादी में बनाने के लिए और ग्राम पंचायत में भी प्रस्ताव दिया पर अभी तक उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो हम आपको वोट तभी देंगे जब हमारे गाँव के लिए कुछ काम करेंगे आप लोग।
तो उस नेता ने तुरंत उनके गाँव तक पाइपलाइन ठीक करवा के पाइपलाइन लगवा दी और एक सिंटेक्स की टंकी रखवा दिया। जिससे वह औरतें आस-पास की, सब पानी भरने लग गई और उनके पानी की समस्या का आराम हो गया। बाकी समस्याओं को हल करने का भी आश्वासन दिया और चला गया।
रूपी बाई मज़दूरी का काम करती हैं। जहाँ पर भी मज़दूरी मिल जाए – खेत मज़दूरी, मकान बनाने की मज़दूरी, पेड़ लगाने की मज़दूरी और जब वक्त मिलता है तो अपने घर पर सिलाई करती है। गाँव की औरतों के लहंगे और कपड़े सिला करती है। इस तरह वो अपने घर का गुज़ारा चला लेती है।
रुपी बाई एक हिम्मती महिला है और हम उम्मीद करते हैं कि वो अपने गाँव का और विकास करवाएगी।

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