जयश्री:
हम में से बहुत से लोग अंडे बड़ी खुशी से खाते हैं, शहरों में तो यह नाश्ते का सबसे आसान और पौष्टिक साधन है। कोई उबाल कर खाता है तो कोई ऑमलेट बनाकर, कोई लोग ताकत के लिये कच्चा ही पी जाते हैं। लेकिन ये अंडे आते कहाँ से हैं? गाँव में तो बहुत से लोग घरों में ही मुर्गियाँ पालते हैं, लेकिन अंडे वे भी बाज़ार से ही लाते हैं।
अंडे खाने में जितने भी स्वादिष्ट लगें, लेकिन इनके उत्पादन के लिये लाखों आदिवासी और गरीब किसान बंधुआ मज़दूरी करके अपना पसीना बहाते हैं। गाँव से हज़ारों किलामीटर दूर बीमारी और प्रताड़ना झेलते हुए ये हमारे नाश्ते के लिये अंडे उपलब्ध करवाते हैं। आइये कुछ ऐसे मज़दूरों की कहानी जानें।

बलौदा बाज़ार, छत्तीसगढ़ से 1500 किलोमीटर दूर, तमिलनाडू के कृष्णगिरी ज़िले में एक जे.के. पोल्ट्री फ़ार्म नाम का मुर्गी पालन केन्द्र है। छत्तीसगढ़ के बलौदा बाज़ार ज़िले के श्री जगतराम अपनी पत्नी, बच्चे और कुछ अन्य ग्रामवासियों के साथ इस पोल्ट्री फ़ार्म में काम करने के लिये गये। गाँव में खेती कम है तो हर साल ही गाँव के लोग मज़दूरी करने दूसरे राज्यों में जाते हैं। इस मज़दूरी के बिना जीवन चलाना मुश्किल है।
इस साल पास के गाँव के ही एक आदमी ने बताया कि तमिलनाडू में मुर्गी फ़ार्म पर अच्छी मज़दूरी है। आठ घण्टे काम करना होगा, बीच में एक घण्टे की खाने की छुट्टी भी मिलेगी। 350 रुपये प्रति दिन की मज़दूरी मिलेगी और खाना कैन्टीन से मिलेगा। मज़दूरी का पेमेन्ट भी समय-समय पर मिलता रहेगा, साथ ही रोज़ के खर्च के लिये एडवांस भी मिल जायेगा।
1500 किलोमीटर का सफ़र पैदल, बस और ट्रेन से तय करके जगतराम और अन्य चार लोग तमिलनाडू के कृष्णागिरी ज़िले में उस पोल्ट्री फ़ार्म पर पहुँचे। लेकिन वहाँ पर तो अलग ही कहानी थी, सवेरे चार बजे उठकर मुर्गियों को दाना डालने के लिये जाते थे। डेढ़-दो घण्टे लग जाते थे दाना डालने में। फिर वापिस आकर खाना बनाते और वापिस 8 बजे से काम पर लग जाते थे। शाम को कभी 5:30 बजे छुट्टी नहीं मिलती थी, रोज़ ही काम करते-करते शाम के 6.30 से 7 बज जाते थे। वापिस आकर नहाने-धोने का भी समय ठीक से नहीं मिलता था। बीमार होने पर भी छुट्टी नहीं मिलती थी। सुपरवाइज़र कहते थे कि हमें बस काम से मतलब है, काम होना चाहिये, तुम तुम्हारी बीमारी अपने आप देखो। काम के बीच में पानी पीने या पेशाब करने भी जाने नहीं देते थे। मज़दूर के काम के लिये अंदर आने के बाद गेट पर ताला लगा देते थे।
जब भी खर्चे के लिये एडवांस मांगते तो नहीं मिलता था। चालीस दिन काम करने के बाद उन्हें बस दो-तीन हज़ार रुपये ही दिये गये। जगतराम को पाँच हज़ार दिया, लेकिन उसकी पत्नी और लड़की को कुछ नहीं दिया। मांगने पर बोले कि अभी पैसे नहीं हैं, सीधे सीधे काम करों नहीं तो घर भाग जाओ।
इसी तरह चलता रहा। 25 नवम्बर को जब वो लोग काम पर गये तो सुपरवाइज़र बहुत दबाव देकर काम करवा रहा था, गाली-गलौज कर रहा था और जल्दी कर रहा था। सभी लोगों को काम करने में बहुत तकलीफ़ हो रही थी। जब जगतराम ने उससे पैसे मांगे तो उनके साथ फिर गाली-गलौज की गई और सुपरवाइज़र उन्हें धमकाने लगा। डर के मारे जगतराम और उनका परिवार पोल्ट्री फ़ार्म के गेट से बाहर निकलकर कृष्णागिरी ज़िले में आ गये।
कृष्णगिरी में जब वह लोग लेबर आफ़िस गये तो वह बंद था, फिर वहाँ से वह एस.पी. कार्यालय गये। वहाँ उनसे आधार कार्ड मांग कर उनका मूल निवास और मोबाइल नम्बर लिखा और उन्हें एस.पी. से मिलाया गया। उनकी बात सुनकर एस.पी. ने पूछा कि वह क्या चाहते हैं। जगतराम ने फिर बताया कि हमारी मज़दूरी नहीं दी गई है, वह ही हम चाहते हैं। एस.पी. ने कहा कि मैं फ़ोन कर के पता करता हूँ, आप लोग बुधवार को आइये। जगतराम ने फिर उन्हें बताया कि हमारे पास खाने के लिये भी पैसे नहीं हैं, न ही रहने के लिये कोई जगह। हम लोग बस स्टैण्ड पर ही पड़े हैं। तो एस.पी. ने कहा कि कैसे भी थोड़े दिन ऐडजस्ट कर लो। जब इतने बड़े अधिकारी ने ऐसा बोल दिया तो उनकी बात सुनकर जगतराम और उनका परिवार मजबूर होकर वापस बस स्टैण्ड पर आ गये। वहाँ दो दिन और दो रात उन्हें भूखे ही रहना पड़ा। फिर जब भूख नहीं सहन हुई तो फिर वह कुछ काम की तलाश में इधर-उधर निकल गये। उन्हें डर भी लगा रहता कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाये, कोई पकड़ न ले अनजान जगह में। तीन लड़के ऐसी ही तकलीफ़ के चलते अपना एक-डेढ़ महीने का वेतन छोड़ कर वापिस गाँव चले गये। उनका मोबाइल भी सुपरवाइज़र नें रख लिया था।
ऐसी बेसहारा स्थिती में परेशान होकर जगतराम नें बलौदा बाज़ार की सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री राजिम केतवास को फ़ोन किया और मदद मांगी। राजिम बहन के माध्यम से यह बात पश्चिम भारत प्रवासी मज़दूर संघ की कार्यकर्ता सुश्री जयश्री बहन को पता चली। कुछ फ़ोना-फ़ोनी के बाद पता चला कि तमिलनाडू सरकार ने प्रवासी मज़दूरों की शिकायतों को हल करने के लिये एक समिति गठित की हुई है जिसका नाम ‘प्दजमतेजंजम डपहतंदज ॅवतामते ब्ववतकपदंजपवद ब्वउउपजजममण्’ है, उस समिति के अध्यक्ष को फ़ोन किया गया। समिति के माध्यम से यह शिकायत वहाँ के लेबर अधिकारी के पास पहॅुंच गई और उसके आगे वहाँ से श्रम मंत्री के सचिव के पास पहुँची। शायद तमिलनाडू सरकार नें ऐसा नियम बनाया है जिसमें प्रवासी मज़दूरों की शिकायत सीधे मंत्री के पास पहुँचती है। मंत्री के सचिव ने कृष्णागिरी ज़िले के कलेक्टर के पास इस बात की सूचना भेजी, जिन्होने फिर तहसीलदार का खबर दी। उसी रात को तहसीलदार का एक आदमी इनके पास बस स्टैण्ड पर आया, ऐसा पहले भी देखा गया था कि तमिलनाडू सरकार बहुत ही तेज़ी से प्रवासी मज़दूरों की शिकायतों पर काम करती है।
तहसीलदार के आदमी ने बस स्टैण्ड से ही जे.के. पोल्ट्री फ़ार्म के मैनेजर से बात की। जगतराम के साथ कॉन्फ़रेन्स कॉल के माध्यम से बहुत देर तक पैसे के हिसाब को लेकर झिका-झिक चलती रही। अन्ततः मैनेजर ने ऑनलाइन पैसे जगतराम को ट्रान्सफर कर दिये।
हालाँकि उन मज़दूरों को कुछ फ़ायदा हो गया, लेकिन उनका पूरा पैसा शायद नहीं मिल पाया, ओवरटाइम का भी पैसा नहीं मिला। अधिकारी बहुत चुस्त हैं, लेकिन यही समझ आया कि वे शायद मज़दूरों को जल्दी से जल्दी वापस भेजना चाहते हैं और मामले को निपटाने में लग जाते हैं। वहाँ पर कोई विश्वसनीय साथी न होने से ऐसा हुआ। पहले के अनुभव में तमिलनाडू के साथी ने मध्यस्तता की थी तो पूरा बकाया पैसा और वापिस आने की व्यवस्था आदि भी हुई थी।
इस तरह हम देख रहे हैं कि देश भर में हर काम में प्रवासी मज़दूरों को बहुत शोषण हो रहा है। चाहे अंडे हों चाहे गन्ना खेत हों या फ़ैक्ट्री, कांट्रैक्ट मज़दूरों से काम करवाने का चलन देश में आम हो गया है। इसी के साथ मज़दूर कानूनों में बदलाव और मज़दूरों के हकों को लगातार कम करते रहने वाले कानूनों के आने से, आने वाले समय में गरीब वर्ग के मज़दूरों का बहुत बुरा हाल होने वाला है। देश के आदिवासी इलाके और गरीब ज़िले एक तरह से पूंजीवादी विकास प्रणाली के अनौपचारिक उपनिवेश बनते जा रहे हैं जहाँ से सस्ते मज़दूर मिलते रहेंगे।
फीचर्ड फोटो आभार: जस्ट डायल

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