देवेंद्र बघेल:
दलित आदिवासी मंच संगठन के साथी देवेंद्र बघेल व राज्य के कुछ अन्य संगठनों के करीब 8 साथी भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन पर झारसुगुड़ा जाने वाली ट्रेन का इंतजार कर रहे थे। ये इंतजार भी काफी लंबा था, पूरे 2 घंटे की देरी के साथ 12 बजे ट्रेन की स्टेशन आने की घोषणा हो चुकी थी, जिसके बाद सभी साथी सामान को छोड़कर अलग-अलग जगहों पर अपने मोबाईल फोन का सदुपयोग करने में व्यस्त हो गए।
वहीं मेरे पास ही करीब 30 मज़दूरों का एक समूह बैठा हुआ था, इसमें नौजवान, बूढ़े और बालक सभी थे, जो बिहार के गया ज़िले के रहने वाले थे। इन मज़दूरों के पास ही 2 लड़के कान में इयरफोन लगाए मोबाइल चालू करके, उन मज़दूरों को धमका रहे थे। काफ़ी देर तक मैं इस तमाशे को देखता रहा, मैंने छुपकर उनकी कुछ फोटो भी लेने का प्रयास किया। मौका देखकर मैंने एक मज़दूर से इस घटना क्रम के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उन सभी को यहाँ एक दलाल के ज़रिये गाँव से मज़दूरी करने के लिए भुवनेश्वर भेजा गया था। इन्हें कार्यस्थल पर ठहराया गया, जहाँ ना रहने का ठिकाना था और ना ही खाने-पीने की व्यवस्था।

मज़दूरों ने हिम्मत करके अपने गाँव जाने की योजना बनाई और किसी तरह स्टेशन पहुँच गए, लेकिन उनके पीछे-पीछे ही ठेकदार के गुर्गे भी पहुँच गए। वो उनको धमकाकर वापिस कार्यस्थल पर ले जाने का दबाव बना रहे थे, कभी उनके बैग को छीना जा रहा था तो कभी उनका टिकट। ये तमाशा देखते-देखते मेरे सब्र का बांध टूट ही गया, और अन्य राज्य के संगठन के साथियों के साथ मिलकर ठेकेदार के गुर्गों पर चढ़ाई शुरू कर दी। जो गुर्गे दादागिरी कर रहे थे वे चुपचाप एक तरफ जाकर खड़े हो गए। हमारा साथ मिलते ही मज़दूरों की हिम्मत भी बढ़ी। अंत में सभी मज़दूरों को बिना टिकट ही उनके गाँव चाव, पोस्ट गोपालखेड़ा, थाना बारहचट्टी, ज़िला गया (बिहार) के लिए रवाना कर दिया गया।

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