फरीद आलम:
ई.वी. रामासामी पेरियार का जन्म 17 सितम्बर 1879 के दिन तमिलनाडु के इरोड कस्बे के एक रूढ़िवादी द्रविड़ व्यापारी परिवार में हुआ था, जो मन्दिर व धर्मशालाएं बनवाने के उपाय और ऐसे परोपकारी कार्यों के लिये खुलकर धन खर्च किया करता था। पेरियार का उस समय तत्कालीन ब्राह्मणवादी धार्मिक व्यवस्था से मोहभंग हो गया, जब 1904 में वे धार्मिक श्रद्धा व आस्था से ओतप्रोत तीर्थयात्री बनकर काशी आए थे। लेकिन यहाँ की धर्मशालाओं के संचालकों ने पच्चीस वर्षीय परिपक्व पेरियार के साथ बेहद अपमानजनक तथा नस्लीय भेदभावपूर्ण व्यवहार किया और उन्हें सामाजिक अस्पृश्यता का दंश झेलते हुए धर्मशाला के बाहर फेके गये जूठे पत्तलों से कुत्तों संग बचे-खुचे जूठन साझा कर अपनी क्षुधा तृप्त करके अपने प्राण बचाने को मजबूर होना पड़ा था। यह सितम तब हुआ जब उस धर्मशाला की दीवार पर उकेरा हुआ था, “यह धर्मशाला सर्वोच्च वर्ण अर्थात ब्राह्मणों के लिए है और इस धर्मशाला का निर्माण तमिलनाडु के एक अमीर द्रविड़ व्यापारी ने करवाया है।” इस घटना ने पेरियार को अन्दर तक झकझोर कर रख दिया। यह प्रश्न उनके मन मस्तिष्क को लगातार सुलगाने लगा कि आखिर इनका व्यवहार इतना क्रूर क्यों है कि ये द्रविड़ समेत अन्य समुदाय के लोगों को भूखा मारने तक से गुरेज़ नहीं करते और उनकी जाति-व्यवस्था लोगों की जान तक ले लेने का मिजाज़ रखती है?
काशी में मिले अपमान ने उनके हृदय में गहरे ज़ख्म कर दिये। इस कारण ने उनके मन में आर्य नस्ल और उसके असंख्य देवी-देवताओं के प्रति गहरी घृणा पैदा कर दी। सन्यास का इरादा कर चुके पेरियार गृहस्थ जीवन में वापस लौटे और ई.वी. रामासामी नायकर मंडी नाम से निजी व्यापारिक प्रतिष्ठान कायम किया। इसके बाद पेरियार ने द्रविड़ संस्कृति और अछूत वर्ग के आर्थिक, समाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक उत्थान, अधिकार और जागरूकता के संघर्षों को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। उसके बाद कोई ऐसा वर्ष और कोई ऐसा अवसर नहीं छूटा जब उन्होंने अपने उद्देश्य के ताक़्क़ुब में किसी भी अंजाम से बेखौफ-ख़तर सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलनों की झड़ी लगा दी। बड़ा से बड़ा आर्थिक-सामाजिक नुकसान या जेल की यातनाओं का भय भी उनके चट्टानी इरादे के सामने बौने साबित होते।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें उच्च सरकारी ओहदे से विभूषित किया। उनको मानद मजिस्ट्रेट भी बनाया। इसके अतिरिक्त उन्हें ज़िला बोर्ड, तालुका बोर्ड, शहरी बैंक, देवस्थानम, शासकीय पुस्तकालय, युद्ध भर्ती समिति, कृषिविदों के संघ, व्यापारी संघ, महाजन स्कूल समिति सहित लगभग 29 सरकारी संस्थानों में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव जैसे पद सम्भालने के अवसर भी मिले। वे विभिन्न राजनैतिक दलों के शीर्ष पद पर रहे। वे 1918 में ईरोड नगरपालिका के चेयरमैन बने और अनेक प्रभावशाली कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जिसमें पेयजल योजना विशेष उल्लेखनीय है।
असहयोग आंदोलन में गांधीजी के साथ जमकर भागीदारी किया और चेयरमैन पद से त्यागपत्र देकर कांग्रेस के सदस्य बन गये, खादी के आह्वान पर तुरंत विदेशी वस्त्र त्यागकर खादी का धारण कर लिया। 20,000 वार्षिक आय वाले पारिवारिक व्यापार को बन्द कर दिया। गरज़ कि जीवन के हर पहलू में सादगी को अपना लिया।
उन्होंने शराबबंदी लागू करने के लिये तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आंदोलन चलाए जिसमें उनकी पत्नी और बहन भी उनकी सहयोगी थी। अपने विशाल प्रांगण से 500 ताड़ के पेड़ कटवा के फेंकवा दिये। 1922 में वे तमिलनाडु कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। जाति व्यवस्था से नाराज़ पेरियार ने इसी वर्ष ‘मनुस्मृति’ और ‘रामायण’ जैसी पुस्तकों को आग के हवाले करने की घोषणा कर दी क्योंकि उनका मानना था कि इन पुस्तकों का प्रयोग पुरोहित समुदाय द्वारा द्रविड़ संस्कृति के विरुद्ध धार्मिक हथियार के तौर पर किया जाता है।
1923 में कांग्रेस की सदस्यता वाले पेरियार कांग्रेस की नाराज़गी की परवाह किये बगैर पंगल के राजा की अध्यक्षता वाली जस्टिस पार्टी के इसलिये प्रशंसक समर्थक बन गये क्योंकि जस्टिस पार्टी सरकार मद्रास राज्य विद्यार्थी परिषद ने एक अधिनियम पारित किया जिसके तहत हिन्दू धार्मिक बन्दोबस्ती बोर्ड बनाया जाना था जो हिन्दू मंदिरों में ब्राह्मणों द्वारा किये जाने वाले शोषण का उन्मूलन करता। 1924 में पेरियार ने केरल के धार्मिक शहर वायकाम में ब्राह्मणों द्वारा प्रयोग की जाने वाली अस्पृश्यता जैसी क्रूर व्यवस्था के खात्मे के लिये विरोध-प्रदर्शन का आयोजन किया। यह वह स्थान था जहां मंदिर के आसपास की गलियों में इड़वा समुदाय के साथ साथ किसी भी निचले तबके के लोगों को फटकने की भी इजाज़त नहीं थी। यह आंदोलन गांधी जी और सी राजगोपालाचारी जी के निमंत्रण पर कायदे कानून की अवमानना करते हुए पेरियार के नेतृत्व में की गयी थी। इस मामले में उन्हें दो बार सजा सुनायी गयी। वे 6 महीने जेल में कैद रहे लेकिन वर्ष भर लम्बे चले सत्याग्रह भी उनके कामयाबी के विश्वास को न डगमगा सका और बाज़ी पेरियार के हाथ रही। मठाधीशों को इस जुल्म से दस्तकश होना पड़ा और मंदिर की उन तंगदिल गलियों को अस्पृश्यों के लिये खोलना ही पड़ा। इस प्रकार वे सामाजिक न्याय के योद्धा बन कर उभरे और अपने जीवनकाल में अनगिनत आंदोलन चलाए जिनका विवरण इस सीमित स्थान में समाहित करना सम्भव नहीं।
उन्होंने पत्रकारिता के उच्च आदर्श स्थापित किये और “कुदी अरासु” नामक तमिल पत्रिका का लम्बे समय तक सम्पादन किया। 29 मार्च 1931 के सम्पादकीय में भगत सिंह की शहादत पर तत्कालीन वायसराय लाॅर्ड इरविन के खिलाफ भी कलम चलाने से परहेज नहीं किया। किसी भी स्तर के दमन-उत्पीड़न में वे सदैव दमित-उत्पीड़ित के साथ खड़े रहने के अपने सिद्धान्त से न एक सूत विचलित हुए, न समझौतावादी नीति अपनायी। इसमे दो राय नहीं कि उन्होंने भारतीय समाज और व्यक्ति के आधुनिकीकरण के लिए अवरोध बने अज्ञानता, अन्धविश्वास, रूढ़िवाद और निरर्थक रीति-रिवाजों के ख़ात्मे को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया।
फिर आया 1944 का वह दौर जब द्वितीय विश्व युद्ध अपने चरम पर था। एक ओर नाज़ीवाद-फ़ासीवाद के नायक द्वय हिटलर-मुसोलिनी आर्य श्रेष्ठता के सिद्धांत से अपनी नस्लीय सुप्रीमेसी को पूरे विश्व पर हुकूमत के लिए प्रकृति द्वारा वरित साबित करने के घिनौने मकसद से अपने देश और युरोप में युद्ध और रक्तपात का तांडव मचाए हुए थे। वहीं भारत के आर्य संस्कृति, सैन्य शिक्षा और सनातन धर्म रक्षा व उसकी श्रेष्ठता के अलमबरदार बी एस मुञ्जे, वी डी सावरकर, केशव हेडगेवार और गुरू गोलवरकर युरोप में चलाए जा रहे आर्य श्रेष्ठता के सिद्धांत की प्रयोगशाला भारत में कायम कर यहां भी नफरती प्रयोग करने की फिराक में युरोप में सरगर्दा फिर रहे थे और भारत में आर्य वर्चस्व की भावना से संगठित हो रहे थे। हिन्दू महासभा के प्रतिनिधि के तौर पर बी एस मुञ्जे साहब द्वितीय गोलमेज कांफ्रेंस में शिरकत से लौटते समय इटली चले जाते हैं और वहाँ के फासीवादी तानाशाह बेनिटो मुसोलिनी से मुलाकात के बाद फ़ासीवादी प्रशिक्षण शिविरों का दौरा करते हैं और उनके गणवेश व विचारों से इतने प्रभावित होते हैं कि भारत आकर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को उसका अक्षरशः पालन करने का मार्ग सुझाते हैं।
हर ओर नये आर्य संस्कृति की श्रेष्ठता के सिद्धांत का ढोल पीटा जा रहा होता है और विश्व मंदी के दौर में इटली और जर्मनी के छद्म आर्थिक विकास का कसीदा पढ़ रहे होते हैं। ऐसे लोमहर्षक वैश्विक आर्य उत्पात के वातावरण में पेरियार का तमिल भाषा में रचित “रामायण पादिरंगल” ( रामायण के पात्र) रामायण के मुख्य पात्रों के चरित्र का विभिन्न रामायणों के आलोक में परिशीलन तथा मुख्य पात्रों का बेबाक चरित्र चित्रण, दक्षिण भारत की द्रविड़ संस्कृति को आक्रामक आर्य संस्कृति के सम्भावित वर्चस्ववादी खतरों व चुनौतियों के प्रति प्रतिरक्षित कर देने का सावधानीपूर्वक लिया गया दूरदर्शी कदम है। कोई भी विचारक अपने काल और परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता और पेरियार अपने समय की परिस्थितियों को भाप लेने की बेहतर अवस्था में थे। अपनी रचनात्मकता के माध्यम से उन्होंने रामायण के पात्रों के दैवत्य पर गम्भीर प्रश्न खड़े कर दिये। वे न केवल रामायण महाभारत जैसी पुस्तक को कपोल कल्पित साबित कर उसे अरेबियन नाइट्स और पंचतंत्र की कहानियों के समकक्ष ला पटक देते हैं, बल्कि उसके पात्रो को भी सामान्य मानवीय गुणों से भी कमतर सिद्ध कर देते हैं जो उत्तर भारत में हिंदी पट्टी के आर्य हिंदू धारणा- उनके दैव्यगुण सम्पन्न होने- के सर्वथा विपरीत है।
विद्वतापूर्ण विवेचना के माध्यम से वे पात्रों के देवत्व पर न केवल अनेक विवेकपूर्ण प्रश्न खड़े करते हैं बल्कि उन पात्रों के इस हैसियत को विद्वतापूर्ण चुनौती देते हुए उसी कथित धार्मिक पुस्तक में वर्णित पात्रों के अभिकथनों से खारिज भी कर पाने में सफल हैं। उनकी भाषा अवश्य चुटीली और कठोर है, और कहीं-कहीं चरित्र चित्रण से आगे चरित्र हननता व हीनता को भी पार करती महसूस होती है। विशेषकर सीता के लिए एक सामान्य स्त्री के दर्जे के भी सम्मान का लिहाज नहीं रखती है जो आपत्तिजनक प्रतीत हो सकती है, किन्तु लेखक द्वारा विवेकपूर्ण और विद्वतापूर्ण उठाए गये तार्किक प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं है। यह पुस्तक द्रविड़ संस्कृति का बखूबी बचाव करती है तथा लेखक के उद्देश्य जानबूझकर हिंदुओं की भावनाओ को ठेस पहुंचाने के बजाए अपनी जाति के लोगों के साथ हुए अन्याय को दिखाना प्रमाणित करती है। तमिल भाषा में लिखी यह पुस्तक द्रविड़ लोगों में बहुत लोकप्रिय हुई जिससे उत्साहित होकर लेखक ने 1959 में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद “रामायणः ए ट्रू रीडिंग ” के नाम से प्रकाशित किया जिसने एक बड़ा पाठक दायरा बनाया। लेकिन रचयिता का असल मकसद उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में अंधभक्ति की दीवार को भेदकर करोड़ों दलितों तक पहुंचना संतोषजनक नहीं रहा यद्यपि उन्होंने हिन्दी पट्टी के अपने दो विश्वासपात्रों चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु और ललई सिंह यादव को अपने कुछ लेख और यह पुस्तक प्रकाशित करने की अनुमति दे दी थी।
हिंदी में इसका अनुवाद किसी रामाधार जी ने किया और हिंदी पट्टी में पाठकों तक पहुंचाने का बीड़ा उठाया, पेरियार के उत्तर भारतीय अनुयायी व अर्जक संघ से जुड़े लोकप्रिय समाजिक कार्यकर्ता ललई सिंह यादव जी ने। उन्होंने 1968 में न केवल हिंदी में अनुदित “सच्ची रामायण” को प्रकाशित कराया बल्कि इसके प्रचार-प्रसार में भी जी जान से जुट गये। इस पुस्तक ने गोया ततैय्यों (भिंडों) के छत्ते में आग लगा दी, राम-पूजक उत्तर प्रदेश में हड़कंप मच गया, तत्कालीन प्रदेश सरकार तुरत हरकत में आ गयी, पुस्तक विवाद के चपेट में समा गयी। दिसम्बर, 1969 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस किताब को हिन्दुओं की धार्मिक भावना को आहत करने के आरोप में प्रतिबन्धित कर दिया और हिंदी अनुवाद की सारी प्रतियां ज़ब्त कर ली।
सरकार की ज़ब्ती और प्रतिबन्ध चुंगल से मुक्त होने के लिये लम्बी अदालती रस्साकशी से गुजरना पड़ा। ललई सिंह यादव ने जब्ती के आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुकदमा जीत गये। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए 16 सितंबर 1976, को सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए सरकार की अपील को खारिज कर दिया। लेकिन कोर्ट के आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने “सच्ची रामायण ” से प्रतिबंध नहीं हटाया। 1995 में पेरियार को अपने प्रमुख आदर्शों में गिनने वाले कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी सत्ता में आयी तब जाकर इससे प्रतिबंध हटा।
लेकिन फिर भी पेरियार के विचार हिंदी भाषी जनता तक नहीं पहुँच सके। कांशीराम की मुख्य प्रतिबद्धता दलित समुदाय की राजनीतिक हिस्सेदारी तक सीमित थी। वे दलित नायकों की मूर्तियों की स्थापना, मेलों का आयोजन तो कर गये लेकिन उनसे नायकों के मूल विचारों को जनता तक पहुँचाने का बीड़ा उठाने की आस लगाना बेमानी था। यही कारण था कि 2007 में जब भारतीय जनता पार्टी द्वारा “सच्ची रामायण” का एक बार फिर विरोध हुआ तब सत्तारूढ बसपा अपनी मुख्यमंत्री मायावती सहित पेरियार से कन्नी काट गयी और यूपी असेम्बली में चलते सत्र में मायावती ने बयान दे डाला कि ” बसपा तथा सरकार का पेरियार की ‘सच्ची रामायण’ की बिक्री से कोई लेना-देना नहीं है। भाजपा मामले का राजनीतिकरण कर रही है।” जबकि फायरब्राण्ड भाजपा नेता विनय कटियार यह कहते न थकते थे कि “कमल के फूल से ही गणेश जी की सूंड़ सुशोभित होती है।” परिणामतः लखनऊ के सभी सम्भावित पुस्तक बिक्री केंद्रों, स्टालों से रातों-रात “सच्ची रामायण” की प्रतियां गायब हो गयी और राजनैतिक गठजोड़ की करामात से एक बार फिर यह पुस्तक अघोषित प्रतिबंध व जप्ती के गाल में समा कर हिंदी भाषी जनता के पठन से वंचित रह गयी। कफ़े अफसोस मलते साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में काम कर रहे समतावादी कार्यकर्ताओं के मुंह से यही निकला कि “घर को आग लग गयी, घर के चिराग से।”
उन्होंने चौरानवे वर्षों से कुछ अधिक की आयु पायी लेकिन वृद्धावस्था में भी उनकी सक्रियता का स्तर कभी सुस्त न हुआ। मृत्यु से 5 दिन पूर्व यानि 19 दिसम्बर 1973 तक उनकी राजनैतिक सक्रियता अद्भुत अतुलनीय बनी रही जब चेन्नई के त्यागराज नगर में उन्होंने अपना अंतिम भाषण यूँ दिया जैसे बेहद स्मरणीय ढंग से मृत्युपूर्व अपना बयान दे रहे हों। 24 दिसम्बर 1973 को दुनिया के महान विचारकों में से एक और दृढ़ तर्कवादी पेरियार ने अपनी अंतिम सांसे लेने से पूर्व सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन की ऐसी विरासत छोड़ी, जो आने वाली पीढ़ी का मार्गदर्शन करती रहेगी। पेरियार को प्रस्तुत कृति “सच्ची रामायण” के रचने में उनके अथक प्रयास व विभिन्न रामायणों के चालीस वर्षों के गहन अध्ययन-संघर्ष की आत्मानुभूति से गुजरते हुए उन्हें विनम्र श्रद्धाञ्जलि अर्पित करता हूँ। वे करोड़ो वंचित शोषित दमित लोगों के नायक व प्रेरणास्रोत बन चिरमार्गदर्शक बने रहेंगे।

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