अवध पीपल्स फोरम, उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद (अब अयोध्या) में स्थानीय युवाओं के साथ शिक्षा, वैज्ञानिक चेतना, रोज़गार और स्वास्थ्य जैसे कई मुद्दों आर काम कर रहा एक संगठन है। ‘मशीनीकरण और बेरोज़गारी’ के विषय पर आयोजित चर्चा के दौरान युवाओं ने इस पर आपण विचार व्यक्त किए। उन्हीं में से आरज़ू और मो. नसीम के विचारों को यहाँ संकलित किया गया है।

जागृति:

वैसे तो आपने बाज़ार में तरह-तरह के जूते देखे होंगे, क्या आपने कभी सोचा है कि ये जूते कहाँ बनते होंगे? मैंने अपने शहर फ़ैज़ाबाद में जूते का कारोबार देखा है, यहाँ पर आज से करीब 17 साल पहले तक जूते के बहुत सारे कारखाने थे, जिसमें बड़ी संख्या में हाथों से चमड़े के जूते बनाये जाते थे। हर कारखाने में अलग-अलग तरह के जूते बनाने वाले कारीगर होते थे, इसके अलावा जूते के सोल को बनाना, जूते की बनावट में कटिंग करना और उसकी सिलाई का काम आदि सभी मज़दूर हाथ से करते थे। एक कारखाने में लगभग 20 से 25 मज़दूर काम किया करते थे और हाथ के बने इन जूतों की विभिन्न शहरों में भी मांग हुआ करती थी। इस कारण हमारे शहर में काफी मज़दूरों को रोज़गार मिलता था, जिससे वो अपना जीवन-यापन करते थे।

धीरे-धीरे आधुनिकीकरण के कारण शहरों में जूते बनाने की फैक्ट्रियाँ बनने लगी और मशीनों द्वारा काम शुरू हो गया। मशीनों द्वारा कम समय और कम मज़दूरी में ही जूते बन जाते थे, इससे मशीनों के काम को काफी बढ़ावा मिला, और पुराने कारखानों की संख्या में भारी कमी आई। आज हमारे शहर में बस 4 से 5 ही कारखाने बचे हैं, इन बचे हुए कारखानों में भी जूतों की माँग बहुत कम हो गयी है।

इन कारखानों के बंद होने के कारण यह बताया गया कि बाज़ार में जूते की माँग के अनुसार पूर्ति नहीं हो पाती थी। इन कारखानों में सभी काम हाथ से होने के कारण जूते बनाने में समय ज़्यादा लगता था और समय से अर्डर पूरा होना मुश्किल हो जाता था। साथ ही हाथ के बने जूतों में मज़दूरी भी ज़्यादा लगती थी, इस कारण इनका दाम मशीनों से बने जूते से थोड़ा ज़्यादा भी होता था। इन सभी कारणों से लोग इन जूतों की माँग कम करने लगे। इन आधुनिक मशीनों से लैस फैक्ट्रियों में ज्यादा मज़दूरों की ज़रूरत न होने के कारण मज़दूरी भी कम देनी होती थी, इससे जूते सस्ते दामों में बिकने लगे और फैक्ट्रियों द्वारा बने जूतों की मांग बाज़ारों में ज्यादा होने लगी।

अगर देश में बेरोज़गारी की बात करें तो मशीनों का लगातार बढ़ता इस्तेमाल, इसका एक मुख्य कारण है। आधुनिकीकरण के कारण रोज़गार के अवसर घटे गए हैं। अब 10 मज़दूरों का काम एक ही मशीन कम समय में कर देती है, इस प्रकार की प्रणालियाँ इस देश में बेरोज़गारी का एक मुख्य कारण भी बनती हैं। जूते के अलावा ऐसे कई सारे व्यवसाय हैं जिनमें मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण मज़दूरों को रोजगार मिलना या तो कम हो गया है या बंद हो गया है, जो वर्तमान समय की बड़ी समस्या है।

फ़ोटो आभार: filmingindo.com

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  • जागृति, दिलकुशा फैज़ाबाद की रहने वाली हैं और 5 सालों से समुदाय में शिक्षिका के रूप में काम कर रही हैं। जागृति उन किशोरियों को पढ़ाने का काम करती हैं जो कई कारणों से स्कूल नहीं जा पाती या जिन को स्कूल छोड़ना पड़ता है। वे महिलाओं के कानूनी हक-अधिकारों को लेकर फैज़ाबाद के 10 समुदायों में अवध पीपुल्स फोरम के साथ काम करती हैं। जागृति ने एन.टी.टी किया है और संविधान मित्र मंडली के समूह का संचालन करती है। इनके साथ 500 किशोरियाँ जुड़ी है जो अपनी ज़िंदगी को शिक्षा के माध्यम से बेहतर कर रही है।

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