नीरज गुर्जर:

5G के दौर ने मानो ना केवल समय को बल्कि किशोरियों के सपनों को भी पंख लगा दिये हैं। अब तक तकनीक की पहुँच केवल पुरुष वर्ग तक ही सीमित थी, वहीं आज के दौर में सरकार, प्राइवेट और सामाजिक संस्थानों के प्रयासों और युवा किशोरियों की जागरूकता से ग्रामीण क्षेत्रों तक भी डिजिटल संसाधनों की पहुँच बढ़ी है। 

इस संदर्भ में अजमेर की एक सामाजिक संस्था ‘महिला जन अधिकार समिति’ द्वारा चलाए जा रहे टेक सेंटर की युवा फेसिलिटेटर से डाटा इकट्ठा करने पर पता चला कि अब तक उन्होंने अलग-अलग कार्यक्रमों के ज़रिये अजमेर के ग्रामीण क्षेत्रों की लगभग 2000 से भी अधिक किशोरियों को डिजिटली एजुकेट किया है। इन कार्यक्रमों में – 

  • डिजिटल किशोरी बने सक्षम– कंप्यूटर लर्निंग कार्यक्रम
  • ग्रासरूट्स जर्नलिज्म 
  • ईच वन टीच टेन – मोबाइल लर्निंग जैसे कोर्स सम्मिलित हैं। 

युवा एजुकेटर मेरी सदुमहा और कामिनी कुमारी बताती हैं कि ये सभी कोर्स तकनिकी लर्निंग की फेमिनिस्ट अप्रोच पर आधारित हैं, जिसमें लड़कियाँ न सिर्फ तकनीकी ज्ञान हासिल करती हैं बल्कि अपने बारे में, अपने फैसले खुद लेने और अपने अधिकारों के बारे में भी सीखती हैं। वे अपने नागरिक अधिकारों के साथ अपने जीवन के बारे में सपने बनाती और उन्हें पूरा करने के प्रयास करती हैं। इन कोर्सों से अलग-अलग गाँव और बस्तियों की लड़कियाँ जुड़ी हुई हैं। 

सेंटर पर आ रही लड़कियों ने अपने विचार हमारे साथ साझा किए। अजमेर क्षेत्र के पदमपुरा गाँव में रहने वाली 19 वर्षीय माया गुर्जर बताती हैं, “संस्था द्वारा पत्रकारिता कोर्स के लिए मुझे साल 2021 में स्मार्टफोन दिया गया था। यह पहली बार था जब मैंने करीब से छूकर फोन को देखा और उसे चलाया भी। उस समय मुझे ऐसा लगा मानो मैं एक नई दुनिया से जुड़ गई हूँ।” आँखों में चमक भर, माया आत्मविश्वास से भरे हुए शब्दों से आगे कहती हैं, “वर्तमान समय में मुझे उस मोबाइल के सभी फीचर्स के बारे में पता है और मैं स्वयं को डिजिटली एजुकेटेड मानती हूँ, क्योंकि अब मुझे किसी भी सरकारी योजना के बारे में जानने के लिए ईमित्र के चक्कर नहीं काटने पड़ते हैं। मुझे सभी योजनाओं और वैकेंसियों के बारे में मोबाइल से ही आसानी से जानकारी मिल जाती है।” 

वर्तमान समय में माया अपने ही गाँव में महिला जन अधिकार समिति द्वारा चलाए जा रहे सखी सेंटर की प्रभारी हैं। सेंटर से मिलने वाली अल्प सहायता से माया अपनी आगे की पढ़ाई का खर्च भी स्वयं उठाती हैं और घर खर्च में भी परिवार की मदद करती हैं। 

माया की ही तरह अजयसर गाँव की रहने वाली 18 वर्षीय मोनिका और मंजू भी सखी सेंटर को संभालती हैं। मोनिका बताती है, “सेंटर से मिलने वाले पैसों से मैंने अपने लिए किस्तों पर एक स्कूटी खरीदी है, और अब मैं आसानी से कॉलेज जाती हूँ और कहीं भी आ-जा सकती हूँ। यह सब इसलिए संभव हुआ क्योंकि मैंने डिजिटल एजुकेशन को अपने जीवन में अपनाया और उसी की वजह से मुझे रोज़गार मिला। आज-कल कहीं भी काम करें, डिजिटली अपडेटेड रहना ज़रूरी है।”

सहायक प्रभारी मंजू बताती हैं, “डिजिटल साक्षरता बहुत ज़रूरी है, खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली किशोरियों के लिए, क्योंकि अगर हमें आगे पढ़ाई और किसी भी तरह की सरकारी नौकरी की कोचिंग करनी है तो इसके लिए हमें बड़े शहर में जाना पड़ता है। परिवहन साधनों की कमी और महंगे कोचिंग संस्थानों की वजह से हमें कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। परंतु डिजिटल संसाधनों की मदद से अब हम यूट्यूब जैसे प्लेटफार्म पर ऑनलाइन घर बैठे ही कोचिंग कर सकते हैं और इससे समय और पैसे दोनों की बचत होती है।” 

संस्था ने नौ सखी सेंटर शुरू किये हैं, जहाँ पुस्तकें, लाइब्रेरी और टेबलेट्स व इंटरनेट कनेक्शन उपलब्ध किये हैं। 40 से 50 लड़कियाँ इस स्पेस का नियमित उपयोग करती हैं। बीच-बीच में लड़कियों के लिए जीवन कौशल, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि विषयों पर कार्यक्रम भी होते हैं ताकि ज़्यादा लड़कियों को जागरूक किया जा सके। ये सखी सेंटर गाँव की ही नवयुवा लड़कियों द्वारा मेंटरिंग सपोर्ट के साथ संचालित हैं।

नीरज को अपने इस लस लेख के लिए पुरुस्कार भी मिला है

अजमेर के लोहाखान बस्ती की 21 वर्षीय दीपिका सोनी संस्था के अजमेर सेंटर पर एक डिजिटल एजुकेटर हैं। उन्होने वहीं पर ही कंप्यूटर सीखा, RS-CIT राजस्थान सरकार का सर्टिफिकेट कोर्स करिक्युलम पास किया, ग्रासरूट्स जर्नलिजम का कोर्स करके अपने कौशल बढ़ाये हैं – और अब वे अन्य लड़कियों को ट्रेनिंग दे रही हैं। वह आत्मविशवास से भरपूर हैं और अपने लिए उच्च अवसरों की तलाश कर रही हैं। दीपिका की तरह नमीरा बानो भी वहीं से सीखकर लड़कियों को कंप्यूटर चलाना सिखा रही हैं। 

इस तरह इन जैसी अनेक लड़कियों ने ना केवल डिजिटल साक्षरता को समझा बल्कि उसे अपने जीवन में भी अपनाया और आज इसी के बलबूते पर ये न केवल अपना खर्च स्वयं उठा रही है; साथ में, परिवार के घर खर्च में भी मदद करती हैं। इन्ही लड़कियों से प्रेरित होकर देविका, पूनम, कोमल, सुरभि, पूजा, पूनम, अफसाना, दिव्या, मतांशा, अंजू, निकिता और ममता जैसी कई लड़कियाँ कंप्यूटर-मोबाइल सीखने में रुचि दिखा रही हैं और डिजिटल साक्षरता की तरफ़ अपने कदम बढ़ा रही हैं। 

ये लड़कियाँ बताती हैं कि हमारे सरकारी विद्यालयों में कंप्यूटर और कंप्यूटर रूम तो होते हैं, लेकिन उनका प्रयोग केवल अध्यापकों तक ही सीमित रह जाता है। अध्यापकों की उदासीनता के कारण और अलग से किसी इंस्ट्रक्टर की नियुक्ति न होने से हमें सिखाया ही नहीं जाता बल्कि यह धारणा भी बनाई जाती है कि हम ही सीखने के इच्छुक नहीं हैं और हम में सीखने की क्षमता भी नहीं है। इसलिए हम सरकार से चाहते हैं कि सभी सरकारी विद्यालयों में कंप्यूटर रूम मौजूद हों और वहाँ पर सप्ताह में कम से कम दो-एक बार तो हमारी कंप्यूटर की क्लास लगाई जाए। इससे ना केवल हम डिजिटली साक्षर होंगे बल्कि साइबर क्राइम जैसे अपराधों से भी अवगत होंगे। 

महिला जन अधिकार समिति की संस्थापक सदस्य इंदिरा पंचोली बताती हैं कि जिन गाँवों में लड़कियों के लिए फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी हो और आर्थिक दंड की व्यवस्था हो – वहाँ डिजिटल संसाधन पूरी तरह लड़कियों के नियंत्रण में देना संस्था के लिए कठिन टास्क था। डिजिटली इक्विप्ड सखी सेंटर खोलना उस गाँव की पितृसत्ता को चुनौती देने के बराबर था। इन लड़कियों की अपने जीवन में आगे बढ़ने की आशाएं और चुनौती से जूझने की हिम्मत के कारण ही ये सेंटर चल पाए हैं और इन्हें अधिक विकसित करने की आवश्यकता बन गई है।

फीचर्ड फोटो आभार – अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन

Author

  • नीरज, राजस्थान के अजमेर ज़िले के पास – हांशियावास गाँव की रहने वाली हैं। उनका सपना एक इंटरनेशनल फुटबॉल प्लेयर बनने का था लेकिन बोन कैंसर की बीमारी वजह से उनका यह सपना पूरा नहीं हो पाया। अब नीरज एक सरकारी ऑफिसर बनना चाहती हैं ताकि स्थानीय लड़कियों और लड़कों के लिए शिक्षा एवं अन्य क्षेत्रों में सुधार ला पाएँ। नीरज ने ग्रसरूट्स जर्नलिज्म का कोर्स किया है और उनकी लिखने में गहरी रुचि है।

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