राज वसावा:

भारत देश के आदिवासी क्षेत्रों मे शासन प्रणाली पारंपरिक तौर पर तय होती है, चुनाव से जीती हुई सरकार के शासन से कई गुना बेहतर और पारदर्शी। जहॉं समुदाय की बात होती है, संस्कृति की बात होती है, प्रकृति के अभिन्न अंग (जल, जंगल, ज़मीन और अन्य जीवों) की रक्षा और जतन की बात होती है। जहॉं कुदरत के दिए गए तोहफो को ही दौलत माना जाता है, न कि इंसानों द्वारा बनाए गए संसाधनों को जो सिर्फ कुछ पल का सुख देते हैं और बदले में बहुत कुछ नुकसान करते हैं।

गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों की बात करें तो यहाँ आदिवासी समुदाय पुवॅ पट्टी, (अंबाजी से उमरगांव) के 14 ज़िलों के 53 तहसील के 2584 गॉंवों में बसा है। भारत के संविधान के मुताबिक गुजरात अनुसुची 5 की सूची में शामिल है। गुजरात की 31 जातियों को आदिवासी के तौर पर नोटिफाइ किया गया है। यहाँ करीब 1 करोड़ 20 लाख आदिवासी हैं जो गुजरात की कुल जनसंख्या का 15% हिस्सा है। गुजरात सरकार ने 19 साल बाद 2017 में औपचारिकता के तौर पर पेसा कानून – 1996 की अमलवारी का ऐलान किया।

पेसा कानून (Panchayat Extension to Scheduled Areas Act), 1996 को केंद्र की कांग्रेस सरकार ने पांचवी अनुसुची के आदिवासी गॉंवों में आदिवासी समुदाय के परंपरागत संस्कृति, रुढिगत ग्राम सभा, कस्टमरी कानून और स्वशासन को सुरक्षित रखकर सरकार के विकासशील कामों को भी धरातल पर स्थापित करने के लिए तैयार करवाया था। जिसे तैयार करने के लिए रतनसिंह भुरिया जी और उनकी टीम को ज़िम्मा सौंपा था। भुरिया कमिटी ने अपनी रिपोर्ट जमा की और 24 दिसंबर 1996 से पेसा कानून – 1996 भारत में लागू किया गया। भारतीय संविधान की धारा 244(1) और 13(3)(क) जो आदिवासी क्षेत्रों को स्वायत्तता प्रदान करती है, उसी के मद्देनजर यह कानून बनाया गया है। 

इस कानून से आदिवासी क्षेत्रों की ग्राम पंचायतों से ज़्यादा पारंपरिक ग्राम सभाओं को पूरा और सीधा अधिकार दे दिया है। ग्राम सभाओं के बनाये गए कानून को सुप्रीम कोर्ट भी खारिज या चेलेंज नहीं कर सकती। इस कानून की वजह से ग्राम सभा किसी भी प्रोजेक्ट, योजना एवं कानून की अमलवारी या खारिज करने की क्षमता रखती है।

गुजरात में जहाँ तक मेरा अनुभव रहा है, मैंने यह महसूस किया है कि पेसा कानून को हथियार बनाकर आदिवासी क्षेत्रों के संसाधनों (जल, जंगल, ज़मीन, खनिज संपदा) को लूटने का काम किया जा रहा है। पूंजीपति और सरकार के नेतागण, सरकारी कर्मचारी और पूंजीपतियों के एजेंट के द्वारा इसे आदिवासी क्षेत्रों की संपदा और लखलुट खनिज को जल्द से जल्द खत्म कर देने वाले हथियार की तरह उपयोग किया जा रहा है। आदिवासियों के पारंपरिक और रुढिगत कानून, आदिवासी संस्कृति, सभ्यता, मान्यता, रहन-सहन, जल-जंगल-ज़मीन के मालिकाना हक और पहचान को बहुत नुकसान पहुँचाया जा रहा है।

अगर सही मायने में पेसा कानून का उपयोग किया गया होता तो आज गुजरात का आदिवासी दर-दर की ठोकरें न खा रहा होता। बड़े-बडे़ बांधो को आदिवासी क्षेत्रों में बांधने के बावजूद पीने के पानी के लिये इन समुदायों को तरसना न पड़ता। बड़ी-बड़ी इंडस्ट्रीज स्थापित करने के बावजूद आदिवासी रोज़गार के लिए दूसरे शहरों पर निर्भर न रहते। नर्मदा डेम, कडाणा डेम, उकाई डेम, जीआईडीसी, स्पेशल इकॉनोमिक ज़ोन, इको-सेंसिटिव ज़ोन, स्टैच्यू ऑफ़ युनिटी प्रोजेक्ट, बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट, भारतमाला प्रोजेक्ट, पार-तापी-नर्मदा रिवर लिंक प्रोजेक्ट, और न जाने ऐसे कितने नये प्रोजेक्ट बिना किसी ग्राम सभा की अनुमति के स्थापित हो रहे हैं।

गुजरात में पेसा कानून का उल्लंघन सरेआम हो रहा है। जहाँ पांचवीं अनुसूची के मुताबिक ग्राम सभा को संपूर्ण अधिकार मिले हैं वहीं पेसा कानून का इस्तेमाल करके गुजरात सरकार आदिवासियों की शासन प्रणाली को ध्वस्त कर रही है। यहाँ गाँव के लोगों द्वारा बनाई गई ग्राम सभा से ज़्यादा चुनाव से जीता हुआ सरपंच और सरकार का नुमाइंद कर्मचारी (तलाटी) आदिवासी गाँवों का संचालन कर रहे हैं। वैसे, अनुसूचित क्षेत्र में सिलेक्शन (सर्वसम्मति से चयनित) प्रणाली स्थापित होती आ रही है। लेकिन अब इलेक्शन (चुनाव जीतकर चयनित) प्रणाली स्थापित हो चुकी है। प्रादेशिक दलों के साथ-साथ राष्ट्रीय दल भी अब गाँव पंचायत के चुनाव में उतर आए हैं। अब हालात ऐसे हो चुके हैं कि भाई की भाई से नहीं बनती। और गाँव में हर चौराहे पर नेता और राजकीय पार्टियों ने कब्ज़ा कर लिया है। 

पिछले 2 दशक से गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों में पेसा कानून का दुरुपयोग कर आदिवासी धरोहर, संस्कृति और सभ्यता को बर्बाद किया जा रहा है। कानून व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों को दरकिनार किया जा रहा है। 

अगर सही मायने में पेसा कानून की अमलवारी की गई होती तो आज आदिवासी समुदाय का आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास ठीक-ठाक हो गया होता। 

आदिवासी समुदाय के युवाओं को पांचवी अनुसूची, पेसा कानून 1996 और अन्य ऐसे कानून जो समुदाय के अधिकारों को मज़बूत करते हैं, उन्हें जान-समझकर दूसरे लोगों को समझाना चाहिए। और दोबारा से आदिवासी संस्कृति, भाईचारा और पहचान को मज़बूत करने का काम करना चाहिए।

फीचर्ड फ़ोटो प्रतीकात्मक है।

राज वसावा / Raj Vasava

आदिवासी एक्टिविस्ट , गुजरात राज्य|

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