दीपक काम्बले:

लातूर जिल्ह्यातील जळकोट सलुक्यातील खेलदरा या गावाचे गरीब कुंटुंब प्रकाश रावण, पत्नी सोनाली प्रकाश गोन्टे महाराष्ट्राला लागून असलेल्या जवळच्या कर्नाटक राज्यात ऊस तोडीरखठी गेले होते सोबत नवरा बायको व दोन वर्षाची लहान मुलगी होती. ऊसतोडीच्या ठिकाणी मुकदमान किंवा कारखान्यान या लहान मुलासाठी काहीही सोय केली नव्हती आई वडिल लहान मुलीला ऊसाच्या फडात सोडून ऊसतोडीचे काम करत असून कारखाना किंवा मुकदम यानी अशा लहान मुलासाठी सुरक्षेची योजना करायला पाहिजे पण, कोणताही कारखाना अशी सुरक्षेची सुविधा पुरवत नाही. एका दिवशी अगनक लहान दोन वर्षाच्या मुलीला ऊसाच्या फडात सोडून आई-वडिल ऊसतोड करत असताना दोन वर्षाच्या मुलीला साप चावला ऊसाच्या फडातून, दवाखान्यात घेऊन जाई प्रर्यत मृत्यु झाला. त्या जोडप्याला एकच मुलगी होती. मुलीचा ऊसाच्या फडात मृत्यु होऊन सुद्धा, कारखान्यानी मुलीच्या आई-वडिलाना किंवा मुकदमानी कोणतीही आर्थीक मदत केली नाही. असे प्रकार नेहमी उसतोड कामगाराबद्दल नेहमी घडत असतात याची दखल कोणीही घेत नाही. त्यामुळे उसतोड कामगाराची आर्थीक, शारीरीक, व मानसिक पिळवणुक होत असते.

हिंदी अनुवाद –

एक गरीब परिवार के 32 वर्षीय प्रकाश रावण गोंटे और उनकी 28 वर्षीय पत्नी सोनाली प्रकाश गोंटे, लातूर ज़िले के जलकोट तालुका के येलदरा गाँव के रहने वाले हैं। वह दोनों अपनी दो साल की बेटी के साथ महाराष्ट्र की सीमा से लगे कर्नाटक राज्य में गन्ना काटने के लिए गए थे। गन्ने कटाई के काम में छोटे बच्चे के लिए कोई सुविधा नहीं थी। माता-पिता छोटी लड़कियों को गन्ने के खेतों में गन्ना श्रमिकों के रूप में काम करने के लिए छोड़ देते हैं। कारखाने या मुकदम में ऐसे बच्चों के लिए सुरक्षा योजना होनी चाहिए, लेकिन कोई भी कारखाना ऐसी सुरक्षा-सुविधा प्रदान नहीं करता है। एक दिन उसके माता-पिता ने अपनी दो साल की बच्ची को गन्ने के खेत में छोड़ दिया और स्वयं दोनों गन्ना काटने में लग गए। उनकी बेटी को किसी कीड़े ने काटा या अचानक से क्या हो गया, किसी को मालूम नहीं हुआ। उस छोटी सी लड़की की तबियत अचानक तब तक काफी बिगड़ गई जब तक उसे अस्पताल पहुँचाया गया। उस लड़की की रास्ते में ही मौत हो गई। उस दंपति की केवल एक बेटी थी। फिर भी मुकादम या कारखाने से दंपत्ति को कोई वित्तीय सहायता नहीं दी गयी, प्रवासी मज़दूरों के साथ ऐसा व्यवहार आये दिन होता है। लातूर ज़िले में कुछ चौदह चीनी कारखाने हैं, यहाँ भी श्रमिकों के साथ हमेशा कोई ना कोई घटना होती रहती है। इसके चलते उन्हें कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, फिर भी इस तथ्य पर कोई भी ध्यान नहीं देता कि ऐसे लोग अक्सर बदनतोड़ मेहतन में डूब जाते हैं। जिससे मज़दूरों का आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण होता आ रहा है।

Author

  • दीपक, महाराष्ट्र के लातूर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। दीपक पिछले 10 वर्ष श्रमजिवी संघटना, मराठवाडा के साथ जुड़ कर क्षेत्र के समुदायों के हक़-अधिकारों के लिए काम कर रहे हैं।

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