विकास कुमार:
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 45 कि.मी. दूर दक्षिण पूर्व पर स्थित भीमबेटका गुफाएं किसी भी इतिहास प्रेमी को अपनी ओर खींची चली जाती हैं। वजह है हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए हज़ारों साल पुराने शैलचित्र और शैलाश्रय या रॉकशेल्टर यहाँ आज भी मौजूद हैं। विंध्याचल पहाड़ों में 10 कि.मी. क्षेत्र में फैले भीमबेटका कोर एरिया में करीब 750 गुफाएं है, जिसमें से करीब 500 में शैलचित्र मौजूद हैं। इस ऐतिहासिक जगह को यूनेस्को ने 2003 में विश्व धरोहर घोषित किया था। होशंगाबाद में सामाजिक परिवर्तन शाला के शिविर के दौरान देशभर के सामाजिक कार्यक्रताओं के साथ इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने का मौका मिला।
सामाजिक परिवर्तन शाला शिविर के दौरान हुआ भीमबेटका का स्टडी ट्रिप
21-28 अगस्त 2022 तक होशंगाबाद, मध्यप्रदेश प्रदेश में श्रुति संस्था द्वारा सामाजिक परिवर्तन शाला के दूसरे शिविर का आयोजन किया गया। पहले शिविर का आयोजन जून में झिरी (राजस्थान) में हुआ था। इस बार देश के 10 राज्यों के ज़मीनी संगठनों के कार्यकर्ताओं की ऊर्जा और उत्साहपूर्ण भागीदारी ने शिविर को अगले पायदान में पहुंचाने में मदद की। अब तक हुए दोनो शिविर में सहभागियों के बीच लेक्चर, विभिन्न खेल, ग्रुप एक्टिविटी, फ़िल्म, वीडियो, पोस्टर के माध्यम से यूनिवर्स/धरती की उत्पत्ति, मानव विकास क्रम, प्रभुत्व वर्ग का विकास, समाज में गैरबराबरी की उत्पत्ति, कर व्यवस्था एवं मुद्रा का विकास आदि मुद्दों पर चर्चाएं हुई हैं।

शिविर के दौरान भीमबेटका स्टडी ट्रिप पर संशय की स्थिति तब बन गई जब होशंगाबाद में कई दिनों से लगातार बारिश हो रही थी। पर बादल भी शायद छुट्टी के मूड में थी, और सुहावने मौसम ने शिविर के प्रतिभागियों में फिर से मुस्कान ला दी। एक सुबह होशंगाबाद से निकला काफिला भोपाल हाईवे की तरफ बढ़ा और 40 कि.मी. की यात्रा तय करने के बाद, हाइवे पर ही भीमबेटका विश्व धरोहर के बोर्ड ने हमें यह बताने की कोशिश की कि हम एक ऐतिहासिक धरोहर के चौखट पर हैं। मध्य प्रदेश के खजुराहो के मंदिर और सांची जैसी जगहें दुनियाभर के पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। बीते कुछ सालों में मध्य प्रदेश में पुरातत्व विभाग द्वारा की गई खोजों से हुए यह निष्कर्ष निकल रहा है कि मध्य प्रदेश सिर्फ भारत ही नहींं बल्कि विश्व सभ्यता के विकास का भी केंद्र रहा है। हाईवे से करीब 5 किमी की दूरी तय करने के बाद समुद्री तट से 2000 फ़ीट की ऊँचाई पर स्थित था भीमबेटका रॉकशेल्टर। यह पूरा क्षेत्र विंध्याचल की पहाड़ियों की उपत्यकाओं में स्थित है। घने जंगलों से घिरा हुआ, रातापानी वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी से सटा हुआ। दूर से देखने पर यह हैरतअंगेज़ पहाड़ियाँ किलेनुमा प्रतीत होती हैं, लेकिन बाद में हमारे गाइड ने बताया कि यह मानव उत्पत्ति से करोड़ों वर्ष पूर्व की प्राकृतिक चट्टाने मात्र हैं।
पाषाण काल से मध्य ऐतिहासिक काल तक मानव गतिविधियों का केंद्र
हैरान करने वाली बात है कि इन ऐतिहासिक गुफाओं और शैलचित्रों की खोज हुए ज़्यादा समय नहींं हुआ है। इनकी खोज 1957-58 में पुरतत्वविद डॉ. विष्णु श्रीधर बाकणकर ने की थी। कहा जाता है कि 1958 में वे एक बार रेल से नागपुर की यात्रा कर रहे थे कि मार्ग में उन्होंने कुछ गुफाओं और चट्टानों को देखा। उसके बाद उन्हें उत्सुकता हुई और बाद में उन्होने इन पहाड़ियों का भ्रमण किया और इनके गौरवशाली इतिहास से पर्दा उठाने में उनका खास योगदान रहा। उन्हें बाद में इस खोज के लिए पद्मश्री से भी नवाज़ा गया था। भीमबेटका क्षेत्र में प्रवेश करते हुए शिलाओं पर लिखी हुई कई जानकारियां मिलती हैं। इसमें करीब 750 शैलाश्रय हैं, जिसमे 500 शैलाश्रयों में चित्र मौजूद हैं, लेकिन सिर्फ 12 गुफाएं ही आम लोगो के लिए खुली हैं। यह स्थल पूर्व पाषाण काल से मध्य ऐतिहासिक काल तक मानव गतिविधियों का केंद्र रहा है।
करोड़ों वर्ष पुरानी हैं यहाँ की चट्टाने
भीमबेटका की ऊंची चट्टानों के आकार से लग सकता है कि यह मानव निर्मित हैं, लेकिन गाइड बताते हैं कि यह चट्टाने करोड़ों वर्ष तक पानी के नीचे डूबी हुई थी। इसके अलग-अलग कटाव इंसानों द्वारा नहीं, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से नदियों द्वारा ही बने हैं। इन चट्टानों पर सफेद निशान, करोड़ों साल पहले यहाँ मौजूद पानी के बहाव को दर्शाते हैं। कमज़ोर पत्थर पानी के साथ बह गए, मजबूत पत्थर बच गए जिन्हें इस वक्त हम देख पा रहे । यहाँ सैंडस्टोन की एक मज़बूत क्वालिटी क्वार्टज़ाइट पत्थर भी मौजूद है।
भीमबेटका के शैलचित्रों से हज़ारों सालों में मानव के क्रमिक विकास को आसानी से समझा जा सकता और हमारे पूर्वजों के दैनिक जीवन की कल्पना भी आसानी से की जा सकती है। क्यूंकि अलग अलग कालखंड में इंसान ने इन गुफाओं में अपना डेरा बनाया, इसलिए इनसे उस समय के सामाजिक-सांकृतिक-राजनीतिक परिपेक्ष्य को भी समझा जा सकता है।

भीमबेटका में हमने बाघ, सिंह, कुत्तों और घड़ियालों, जंगली सुअर, हाथियों और बैलों के विशाल चित्रों को देखा। शिकारी समाज, इन जानवरों का शिकार करते हैं, कई जानवर ऐसे भी थे जिससे उन्हें भय था। पशुपालक समाज के लिए भी जानवर का अपना ही महत्व था जिसे उन्होंने चित्रों में उतारा, यह चित्र मानव-प्रकृति संबंध को भी दर्शाते हैं। इन चित्रों में मानव पूर्वजों की दैनिक गतिविधियों की झलक भी दिखती है, शिकार, नाच-गान, युद्ध आदि। भीमबेटका में सामुहिक नाच-गान वाले एक चित्र से मुझे झारखंड के आदिवासी समुदाय में अखड़ा की झलक साफ साफ दिखी, जहाँ महिला-पुरूष एक साथ दिख जाएंगे। एक चित्र में युद्ध पर जाता एक बड़ा समूह दिखता है जिसमें कई लोग घोड़े पर सवार है, साथ में पैदल मार्च करते लोग भी हैं जो डमरू के आकार का वाद्ययन्त्र का प्रयोग कर रहे हैं, एक तेंदुआ भी कोने में दिखता है, जिसका घुड़सवार शिकार कर रहे हैं। मानव समाज मे प्रभुत्व वर्ग का विकास इस चित्र से साफ दिखता है। एक गुफा में एक हाथी का चित्र था, जिसके नीचे ही एक घोड़े का चित्र था, दोनो चित्रों के बीच करीब पांच हज़ार सालों का फर्क था, क्योंकि भारत मे घोड़े का प्रयोग आर्य लोगों के आने के बाद ही देखा जाता है, जो मोहनजोदाड़ो सभ्यता के अंत तक ही भारत पहुंचे थे।
भीमबेटका गुफा, मानव पलायन के अतीत की कहानी को समझने के लिए भी एक प्रयोगशाला है। कई समूह दूर-दराज के इलाकों से भी यहाँ आए होंगे। यहाँ मौजूद दो सींग वाले गैंडे का चित्र इसी थ्योरी को मान्यता देता है, क्यूंकी यह जानवर मध्य भारत में कहीं नहीं पाया जाता। पलायन कर आए किसी समूह ने ही इस जानवर को संभवत: अपनी स्मृति से बनाया होगा।
भीमबेटका के चित्रों में महिला/पुरूष, बच्चे, हाथी पर बैठा मनुष्य, बैल की सवारी, सैनिक, कुल्हाड़ी पकड़ा आदमी के अलावा जानवर जैसे बकरी, बंदर, भेड़िया, हिरण, खरगोश, गिलहरी, पक्षी जैसे मोर, मुर्गी के भी अनेक चित्र दिखेंगे जो हज़ारों की संख्या में हैं। हज़ारों साल पहले के पत्थर के औज़ार भी यहाँ मिले हैं, इसके अलावा यहाँ मिले मानव कंकाल भोपाल के स्टेट म्यूजियम में देखे जा सकते हैं। बीते साल 2021 में भीमबेटका दुनिया भर में तब चर्चा में आया था जब शोधकर्ताओं को इसके ऑडिटोरियम गुफा की छत पर करीब 57 करोड़ साल पुराने जानवर का जीवाश्म मिला था। इस जानवर का नाम डिकिनसोनिया है।
हज़ारों साल पुरानी कहानियाँ कहते भीमबेटका के शैलचित्र
होशंगाबाद वापस लौटने के बाद, शिविर के एक सत्र में इतिहासकार सुब्रमण्यम ने भीमबेटका की गुफाओं पर हमसे विस्तार से चर्चा की। हमारे कई सवालों के जवाब देकर उन्होंने कई रहस्यों से पर्दा उठाया। उन्होंने बताया कि इस तरह के शैलचित्र अफ्रीका के सहारा रेगिस्तान से लेकर ऑस्ट्रेलिया की गुफाओं में भी पाए गए हैं। इस कारण आम धारणा कि मानव सभ्यता की उत्पत्ति यहीं से हुई है, कहना गलत होगा। एक बड़ा सवाल यह भी था कि आखिर यह चित्र कैसे हज़ारों साल बाद भी बचे रहे? इसके जवाब में उन्होंने बताया कि भीमबेटका में जो हमने चित्र देखे, वह नमूना मात्र हैं। इससे भी बड़ी संख्या में वहाँ चित्र मौजूद रहें होंगे जिन्हें अनेक रंगों से बनाया गया होगा, लेकिन अब बस कुछ हज़ार चित्र ही बचे हैं। जो चित्र हमने देखे उसमें गेरू रंग और लोहे के खनिज पत्थर से बनाये गए चित्र हैं, जो दस हज़ार साल से टिके हुए हैं। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि जो हमें इतिहास के सबूत की तरह दिख रहा है, वह एक छोटा सा अंश ही है। इतिहास में मिले साक्ष्य से हम पूरी सच्चाई जान नहीं सकते सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं।

इतिहास को समझने के लिए वैज्ञानिक सोच ज़रूरी
इतिहास को समझने के लिए पौराणिक, अंधविश्वास की कथाओं से ज़्यादा वैज्ञानिक सोच ज़्यादा ज़रूरी है। भीमबेटका को लेकर कई सारी झूठी कहानी प्रसारित की जाती हैं, जिसमें सरकारों के अलावा टूरिस्ट गाइड भी मुख्य भूमिका में रहते हैं। वे इस जगह में पांडवों के वास की कहानी गढ़ते हैं, भीमबेटका को भीमबैठका कह कर बताते हैं कि इस जगह पर महाभारत के किरदार भीम बैठते थे। देश की आदिवासी चित्रकलाओं जैसे महाराष्ट्र की वर्ली, गोंड आदिवासी की गोंडी कला को भी भीमबेटका की चित्रकला से जोड़ने की कोशिश की जाती है। आम लोगों के बीच वैज्ञानिक चेतना इसलिए ज़रूरी है ताकि किसी भी सूचना पर वह आंख बंद करके विश्वास ना करें। उस पर अध्ययन करें, अनेक सूत्रों से ज्ञान जुटाए, फिर ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचे। नए तथ्य आने पर, अपनी सोच को बदले। व्हाटसऐप यूनिवर्सिटी की दुनिया के बीच सही सूचना को ग्रहण और उसका प्रसार करना एक मुश्किल काम है, लेकिन हम सबको वैज्ञानिक समाज के निर्माण हेतु प्रयासरत रहना चाहिए।

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