इंदु सिंह:

आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ पर यदि आज का युवा यह सोचने पर मजबूर है कि ‘वह वास्तव में आज़ाद है या नहीं” तो यह उन वीर सपूतों का अपमान होगा जिन्होंने प्राणों का बलिदान देकर हमें मात्र राजनीतिक स्वतंत्रता दिलाई थी। क्योंकि मानसिक गुलामी तो हम आज तक ढो ही रहे है। परंतु यह विचारणीय है कि क्या इस तरह के आक्षेप तर्कसंगत व प्रासंगिक हैं? इसके लिए हमने आज़ादी के सही मायने और स्वतंत्रता के सटीक अर्थ तक पहुंचना होगा। यह सम्भव है कि देश-काल-परिस्थिति के अनुसार आज़ादी के आयाम बदलते रहे, किंतु आधारभूत पैमाना विचारों तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होना चाहिए।

इस अर्जित स्वतंत्रता से मोहभंग तथा इसकी आलोचना 60-70 के दशक से ही आरम्भ हो गई थी जब बुद्धिजीवी कवि नागार्जुन ने कहा था, “कागज की आज़ादी मिलती, ले लो दो दो आने में।” गौर करने वाली बात है कि उनके पास वैचारिक और अभिव्यक्ति की आज़ादी तब भी थी। 

आज़ादी के विभिन्न आयामों की बात करें तो राजनीति स्वतंत्रता हम अर्जित कर चुके है, आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार हमें संविधान द्वारा प्राप्त होता है, किन्तु सामाजिक स्वतंत्रता…! यह सर्वविदित तथ्य है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, मानव समाज के लिए तथा समाज मानव के लिए बना है। सामाजिक बंधन बहुत हद तक हमारी स्वतंत्रता को सीमित करते हैं, जीवन के प्रत्येक चरण में यह अनुभव हो सकता है कि हम आज़ाद हैं या नहीं? असल में यह समाज सापेक्ष हो सकता है। किसी समाज में कपड़ों के चयन की आज़ादी भी नहीं है और किसी समाज में कपड़े न पहनने का विकल्प भी मौजूद है।

अपने विशाल महान राष्ट्र में स्वतंत्रता ऐसा विषय रहा है जिससे ऐतिहासिक काल से जनमानस परिचित रहा है, चोल काल का स्थानीय स्वशासन हो या लिच्छवियों का गणतंत्र अथवा मध्यकाल में आम जनता राजा। कोई भी हो साधारण जनता को आजादी हमेशा मिलती रही है और जब-जब स्वतंत्रता का हनन किया गया तब तब उसके विरुद्ध विद्रोह भी हुआ। किंतु तब भी भारत एक समाज के रूप में हमेशा बंधा रहा। समय के साथ कुछ कुरीतियां भी व्याप्त हुई होंगी जैसे अंधविश्वास, जातिगत भेदभाव, लैंगिक भेदभाव आदि। इन्हें दूर कर लिया जाए तो हम सच्चे अर्थों में आजाद हो सकते हैं।

वास्तव में हम आजाद हैं या नहीं यह व्यक्तिनिष्ठ प्रश्न है, जिसका उत्तर हममें से हर एक का अलग-अलग हो सकता है। स्वयं के लिए मैं विचार करना चाहूँगी कि क्या मेरे पास चयन की स्वतंत्रता है? क्या मेरे पास अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है? क्या मेरे पास शिक्षा, अर्थ और व्यवसाय की स्वतंत्रता है? और मैं अनुभव करती हूँ कि “मैं आजाद हूँ, मैं स्वतंत्र हूँ।”

फीचर्ड फोटो आभार: business-standard.com

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  • इंदु, सरीला, हमीरपुर (उत्तर प्रदेश) से हैं और इलाहबाद विश्वविध्यालय से हिन्दी साहित्य पर शोध कर रही हैं।

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