विनोद:

कौन कहता है कि आज़ाद हैं हम,

यकीं मानो आज भी गुलाम हैं हम।

कभी अंग्रेजों के तो कभी जमींदारों के,

ये रोज़-रोज़ इस्तेमाल होते सियासती हथियारों के।

कभी हिन्दू के नाम पे तो कहीं मुसलमान के नाम पे,

कभी मंदिर के नाम पे, तो कभी मस्जिद के नाम पे। 

मुछों को ताव देते हैं ये दो कौड़ी के लोग,

स्त्री को चीज़ समझते हैं ये दो कड़ी के लोग। 

ये गुलाम हैं आज भी उसी पुरानी सोच के, 

ये गुलाम हैं अपनी उन्हीं हरकतों के बोझ के।

युवा बैठा है, राजनीति सियासत में है,

काबिल ये किसी के नहीं, सब मिला विरासत में है। 

बस माहौल ज़रा सा कहीं नाशाद न हो जाए,

स्कूल-कॉलेज पहले बंद हों, फिर सारे बाज़ार शराब हो जाए। 

जब इल्म से ज़्यादा मैखाने को मिले अहमियत तो पागल ये आवाम हो,

कौन कहता है कि आज़ाद हैं हम, यकीं मानो गुलाम हो तुम।           

फीचर्ड फोटो आभार: financialexpress.com  

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