अभिषेक जमरे:

आज मैं अपने गाँव की वड़ फलिया में गया। पिछले कुछ महीनों से मैं इस फलिया में बच्चों के स्वास्थ्य के बारे में बात करने जाता रहता हूँ, आज मैं शिक्षा के बारे में इनसे बात करने गया था। सतपुड़ा की पहाड़ियों में बसे भूरकुआँ गाँव का यह छोटा सा मोहल्ला है। यहाँ बारेला आदिवासी किसान रहते हैं और लगभग सभी घरों से लोग गुजरात के शहरों और गाँवों में मज़दूरी करने जाते हैं। सबकी छोटी-छोटी खेतियाँ हैं। साल का खर्च निकालने के लिये कुछ महीने मज़दूरी के लिये पलायन करना ज़रूरी होता है।

अलग-अलग घरों में लोगों के साथ शिक्षा के बारे में बातचीत में लोग बता रहे थे कि पिछली बार भी लॉकडाउन में बच्चे स्कूल नहीं जा पाए, पर इस बार हम ज़रूर भेजने की कोशिश करेंगे। उनको अब समझ में आ रहा है कि बच्चों का पढ़ाई करना भी ज़रूरी है। अच्छी पढ़ाई करवाने की इस इच्छा के चलते फूगा भाई ने अपने लड़के का एडमिशन पास के बाज़ार पलसूद के एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में करवा दिया। इनका लड़का तीन-चार साल से इंग्लिश मीडियम में जा रहा था। बच्चे से बात करने पर पता चला कि उसे कुछ भी नही आता। माता-पिता ने तीन साल में करीब तीस से चालीस हज़ार रुपए खर्च कर दिये हैं इसकी पढ़ाई पर।

एक-दूसरे की बात सुनकर फलिया के और भी तीन-चार लोगों नें अपने बच्चों को सरकारी स्कूल के बजाय इंग्लिश मीडियम में भर्ती करवा दिया। लोग बात करते हैं कि प्राइवेट में सरकारी स्कूल से अच्छी पढ़ाई होती है। शुरूआत में जब बच्चा स्कूल गया तो कुछ-कुछ सीखने लगा। इससे माता-पिता को अच्छा लगा पर जैसे-जैसे क्लास बढ़ती गई वैसे-वैसे उसे कुछ पढ़ने और बोलने में दिक्कत आने लगी। बच्चा अपने आप खुद को कमज़ोर सा महसूस करने लगा पर यह बात घर वालों को नहीं बता पाया।

फिर लॉकडाउन लग गया और स्कूल बंद हो गए। स्कूल बंद होने के बाद भी स्कूल वाले टीचर फ़ीस मांगने बच्चों के घर पहुंच गए बाकाया पैसे लेने। लोगों को यह बात अच्छी नहीें लगी कि स्कूल बंद होने के बाद भी फीस ले रहे हैं। बच्चे की पढ़ाई को देखकर और बच्चे को पूछने पर पता चला कि बच्चे को दो-तीन साल से कुछ नहीं आ रहा है, तो पालकों ने बच्चों को पढ़ाई करने जाने से रोक दिया और बच्चे ने भी जाने से मना कर दिया। अब बच्चों से पढ़ाई के बारे में पूछा तो देखा कि उन्हे कुछ भी नहीं आता है, न गिनती, न अक्षर ज्ञान, न कुछ और। तीस-चालीस हज़ार रुपये का खर्चा करने के बाद भी बच्चे को कुछ पढ़ना-लिखना नहीं आ रहा है।

एक-दूसरे की बातों में आकर माँ-बाप ने बच्चों का इंग्लिश मीडियम स्कूल में एडमिशन तो करा दिया, लेकिन उनको समझ में नहीं आ रहा कि अब करना क्या है। क्योंकि लॉकडाउन के बाद जब स्कूल लगे और बच्चे स्कूल गए तो स्कूल के टीचर कह रहे हैं कि तुम पहले बच्चों को पढ़ाई के लिए भेजो या परीक्षा दिलाओ। माता-पिता को लग रहा है कि अगर बच्चों को पेपर देने भेजेंगे तो स्कूल वाले पूरे साल की फ़ीस मांग लेंगे। इसलिये वे बच्चों को पेपर देने नहीं भेज रहे हैं। जब रेगुलर स्कूल चल रहा था, तब फ़ीस दे रहे थे। उनका कहना है कि बच्चा जब साल भर कभी स्कूल गया ही नहीं तो फ़ीस क्यों दें?

माता-पिता बोल रहे हैं कि नये सत्र में अब दूसरे स्कूल (सरकारी या प्राइवेट) में बच्चे को पढ़ा़ना चाहते हैं। लेकिन बच्चे को दूसरे स्कूल में एडमिशन कराने के लिए पुराने स्कूल से दाखिले के कागज़ की ज़रूरत है। पुराने स्कूल वाले बिना फ़ीस लिये दाखिले के कागज़ नहीं दे रहे हैं। दाखिले को लेकर मामला अटका है अभी। माता-पिता को समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। सरकारी स्कूल में पढ़ाई कराएं लेकिन वहाँ की पढ़ाई से वे संतुष्ट नहीं हैं। प्राइवेट में दाखिला कराएं तो खर्च ज़्यादा है, इसलिये बच्चे को उस स्कूल में नहीं भेजना चाहते।

मैंने लोगों से कहा कि दूर-दूर दूसरे स्कूल में जो आप खर्च कर रहे हैं, उससे अच्छा है कि अपने गाँव के सरकारी स्कूल में ही सुधार करने की कोशिश करो। सरकारी स्कूल का इतना भी बुरा हाल नहीं है, गाँव की ही अतिथी टीचर है, बच्चे भी आते हैं। समस्या यह है कि केवल दो ही टीचर हैं तो बच्चों को संभालना और ठीक से पढ़ाना मुश्किल है।

मुझे लग रहा है कि इस साल अच्छे से प्रचार करने पर गाँव के स्कूल में बच्चों की संख्या बढ़ सकती है, और पालकों को साथ लेकर स्कूल को अच्छा बनाने के लिये कोशिश करनी चाहिये। इस विषय पर फलिया के चिरांग्या भाई ने बताया कि स्कूल को सुधारने के लिये बच्चों के माता-पिता को शिक्षा का महत्व समझाना चाहिये। बच्चों का सर्वे कर के पता करना चाहिये कि कितने बच्चे सरकारी स्कूल में हैं और कितने मज़दूरी करने चले जाते हैं। बहुत से लोग अपने बच्चों को मज़दूरी करने साथ ले जाते हैं, लेकिन उनका नाम स्कूल में चलता रहता है। माँ-बाप को यह समझ नहीं आ रहा कि उनके बच्चे का भविष्य खराब हो रहा है और उनकी अगली पीढ़ी भी मज़दूर बनने की तरफ़ जा रही है।

चिरांग्या भाई की यह बात सुनकर कि मेरे गाँव की अगली पीढ़ी भी मज़दूर ही बनेगी, मुझे बहुत बुरा लग रहा है और सोच रहा हॅूं कि इसके लिये क्या किया जा सकता है। लोगों से बात करते हुए पता चला कि वड फलिया से दो नाबालिग लड़कियाँ भाग गईं। उनकी उम्र लगभग 13-14 साल की है। इनकी कहानी अगली बार बताता हूँ।

फीचर्ड फोटो आभार: एनडीटीवी

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  • अभिषेक जमरे एक आदिवासी युवा हैं जिन्होंने बी.ए. के बाद सामाजिक कार्य करने की सोच बनाई। आजकल वे अपने आस-पास के गांव में स्वास्थ्य की समस्याओं को हल करने में लगे हैं। ये आधारशिला शिक्षण केंद्र के छात्र रहे हैं।

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