अशिक्षा और कम मज़दूरी से त्रस्त हैं बाराबंकी के हथकरघा बुनकर

आरज़ू:

बुनकर वह लोग हैं जो कपड़े बुनने का काम करते हैं और उन्हें अंसारी के नाम से भी जाना जाता है। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में ऐसे कई गाँव है जहाँ पर कपड़ा बुनने का काम होता है। कपड़ा बुनने के लिए हथकरघे का इस्तेमाल किया जाता है जो लकड़ी से बना होता है। हथकरघा चलाने के लिए दोनों हाथ तथा दोनों पैरों का इस्तेमाल होता है, करघा पर 12 से 13 घंटा काम किया जाता है और  करघा को एक ही व्यक्ति नहीं चलाता उस पर परिवार के सभी लोग मिलकर काम करते हैं। यह काम बहुत बारीकी का होता है, जिसमें सूत को करघे में फंसाया जाता है, इसमें बहुत अधिक समय लग जाता है। करघा पर कई तरह के डिजाइन के स्टॉल बुने जाते हैं, वह देखने में अधिक अच्छे और खूबसूरत लगते हैं, जिनकी डिमांड मार्केट में बहुत तेजी से होती है।                                     

हथकरघा पर घर के सभी सदस्य, छोटे या बड़े सभी को मिलकर काम करना पड़ता है। कोई धागा फिराता है, तो कोई धागा सुखाने का काम करता है, ऐसे ही आपस में काम बंटा होता है, इस काम को महिलाओं और लड़कियां ज्यादातर करती हैं। घर के पुरुष बाजार में जाकर सेल करते हैं, जब पुरुष के पास काम नहीं होता है तो घर मैं करघा पर काम करते हैं। ज़्यादातर बुनकर समुदाय के लोग अपना काम नहीं करते, इनको मज़दूरी पर काम करना पड़ता है। कुछ लोग हैं जो अपना धागा खरीद कर गमछा बनाते हैं और उसे बाराबंकी में सेल करते हैं। जो लोग मज़दूरी पर काम करते हैं उन्हें कभी-कभी काम नहीं मिल पाता है, जिसके कारण करघा खाली पड़ा रहता है। जब उनको मज़दूरी पर काम मिलता है तभी वह काम करते हैं, क्योंकि कुछ लोगों के पास अपना धागा खरीदने के लिए पैसा नहीं होता है।                                      

करघा पर जो लड़कियां काम करती हैं, उनको शादी का डर नहीं होता क्योंकि फैमिली उनकी शादी देर में करती है। लड़कों से ज्यादा लड़कियां घर पर काम करती हैं, शादी देर में होने का यह भी एक कारण है। एक कारण शादी के लिए पैसा इकट्ठा ना हो पाना भी है। इस कारण लड़कियां ज्यादा से ज्यादा काम करती हैं, ताकि अच्छी शादी के लिए पर्याप्त पैसा इकट्ठा हो सके।                               

हथकरघा के काम में इनकम बहुत ही कम है, जिसमें परिवार भी चलाना मुश्किल होता है। हथकरघा पर जब सभी लोग मिलकर काम करते हैं तो 1 दिन में 100 या 150  रुपए मिलता है। एक परिवार के सभी लोग मिलकर महीने के 3 से 4 हज़ार ही कमा पाते हैं, इसमें ही उन्हें खाने-पीने तथा अन्य जरूरतें पूरी करनी होती हैं। वैसे तो हथकरघा के काम में बहुत सी सरकारी योजनाएँ हैं, लेकिन वह उन तक नहीं पहुंच पाती और उन्हें इनका कोई फायदा नहीं मिल पाता है। बुनकर को लेकर एक सोसाइटी भी होती है लेकिन अधिकांश लोग उसका भी हिस्सा नहीं बन पाते हैं।                  

बुनकर परिवारों के बहुत ही कम लोग शिक्षित हैं, क्योंकि अगर वह अपने बच्चों को स्कूल भेजेंगे तो उनका काम रुक जाएगा और जो काम समय पर करना है वह नहीं हो पाएगा। कुछ लोग हैं जो बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन उनके पास पैसा ही नहीं होता, जो पैसा होता है वह खाने-पीने में ही खर्च हो जाता है। शिक्षा के लिए पैसा नहीं बच पाता इसी कारण वह बच्चों को स्कूल में दाखिला नहीं दिलाते हैं और बुनाई-कढ़ाई के काम में लगा देते हैं। यह लोग 12 वर्ष होने पर ही काम करना शुरू कर देते हैं।           

कुछ लोग हैं जिन्होने किसी तरह से आठवीं तक पढ़ाई कर ली है, उन्हें आगे पढ़ने के लिए गाँव से निकलकर 5 से 7 किलोमीटर की दूरी तय करके जाना होता है, आने जानेके साधन आसानी से उपलभ्द नहीं हैं और उसमें भी पैसा खर्च होता है। इस कारण भी लड़कियां और लड़के पढ़ाई छोड़ देते हैं। अशिक्षित रह जाने के कारण सरकारी योजना आदि की जानकारी उन तक नहीं पहुंच पाती है।    

फीचर्ड फोटो प्रतीकात्मक है। फोटो आभार: आउटलुक

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  • आरज़ू, उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद की युवा कार्यकर्ता हैं जो महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े हक-अधिकारों पर प्रेरणा किशोरी विकास केंद्र से जुड़े समुदायों को संभालती हैं। किशोरियाँ लगातार पढ़ाई से जुड़ी रहे दिलकुशा, धारा रोड में इनका यही प्रयास रहता है। साथ ही आरज़ू अवध पीपुल्स फोरम संस्था के साथ मिलकर यह किशोरियों की शिक्षा को बुलंद करने का काम करती हैं।

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