मज़दूरों के संघर्षों की विरासत 1 मई, अन्तर्राष्ट्रीय मज़दूर दिवस

राजिम केतवास: 

मई दिवस की विरासत संघर्षों की विरासत है, लेकिन आज इस विरासत पर धूल-मिट्टी डाली जा रही है और इस दिन को कुछ रस्मी कार्रवाइयों तक सीमित कर दिया गया है। आज से 136 वर्षों पहले मई दिवस के वीर शहीदों – पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल, फिशर और उनके साथियों के नेतृत्व में शिकागो के मज़दूरों ने आठ घण्टे के कार्यदिवस के लिए एक शानदार लड़ाई लड़ी थी। तब हालात ऐसे थे कि मज़दूर कारखानों में बारह, चौदह और सोलह घण्टों तक काम करते थे। काम के घण्टे कम करने की आवाज़ उन्नीसवीं शताब्दी के मध्‍य से ही यूरोप, अमेरिका से लेकर लातिन अमेरिकी और एशियाई देशों तक के मज़दूर उठा रहे थे। पहली बार 1862 में भारतीय मज़दूरों ने भी इस माँग को लेकर कामबन्दी की थी। 

1 मई, 1886 को पूरे अमेरिका के 11,000 कारखानों के तीन लाख अस्सी हजार मज़दूरों ने आठ घण्टे के कार्यदिवस की माँग को लेकर हड़ताल की थी। शिकागो शहर इस हड़ताल का मुख्य केन्द्र था। वहीं 4 मई को इतिहास-प्रसिद्ध ‘हे मार्केट स्क्वायर गोलीकाण्ड’ हुआ। भीड़ में बम फेंकने के फर्जी आरोप (बम वास्तव में पुलिस के उकसावेबाज ने फेंका था) में आठ मज़दूर नेताओं पर मुकदमा चलाकर पार्सन्स, स्पाइस, एंजेल और फिशर को फाँसी दे दी गयी। अपने इन चार शहीद नायकों की शवयात्रा में छह लाख से भी अधिक लोग सड़कों पर उमड़ पड़े थे। पूरे अमेरिकी इतिहास में इतने लोग केवल दासप्रथा समाप्त करने वाले लोकप्रिय अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की हत्या के बाद, उनकी शवयात्रा में ही शामिल हुए थे। शिकागो की बहादुराना लड़ाई को ख़ून के दलदल में डुबो दिया गया, पर यह मुद्दा जीवित बना रहा और उसे लेकर दुनिया के अलग-अलग कोनों में मज़दूर आवाज़ें उठाते रहे। काम के घण्टे तय करने की लड़ाई, ग़ुलामी के खिलाफ इंसान की तरह जीने की लड़ाई थी। यह पूँजीवाद की बुनियाद पर चोट करने वाली लड़ाई थी। यह मज़दूर वर्ग की बढ़ती वर्ग-चेतना का और उदीयमान राजनीतिक चेतना का परिचायक थी। इसीलिए मई दिवस को दुनिया के मेहनतकशों के राजनीतिक चेतना के युग में प्रवेश का प्रतीक दिवस माना जाता है।

मज़दूर वर्ग का इतिहास पिछले डेढ़ सौ से भी अधिक वर्षों के संघर्षों का इतिहास है। इतिहास की शिक्षाएँ वर्तमान को समझने में मदद करेंगी और पुनर्नवा भविष्य-स्वप्नों को नयी विधि से परियोजनाओं में ढालने का मार्ग प्रशस्त करेंगी। इसलिए यह मायूसी का नहीं, बल्कि नये संकल्पों का समय है।  

आज हमारा मुख्य कार्यभार, मज़दूर वर्ग को शिक्षित-प्रशिक्षित करना है जिससे वह आगे बढ़कर व्यवस्थागत संकट को क्रान्तिकारी दिशा दे सके। आज एकतरफ आम मेहनतकश आबादी का जीना दूभर हो गया है, महंगाई अपने चरम पर है, कर्मचारियों के हकों पर भी हमले जारी हैं। आए दिन छात्र – नौजवान कहीं न कहीं फांसी का फंदा चूम रहे हैं, फिर भी समाज में चुुप्पी छाई है। दूसरी तरफ प्रतिक्रियावादी फासीवादी ताकतें लोगों को बाँटने के लिए जगह-जगह उन्माद भड़का रही हैं। तमाम संशोधनवादी ट्रेड यूनियन इसी व्यवस्था के भीतर कुछ दुवन्नी-चवन्नी की लड़ाई में मज़दूर वर्ग को उलझाएं हैं। आज मज़दूर वर्ग को उसके असली मिशन से परिचित करवाए बिना क्रान्तिकारी परिवर्तन संभव नहीं है। आज का दिन हमें अपने अतीत और अपने आज के संघर्षों से प्रेरणा और हौंसला लेने का दिन है।

Author

  • राजिम छत्तीसगढ़ के बलोदा बाज़ार ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। 2007 में, राजिम ने दलित और आदिवासी समुदायों के प्राकृतिक संसाधन अधिकारों पर काम करने के प्राथमिक उद्देश्य के साथ दलित आदिवासी मंच की स्थापना की। संगठन जल-जंगल-ज़मीन के अधिकारों के साथ-साथ तस्करी, यौन हिंसा, घरेलू श्रम मज़दूरी, स्वास्थ्य और रोज़गार के मुद्दों पर काम करता है।

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