दल बदल विरोधी कानून

राजू और स्वप्निल:

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ दिनों में 20 भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेता, पार्टी छोड़कर समाजवादी पार्टी (सपा) में शामिल हो चुके हैं और 10 अन्य दलों के नेता बीजेपी में शामिल हो गए हैं। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बहुजन समाज पार्टी की अधयक्ष मायावती ने प्रदेश में हो रहे दल बदलने के मामलों पर ऐतराज़ जताया और विरोध करते हुए कहा कि भारत में दल-बदल विरोधी कानून को और सख्त बनाने की ज़रूरत है। 

यह तो सब जानते ही है कि चुनाव इतने नज़दीक है, राजनीति अपने चरम पर है, गरमागरमी का माहौल है – दल बदल तो होंगे ही। सत्ता और पैसे पर निर्धारित चुनावों में विचारधारा और नैतिकता का कोई स्थान नहीं है। लोग भी लोकतंत्र के इस मायने और नेताओं की इस पीड़ा को समझते है। नेता चुनाव के टिकट और प्रचार में इतना पैसा लगा रहे है,तो अपना भविष्य सुरक्षित नहीं करेंगे? सत्ता और पैसे के बिना भारतीय राजनीति अधूरी है, ये साफ़ है। अब नेताजी का करीयर भी तो विचारधारा पर नहीं, बल्कि पैसे और सत्ता पाने के लिए शुरू हुआ था। 

गोवा और मणिपुर में भी चुनाव है, दल बदलने के मामले पिछली बार भी हो चुके हैं, तो इस बारी कांग्रेस पार्टी ने अपने नेताओं से शपथ दिलवाई कि निर्वाचित होने के बाद वो पार्टी नहीं बदलेंगे। अब ये देखना दिलचस्प होगा की लाखों-करोड़ों के सामने प्रतिज्ञा काम करेगी या नहीं।

वैसे, दल बदलना भारत में कोई नयी बात नहीं है, ऐसे किस्से अक्सर सुनने को मिलते है। अगर ताज़ा उदाहरण ले तो आपको याद होगा कि 2020 में मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में कांग्रेस पार्टी के विधायकों के पार्टी बदलने से कांग्रेस की सरकार गिर गयी थी। इसके अलावा गोवा, कर्नाटक में भी सरकार गिरने के मामले सामने आये थे। इस लेख के ज़रिये हम दल-बदल का कानून, उसका इतिहास, उद्देश्य से आपको रूबरू कराएँगे।

दल-बदल विरोधी (Anti-Defection)  कानून एवं इसका उद्देश्य:

जब सांसद/विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाते है, तो इसे दल बदल कहा जाता है।

60 के दशक में, चौथे आम चुनाव के बाद, एक छोटी सी अवधि (मार्च 1967 से  फरवरी 1968) में कम से कम 438 दल बदलने के मामले सामने आये। इसी समय हरियाणा के एक विधायक, गया लाल ने 15 दिनों के भीतर 3 बार अपना दल बदल लिया, इसलिए दल बदलने को आया राम – गया राम के नाम से भी जाना जाता है। 

दल-बदलने के बढ़ते मामलो के कारण राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने लगी। और विधानसभा और संसद के प्रति जनता के विश्वास में भी कमी आने लगी। जब निर्वाचित सांसदों और विधायकों ने चुनाव जीतने के बाद दल बदलना शुरू कर दिया तो संसद ने इस प्रचलन को नियंत्रित करने की आवश्यकता महसूस की। इसलिए पार्टी बदलने वाले सांसदों/विधायकों को दंडित करने के लिए संसद ने 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से दसवीं अनुसूची को शामिल किया गया। 

भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची (Schedule X) के अनुसार, जब कोई निर्वाचित सांसद या विधायक निम्नलिखित में से कोई कार्य करता है तो वो दल बदल माना जाता और उसकी सदस्यता दल बदल के आधार पर समाप्त कर दी जाती है और उसे अयोग्य घोषित (disqualify) कर दिया जाता है-

  • अपनी इच्छा से दल की सदस्यता छोड़ने पर। 
  • यदि कोई सांसद या विधायक अपने दल की अनुमति के बिना, सदन में अपने दल के किसी दिशा निर्देश के विरुद्ध मतदान करता है, तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जाती है। (लेकिन पंद्रह दिन के अंदर अगर दल उस सांसद या विधायक को क्षमा कर देती है, तो उस स्थिति में उसकी सदस्यता खत्म नहीं होगी)
  • यदि कोई निर्दलीय प्रत्याशी निर्वाचित होने के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी।
  • यदि कोई मनोनीत सदस्य शपथ लेने के बाद छह महीने में किसी दल में शामिल हो जाता है तो उसकी सदस्यता समाप्त हो जायेगी। 

1985 से अब तक का सफ़र:

1985 के संशोधन के अनुसार अगर दल के एक-तिहाई (1/3) नेता दल बदल करते थे तो उन्हें अयोग्य घोषित नहीं किया जाता था। लेकिन दल बदलने का सिलसिला इस संशोधन के बाद भी ज़ारी रहा और राजनीतिक पार्टियाँ एक तिहाई (1/3) नेताओं को खरीदने और बेचने का काम करने में लग गई। 1990 में चन्द्र शेखर और 61 अन्य साथियों ने जनता दल से दल बदल कर लिया। 2003 तक, जब दल बदलने के मामले रुके नहीं तो तो संसद ने 91वां संविधान संशोधन लागू किया। इस संशोधन द्वारा एक-तिहाई (1/3) वाले प्रावधान को हटा कर, दो तिहाई (2/3) कर दिया गया। इसके साथ यह बदलाव भी लाया गया, कि जब तक दल बदलने वाले सांसद या विधायक का कार्यकाल खत्म नहीं होता या अगला चुनाव नहीं आता, तब तक उस सांसद या विधायकों को किसी भी प्रकार का सरकारी एवं लाभ का पद भी नहीं मिलेगा। 

इस कानून के अनुसार दो परिस्थितियों में दल बदलने की छूट दी गई है- 

  1. यदि कोई सदस्य अपने दल टूट जाने या विघटन हो जाने के कारण दल से बाहर हो जाता है, तो उस स्थिति में उनकी सदस्यता समाप्त नहीं होगी। दल तब टूट जाता है जब दल के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक मिलकर, एक नए दल का गठन कर देते हैं या समूह बना लेते हैं। 
  2. इसी प्रकार जब किसी दल के दो-तिहाई (2/3) सदस्य मिलकर किसी अन्य दल में शामिल हो जाते हैं, उस स्थिति में भी उन सदस्यों की सदस्यता समाप्त नहीं होती है।

दल बदल शिकायत याचिका पर निर्णय:

दल-बदल की शिकायत बाद अयोग्यता से सम्बंधित सभी प्रश्नों का निर्णय उसी सदन का अध्यक्ष (Speaker) करता है जिस सदन में यह मामला हुआ है। शुरुआत में, इस कानून के अनुसार अध्यक्ष का निर्णय अंतिम माना जाता था और इससे सम्बन्धित सवाल को किसी भी कोर्ट में नहीं उठाया जा सकता था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1993 में कहा कि सदन के अध्यक्ष द्वारा दसवीं अनुसूची के आधार पर अयोग्यता से सम्बंधित किसी भी प्रश्न पर दिये गए निर्णय की समीक्षा कोर्ट में जा सकती है।

सदन का अध्यक्ष सत्ताधारी दल से होने के कारण, अयोग्यता से सम्बंधित निर्णय लेते समय पक्षपात करता है। कभी-कभी राजनितिक पक्षपात के कारण अध्यक्ष अयोग्यता से सम्बंधित याचिका को लम्बे समय तक लंबित रखते है और तब तक दल बदलने वाला नेता पार्टी में बना रहता है। अयोग्यता की याचिका पर निर्णय लेने की कोई समय सीमा नहीं तय की गयी है, लेकिन 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस याचिका का निर्णय तीन महिने के भीतर किया जाना चाहिए।

यह सभी प्रावधान होने के बावजूद भी, दल बदलने का प्रचलन रुका नहीं है। आज भी अवैध रूप से, सत्ता एवं आर्थिक लाभ के लिए नेता दल बदल करते हैं, इसलिए इस कानून की समीक्षा करनी ज़रूरी है।

बदलाव की ज़रूरत 

  • राजनितिक पार्टियाँ, दो-तिहाई (2/3) वाले प्रावधान का भी दुरूपयोग कर रही है। क़ानून में ऐसा नियम आना चाहिए जिसके तहत दल बदलने वाले नेता को नयी पार्टी में दल बदलने के अनुरूप टिकट नहीं दिया जाएगा, बल्कि दल बदलने के कुछ समय उपरांत ही टिकट दिया जा सकेगा, अंग्रेज़ी में इसे (Cooling off Period) बोलते हैं।
  • विभिन्न समितियों की रिपोर्टों में यह सुझाव भी दिया गया है कि अयोग्यता से सम्बंधित निर्णय सदन के अध्यक्ष नहीं बल्कि राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को चुनाव आयोग की राय के आधार पर लेना चाहिए।
  • जो भी इस क़ानून के अंतर्गत अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा, उनपर 3-5 वर्ष का, चुनाव लड़ने या सरकारी कार्यकाल सम्भालने पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

नेताओं की अयोग्यता से सम्बंधित याचिका का निराकरण तीन महीने के भीतर किया जाना चाहिए।

फीचर्ड फोटो आभार: नवभारत टाइम्स और रीड ओटीटी इंडिया

Authors

  • राजू ,राजस्थान के जोधपुर ज़िले से हैं और व्हाई.पी.पी.एल.ई. (YPPLE) के तौर पर सामाजिक न्याय केंद्र के साथ जुड़े हैं। वर्तमान में राजू मध्य प्रदेश में जेनिथ सोसायटी फॉर सोशियो लीगल एम्पावरमेंट संगठन के साथ कार्य कर रहे हैं। वह बास्केटबॉल खेलना एवं किताबें पढ़ना पसंद करते हैं।

  • श्रुति से जुड़े मध्य प्रदेश के संगठन जेनिथ सोसाइटी फॉर सोशियो लीगल एम्पावरमेंट को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले स्वप्निल, संगठन के कार्यकर्ता हैं। स्वप्निल पेशे से वकील हैं जो क्षेत्र के युवाओं के साथ मिलकर अलग-अलग मुद्दों पर काम की पहल कर रहे हैं। उन्हें खेलकूद करना और फोटोग्राफी करना पसंद करते हैं।

2 comments

  1. बहुत ही महत्वपूर्ण लेख। इस दल बदल के कारण लोगों को कई सारी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है इसलिए लोगों को इन दल बदल राजनैताओं को एक तरह कर नए राजनीति पार्टियों व प्रतिनिधियों को अवसर देने का समय आ गया है ऐसा लग रहा है।

  2. सटीक लेख है, दल बदल व कट्टरवाद दोनो साफ सुथरी राजनीतिक के लिए बहुत खतरनाक है।

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