गोण्ड समाज पर शादी कानून का बुरा असर

गुलाब नाग खुरसेंगा:

प्रस्तावना:- आदिवासी समाज की व्यवस्था को पूरी तरह से विलुप्त करने के लिए कानून बनाये गये हैं जो लड़की की आयु 18 से बढ़ाकर 21 वर्ष किया गया है! इस कानून के बनाये जाने से आदिवासी समाज कि बहन बेटियों के जीवन में, भविष्य में बहुत ही समस्या उत्पन्न हो जायेगी और वे पलायन होने पर मजबूर हो जाएंगी। गाँव में निवास कर रहे आम गरीब परिवारों के लिए इस तरह के कानून से आदिवासी की बहन और बेटियों के साथ अत्याचार और शारीरिक शोषण बलात्कार बहुत अधिक बढ़ जायेगा! 

(1) आदिवासी/गोण्ड समुदाय – आदिवासियों में एक ऐसा समुदाय है जो गोण्ड समाज से आते हैं। इनकी शादी की रस्म अपने पूर्वजों द्वारा बनाये गये नियमों व परंपराओं के अनुसार आज भी शासित व संस्कारित होती है। हमारे समाज में आज भी माता-पिता और अपने बड़े भैया या समाज के मुखिया के अनुसार, समाज की व्यवस्था के अनुसार व हमारे पारंपरिक समाज के नियम के अनुरूप ही काम किया जाता है जिसमें सभी की सहमती होती है! 

(2) माँ/बाप/बड़े भाई- इनका सर्वप्रथम यह काम होता है कि लड़का पक्ष के लोग लड़की पक्ष के घर में जाकर एक रातभर सोते हैं और सुनते हैं कि रात को सोते समय सियार (गोंडी में सिकटा) चिल्लाये या नहीं! सियार नहीं चिल्लाने पर अशुभ माना जाता है और सियार चिल्लाने/बोलने पर शुभ माना जाता है। ये शुभ-अशुभ देख कर, लड़की के घर वालों के साथ शादी की बातचीत किया जाता है या बिना बात किये वापस चले जाते हैं। यह व्यवस्था आज भी गाँवों में लागू है! 

लेकिन अब जहाँ पर शहरीकरण हो रहा है वहाँ पर आदिवासी समाज के लोग जो गाँव में निवास कर रहे आम जनता या फिर जो बी.ए., एम.ए. का पढ़ाई अध्ययन कर लिया है, वे लोग इस प्रकार कि व्यवस्था को नहीं मानते हैं। ये लोग सबसे ज़्यादा समाज को वैदिक धर्म की ओर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।  

(3) शादी की आयु 18 से 21 वर्ष करने के नुकसान – आयु बढ़होतरी से आदिवासी समुदाय की बहन/बेटियों के साथ-साथ समाज को भी व्यापक स्तर पर प्रभाव पड़ेगा। इस प्रकार का कानून, हमारे समाज की व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। कयोंकि भारत में निवास करने वाले सभी भारतीय नागरिकों को 18 वर्ष की आयु से ही अपना मताधिकार का उपयोग कर सकता है तो ठीक उसी प्रकार से भारत ही नहीं पूरी दुनिया में जितने भी मानव जाती समुदाय में 18 वर्ष से शादी अनिवार्य कर दिया गया है। लेकिन 21 वर्ष होने से विभिन्न प्रकार के घटनाएं होने की भविष्य में संभावना को इंगीत करता है। इसमें जो अमीर लोग हैं उसी परिवारों का ज़्यादा फायदा भविष्य में होने की संभावना है। केस दर्ज होना, बढ़ेगा और इसमें जो राजनीतिक शरण में रहते हैं, उन लोगों का किसी भी प्रकार से नुकसान नहीं होगा। तो लोग उनकी शरण में जाएँगे।  

(4) रिलेशनशिप के लिए अनुमति 16 वर्ष – सरकार द्वारा भारतीय कानून में यह प्रावधान है की 16 वर्ष से लड़की अपनी इच्छानुसार किसी साथ भी रिलेशनशिप सेक्सपीयर रख सकती है। सरकार द्वारा छूट दी जा रही है तो एक प्रकार से दोनो पहलुओं को समझ नहीं आ रहा है की भारत की कानून व्यवस्था की सामाजिक हित पर बनाया गया नियमों को किस प्रकार से अमल में लाया जाये। मेरे लिए यह कल्पनाओं से परे है कयोंकि शादी के लिए 21 वर्षों होना अनिवार्य है। इस बीच में यदि लड़की को लड़का छोड़ देता है तो उस प्रेम में मंत्रमुग्ध होकर लड़की आत्महत्या करने की संभावना है। ऐसा देखा गया है कि समाज में आत्महत्या बढ़ रही है और भविष्य में और अधिक बढ़ने की संभावना है। 

इस प्रकार के कानून का पारित हो जाने से समाज किस प्रकार के नियमों का पालन करेगा यह समाज के लिए सबसे बड़ा सवाल खड़ा करता है। इस साजिश को समझना बहुत ही जरूरी है और इसका बहुत अधिक प्रभाव गाँव में निवास कर रहे गरीब किसानों पर पड़ेगा, जिनके पास जमीन ज्यादा नहीं है। वे आथिर्क तंगी के कारण अपने बच्चों को स्कूल में दखिला कर पढ़ाई नहीं करवा पाते और यदि पढ़े भी है तो 5 वी और 8 वी या अधिक से अधिक 10 व 12 तक पढ़ाई किया है। ऐसे स्तिथि में समाज के युवा और युवतियों के लिए अपना शारीरिक संबंध बना कर भाग जाने की संभावना अधिक है। ऐसी परिस्तिथियों में आदिवासी समाज के आने वाली पिढ़ीयों के लिए एक बहुत बड़ा संकट उतपन्न होगा और आदिवासी समाज की दिशा और दशा में सुधार होने के बजाय भयावह हो जायेगा! 

(5) स्वास्थ्य पर प्रभाव – भारत में आज भी कुपोषण और विभिन्न प्रकार की बिमारियों से आदिवासी समुदाय, ग्रामीण क्षेत्र के लोग ग्रसित होते रहते हैं। गाँव गाँव में स्वाथ्य की स्तिथि में सुधार नहीं हो पाया है। इस दिशा की ओर सरकार को काम करने की जरुरत है। शादी की आयु 21 वर्ष बढ़ाने से समाज मे हो रहे विभिन्न प्रकार गाँव में पढ़ाई पूरी कर रहे युवतियों के लिए रोजगार की मुख्य धारा से जोड़कर उनकी परिवार की आथिर्क स्थित में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए और इस प्रकार से आदिवासी समाज में आने वाले पिढ़ीयो को बचा पाना बहुत मुश्किल हो जायेगा। 

(6) निष्कर्ष – आने वाले समय में आदिवासियों के रूढ़ी व्यवस्था को समाप्त कर राजनीतिकरण कर उच्चे उहदे पर बैठे लोग फ़ायदा उठा लेंगे। इस कानून से युवा और अधिक कानून में फंसेंगे और थानादर और सेट साहूकारों का सबसे अधिक फ़ायदा होगा यह कानून उनके लिए कमाई का एक तरीका बनाने का बहुत बड़ा अवसर हो जायेगा । और इसका खामयाजा आदिवासी समाज पर सबसे अधिक पदेगा। अधिकतर युवा लड़के अब जेलों में मिलेंगे।  

फीचर्ड फ़ोटो आभार: विकीमीडिया

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  • गुलाब नाग खुरसेंगा, छत्तीसगढ़ के बलरामपुर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह पारंपरिक आदिवासी महासभा संय्युंग-बु-गण्डवाना भारत के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

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