एड. अशोक सम्राट:

कुछ सालों से देश में ग्लोबल ट्रेंड दिखने को मिल रहा है, अंतर्राष्ट्रीय मानव अधिकार दिवस, मनाने का। लेकिन यह पूछना चाहिए – किसका मानवधिकार? गरीब? वंचित? शोषित, पीड़ित, महिला? बच्चे? वृद्ध? मज़दूर? दलित? आदिवासी? निर्बल? अशक्त? विक्लांग? धार्मिक लघुमती?

जैसे गणतंत्र दिवस या अन्य राष्ट्रीय त्योहार सरकारी दफ्तर या स्कूलों में मनाया जाता है, ठीक वैसे ही अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस संस्थानों में मनाया जाता है। लेकिन मानवाधिकार की व्याख्या काफ़ी बड़ी है। क्या सही मायने में हमारे अधिकार सुरक्षित हैं? क्या शासन-प्रशासन न्याय की प्रक्रिया में है? जब कल अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिन मनाया जा रहा था, उस दिन की यह घटना है।

9 दिसम्बर और 10 दिसम्बर 2021 की आधी रात को जब देश-विदेश के कुछ संस्थान विश्व मानवाधिकार दिवस मनाने की तैयारी कर रहे थे तब भारत के गुजरात राज्य की पूर्व पट्टी में बसे छोटा उदयपुर ज़िले के 16 नाइक आदिवासी मज़दूर, जिनमें महिला व बच्चे भी थे, गुजरात के सुरेन्द्र नगर जिले के ध्रांगध्रा तहसील में कुछ सामंतवादियों द्वारा बंधुआ बनाए हुए थे।

कुछ महीनों पहले इन सभी 23 मज़दूरों को ज़मीन मालिक, ध्रांगध्रा तहसील के अपने गाँव जीवा में लाये थे। इनके साथ तय हुआ था कि ये मालिक की 200 बीघा खेत पर खेती पर काम करेंगे और फ़सल का चौथा हिस्सा इन्हें मिलेगा। इन्हें वादा किया गया था कि मज़दूरी करते हुए इन्हें हाट-बाज़ार करने के खर्च के लिए पैसे दिये जाएँगे, एडवांस रुपए दिये जाएँगे, रहने की जगह, पानी और बिजली भी मालिक द्वारा दी जाएगी।

शुरूआत में मालिकों ने ठीक-ठाक व्यवहार किया पर बाद में असली चेहरा दिखाया। सुविधा या दिए प्रलोभनों को पूरा नहीं किया। मज़दूरी मांगने पर 18 नवम्बर 2021 को एक मज़दूर को चार मालिक भाइयों ने पीटा और सभी 23 मज़दूरों को गंदी गालियां दीं। मज़दूर दूर के ज़िले के थे तो बहुत डर गए थे। हिम्मत जुटा कर सभी थाने गए, लेकिन वहाँ उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। उल्टा, पुलिस और स्थानीय गांव के लोगों ने भी मालिक का पक्ष लेकर मज़दूरों को दबाकर एकतरफ़स समझौता करवा दिया और कोई लिखा-पढ़ी या आवेदन थाने पर नहीं हुआ। मालिकों ने पुलिस के सामने आवाज़ उठाने वाले, छः हिम्मती मज़दूरों को व जिस मज़दूर को मारा था, उन सभी को, मज़दूरी या किराया दिए बिना, भगा दिया।

चारों मालिक सोलह मज़दूरों को वापस अपने खेत, जीवा ले गए और फिर से उनको काम कराना शुरू करवा दिया। मालिकों का कहर मज़दूरों पर बढ़ने लगा। बाज़ार खर्च आधा कर दिया या देना बंद करना शुरू कर दिया। मज़दूर अपने परिवार और बच्चों के साथ बढ़ते जुल्म और सितम को सहन करते रहे।

इनमें से एक मज़दूर ने अपना विडियो बनाकर किसी परिचित को भेजा। वह वीडियो किसी ने यू ट्यूब पर अपलोड किया जो हमें, यानी, मजदूर अधिकार मंच, अहमदाबाद, को छोटा उदयपुर की एक महिला, सामाजिक कार्यकर्ता, कपिला बहन ने भेजा। तत्काल 8 दिसम्बर 2021 को हम छोटा उदयपुर में उनके गांव गए और जिन सात मज़दूरों को मालिक ने भगा दिया था, उनसे मिलकर घटना को समझा। तब पता चला कि मालिक सोलह मज़दूरों को जबरन अपने खेतों में काम करवा रहा है। कोई सुविधा भी नहीं है और वे सब काफी यातना भुगत रहे थे। यह सब बातें हमें, उनके परिचित मज़दूर और मार खाने वाले मज़दूर ने बताईं।

हम 9 दिसंबर को सभी सोलह मज़दूरों को छुड़ाने, उनके परिजनों के साथ, छोटा उदयपुर से ध्रांगध्रा पहुंचे। वहाँ, एसडीएम साहब को बंधुआ मज़दूर धारा अन्तर्गत, मज़दूरों को जबरन बंधुआ मज़दूरी से छुड़वाने के लिए आवेदन दिया। एसडीएम साहब ने तत्काल ही हमारे आवेदन पर काम शुरू कर दिया। पुलिस व श्रम अधिकारी को तुरंत सूचना दी। हमें थाने जाने को कहा गया। हम ध्रांगध्रा तालुका पुलिस थाने गए। वहाँ पीआई, श्री वाघेलाजी को पूरे केस की सभी घटनाओं से अवगत करवाया। दोपहर 2 बजे पुलिस सभी सोलह मज़दूरों को छुड़वाने खेत की ओर रवाना हुई, जो जगह थाने से पंद्रह से बीस कि.मी. दूर थी। श्रम अधिकारी भी थाने पहुंच गए थे। रात के दस बजे के आस-पास सभी सोलह मज़दूरों को छुड़वा कर, पुलिस, थाने ले आई। श्रम अधिकारी श्री चूड़ासमा जी ने सभी मज़दूरों के देर रात तक निवेदन लिए। बीच में हमने सभी मज़दूरों और बच्चों को खाना खिलाया। सभी काफ़ी थके हुए और दबे थे। श्रम अधिकारी ने मज़दूरी भुगतान हेतु चारों मालिकों से सरकारी रेट से हिसाब करने को कहा। खेत मज़दूरी का सरकारी रेट 340 रुप्ये प्रति मज़दूर प्रति दिन है। श्रम अधिकारी ने बताया कि इस हिसाब से मज़दूरों की कुल मज़दूरी लगभग 14 लाख के आसपास बनती है। मालिकों ने इतना पैसा देने को माना कर दिया।

हमने पुलिस अधिकारियों से कहा कि यदि ये पैसा नहीं देना चाहते तो मज़दूरों के साथ हुई मारपीट, गाली-गलोच ओर सरकारी भाव से हिसाब नहीं देने के मामलों में FIR दर्ज की जाये। इस बीच मालिक के परिचित व स्थानीय लोग, मालिकों के पक्ष में बड़ी संख्या में इकट्ठा हो गए थे और दबाव बना रहे थे कि कोई कार्यवाही ना हो। लेकिन इनके सामने हमारे परिचित स्थानीय दलित संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भी मज़दूरों के पक्ष में मोर्चा संभाला। अंततः पीआई वाघेला जी ने मज़दूरों को सुना और मज़दूरों की एफआईआर दाखिल हुई। क्योंकि मज़दूर अनुसूचित जन जाति के थे तो एससी एसटी एक्ट (एट्रोसिटी एक्ट) के तहत मामला दर्ज हुआ।

देर रात हो गई थी। मज़दूरों के खाने-पीने की कोई व्यवस्था प्रशासन की ओर से नहीं की गई। स्थानीय दलित संगठन के साथी महेन्द्र भाई और उनकी टीम ने सभी को देर रात नाश्ता करवाया और ध्रागधरा के डॉ आंबेडकर हॉल में ठहरने की व्यवस्था की। रात को चार बजे पुलिस प्रोटेक्शन नहीं मिलने पर भी, मज़दूरों का सामान मालिकों के गांव जाकर लाया गया। 10 दिसम्बर को DySP साहब ने सभी के निवेदन लिए। अपराधी को पुलिस ने पकड़ लिया और शाम को ट्रक की व्यवस्था करके सभी मज़दूरों को उनके सामान और परिवार के साथ छोटा उदयपुर भिजवा दिया गया।

पूरे कार्य में काफी यात्राएं, चर्चा, संघर्ष हुआ। आखिरकर सभी मज़दूर, पुलिस, प्रशासन की मदद से बंधुआ मज़दूरी से छूटे। इस संघर्ष से हमें बहुत सीख मिली जिसे कार्यकर्ताओं को याद रखना चाहिए। शिक्षा, हिम्मत और संगठन के बिना यह कार्य करना मुमकिन नहीं होता। सभी मज़दूरों को छुड़वाने में साथी रमेशजी, दिनेशजी, बलवंत राजपूत जी ओर विशेषकर कपिला बहन व दलित संगठन, ध्रांगधरा का महत्त्वपूर्ण सहयोग रहा। दूसरा कि स्थानीय लेवल पर मालिक की पहचान सविशेष होती है। ऐसी घटनाओं में दूसरे मालिक या किसान भी मज़दूरों के विरूद्ध में ही रहते हैं और इनकी संख्या भी अधिक होती है। लीगल या यूनियन टीम से सिर्फ तीन-चार लोग ही मज़दूरों के पक्ष में होते हैं। कभी भी बड़ा हादसा होने की संभावना होती है। यह तो अच्छा था कि हमारे भी स्थानीय सपोर्ट ग्रुप पहचान में थे वरना यह सब मालिकों के तहसील या गांव में जाना, ये सब करना या करवाना, काफ़ी मुश्किल और गंभीर मामला होता है। इसलिए ऐसे काम में एक बड़ी सक्षम टीम होना, यह पहली आवश्यकता रहती है। इससे यह सीख भी मिलती है कि सभी जिलों के स्थानीय प्रगतिशील संगठनों की आपसी दोस्तियाँ होना बहुत ज़रूरी है। सरकारी अधिकारियों को भी अपने काम से जोड़ना चाहिए क्योंकि उनकी सकारात्मक भूमिका से काम आसान हो जाते हैं।

हमारे संघर्ष से जुड़े सभी साथियों को जिंदाबाद।
जय भीम। जय जोहार। जय भारत। जय संविधान।

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