चित्तौड़गढ़ के गावों की दिवाली – आधारशिला स्कूल की लड़कियों के आलेख

विषमता उजागर करता दिवाली का त्यौहार

मधु भील:

मैंने अपने गाँव में दिवाली के त्यौहार को विशेष त्यौहार के रूप में मनाते नहीं देखा। मेरे गाँव में मैंने देखा कि धनतेरस के दिन औरतें सुबह जल्दी उठकर लाल मिट्टी खोदकर लाती हैं, साथ में लच्छा, गुड़, अगरबत्ती और दीपक आदि ले जाती हैं और वहां पूजा करके मिट्टी लेकर आती हैं। फिर उसी मिट्टी से लक्ष्मी माता के पूजा के स्थान को लीपती हैं। शाम के समय माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है। सभी लोग अपने पूर्वजों एवं देवताओं को घी-चावल का भोग चढ़ाते हैं। किसान भी अपने पशु जन को अपना धन समझता है, उनको प्यार से नहलाते हैं और उनके मेहंदी व अन्य रंग लगाते हैं और उनकी भी पूजा की जाती है। किसान बैलों को ही अपना धन मानता है क्योंकि बैल ही किसानों के फ़सल जोतने के काम आते हैं। गाय के गोबर से औरतें गोवर्धन बनाती हैं और उनकी पूजा करती हैं। हमारे गाँव में औरतें इकठ्ठा होकर भजन गाती हैं। उस दिन सभी के घरों में अनेक प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं, लेकिन मेरे घर पर केवल पूड़ी-दाल, मीठे चावल, तथा पकौड़ी बनाई जाती हैं। 

दीपावली हर त्यौहार की तरह एक त्यौहार है। जैसे-जैसे दीपावली के दिन नज़दीक आते जा रहे हैं मुझे बहुत खुशी हो रही है। ऐसा लग रहा है जैसे दीपावली आँखों में नज़र आ रही हो। हमारे गाँव की औरतें दीपावली के आने से पहले अपने घरों की सफाई में लग जाती हैं। अपने पूर्वजों के स्थान पर भी साफ़-सफ़ाई करती हैं। उनके चबूतरे लीपती हैं। गाँव में किसान भी बहुत खुशी से इस त्यौहार को मनाते हैं। इस त्यौहार के आने तक खेतों की फ़सल भी घर आ जाती है। फिर वो अपने खेतों में एक नई फ़सल बो देते हैं। शहर के लोग इस त्यौहार को बड़े विधि-विधान से मनाते हैं लेकिन गाँव में इसे अलग प्रकार से मनाया जाता है। 

शहर में अधिकांश लोग नौकरी वाले होते हैं, उनके पास पैसों की कमी नहीं होती इसीलिए वे महंगे-महंगे कपड़े व मिठाइयाँ खरीदते हैं। अपने घरों में अनेक प्रकार के पकवान बनाते हैं। घरों को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाते हैं। ज़रूरत से ज़्यादा खर्च करते हैं। लेकिन हमारे छोटे से गाँव में ऐसा कुछ नहीं होता है। हमारे गाँव में तो अधिकांश लोग किसान ही हैं। उनके पास उतने पैसे नहीं होते कि वे अपने बच्चों को हर त्यौहार पर नए-नए कपड़े दिलवाएँ। कुछ लोगों की तो आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि त्यौहार आने पर दस बार सोचते हैं कि घर पर आने वाले मेहमानों को क्या खिलाएँगे। कुछ घरों में मैंने खुद देखा है कि त्यौहार के दिन भी वे रोज़ की तरह रोटी और आटे की राबड़ी बना लेते हैं, और उसी में खुश हो जाते हैं। 


पशुओं का त्यौहार – दिवाली

पूजा मीणा:

सबसे पहले दिवाली से 10-15 दिन पहले घरों की साफ-सफाई की जाती है। दिवाली के दिन दीपावली नहीं मनाते हैं बल्कि उस दिन सिर्फ दीपक जलाते हैं। दिवाली के दूसरे दिन दीपावली मनाते हैं। उस दिन गोवर्धन जी को सभी बनाते हैं। पशुओं के गोबर से यह गोवर्धन जी बनाए जाते हैं। सूख जाने पर उनको थोड़ा रंग कर सब अपने घरों से लाते हैं और फिर गोवर्धन जी की पूजा पूरे गांव के लोग मिलकर करते हैं। लड़कियां गीत गाती हैं और गोवर्धन जी के आसपास नाचती हैं, फिर गोवर्धन जी को पूजते हैं। इस दिन पूरे गांव के लोग फीके चावल बनाते हैं और फिर फीके चावल से गोवर्धन जी को पूजते हैं, सभी घर के लोग एक-एक प्लेट चावल लाते हैं और फिर गोवर्धन जी के सामने रखते हैं, फिर जिसके घर कोई संतान नहीं होती है उससे गोवर्धन जी की पूजा करवाते हैं और फिर चावल की प्लेट को एक परात में खाली कर सभी को बांटते हैं।  

बनाए हुए गोवर्धन जी में फिर बच्चे पटाखे फोड़ कर उन्हें बिगाड़ते हैं और छोटे बच्चे पीर-तिल से, छुर-छुरिया आदि से खेलते हैं। उसी दिन ही गाय, बैल, भैंस, बकरियों आदि को नहलाते हैं और मेहंदी लगाते हैं। बड़े लोग उनको बांधते हैं और उनके सींघों को रंगते हैं। तैयार करके इन जानवरों को गोवर्धन जी के ऊपर से निकालते हैं। दिवाली के दिन शाम को ट्रैक्टर, गाड़ी आदि की पूजा छोटी लड़कियों से करवाते हैं और पैसे देते हैं। मिठाई बांटी जाती है, और घर में नए-नए पकवान बनाते हैं। इसे पशुओं का त्यौहार बोलते हैं।

फिर ग्यारस को गोवर्धन को उठाते हैं। उस दिन शाम को सभी गांव में इकट्ठा होते हैं और गोवर्धन जी पर पड़े गोबर को थोड़ा-थोड़ा सभी लोग अपने पशुओं के साथ वापस ले जाते हैं। उनको बांधकर वहीं पर वह गोबर रखते हैं। हमारे यहाँ पर भाई दूज नहीं मनाते हैं।


गोबर के गोवर्धन ही हैं दिवाली के देवता

गायत्री नायक:

हमारे गांव में दीपावली के दो-तीन दिन पहले ही घरों की साफ़-सफ़ाई, रंगाई-पुताई होने लग जाती है। दिवाली के 2-3 दिन पहले, लोग बाज़ार जा कर अपने बैलों, भैंसों, बकरी आदि को पहनाने के लिए गुगरा लाते हैं और फिर बैलों को नहलाने के लिए तालाब में ले जाते हैं।

नहलाने के बाद बालों को रंग लगाते हैं और उन्हें सजाते हैं। इसी दिन पालतू जानवरों को मेहंदी लगाते हैं। दिवाली के दिन अपने अपने घरों पर गाड़ियों की पूजा, बैलों की पूजा, ट्रैक्टर की पूजा आदि में लोग जुट जाते हैं और अपनी खुशी प्रकट करते हैं। पूरे गांव में दीपों का उजाला होता है और लोग पटाखे फोड़ते हैं और खूब शोर मचाते हैं।

अमावस्या के दो दिन पहले ही धनतेरस आती है। लोग नया बर्तन खरीदते हैं। अमावस्या के दूसरे दिन सुबह हर घर में औरतें अपने घर के बाहर गोबर से गोवर्धन बनातीं हैं। श्याम को बच्चे गोवर्धन पर पटाखे छोड़ते हैं। गोवर्धन जी की पूजा की जाती है। गोवर्धन जी को छोटी दिवाली के दिन पूजा करके घर में लाते हैं। उसी दिन भाई-भोजाई का और बहन अपने भाई के लिए उपवास करती है।


इस दिन सभी घरों में मिठाइयां बनती हैं और पूरे गांव में पकवान की खुशबू फैल जाती है। लोग उस दिन नए कपड़े पहनते हैं और एक दूसरे के घर जाकर मिलते हैं तो खुशी प्रकट होती है। भारत के हर त्यौहार एवं उत्सवों का एक महत्व होता है, जैसे कि कृषि में ऋतु परिवर्तन होता है खेतों में नई फसल आ जाने पर मानव का मन खुशी से उत्सव-त्यौहार के साथ झूम जाता है, इसीलिए दिवाली एक प्रमुख त्यौहार है।

फीचर्ड फोटो आभार: विकीमीडिया

Authors

  • मधु राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वर्तमान में मधु कक्षा 10 में पढ़ती हैं। लॉकडाउन के बाद से वह अपने गाँव में वृद्धा पेंशन, टीकाकरण और कोविड महामारी के बारे में जागरूकता और से बचाव के मुद्दों पर काम कर रही हैं।

  • पूजा, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वर्तमान में पूजा, भदेसर गाँव में शुरू हुआ स्थानीय स्कूल- आधारशिला विद्यालय में कक्षा 9 में पढ़ती हैं।

  • गायत्री, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ ज़िले से हैं। वर्तमान में गायत्री, भदेसर गाँव में शुरू हुआ स्थानीय स्कूल- आधारशिला विद्यालय में कक्षा 7 में पढ़ती हैं।

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