क्यों अडिग है किसान आंदोलन ?

अरविंद अंजुम:

आप जानते ही हैं कि पिछले 9 महीने से भी ज़्यादा समय से किसान तीन कृषि कानूनों की वापसी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी के लिए आंदोलन कर रहे हैं। ये किसान दिल्ली के सिंघु, टिकरी और गाजीपुर बॉर्डर पर अनवरत धरना दे रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई  नहीं है।

किसानों को दिल्ली आने से रोकने के लिए सड़कों पर खाइयां खोदी गई, कीलें बिछाई गई और कटीले तारों के बाड़ लगाए गए, मानो शत्रु देश से युद्ध की तैयारी चल रही हो। किसानों को अलग-अलग माध्यम से खालिस्तानी, सिक्ख, जाट, चाइना के एजेंट, देशद्रोही आदि कह कर बदनाम करने का प्रयास हुआ, पर वे आज भी अडिग हैं, तो क्यों?

हम एक खबर से इस प्रश्न के जवाब तलाशने की शुरुआत कर सकते हैं। दुनिया का सबसे अमीर आदमी, बिल गेट्स अमेरिका का सबसे ज़्यादा ज़मीन का मालिक हो गया है।  उसने 42 हज़ार एकड़ जमीन खेती के लिए खरीदी है। आप सोचें, कंप्यूटर का दिमाग — सॉफ्टवेयर बनाने वाला आदमी अब खेती-ज़मीन क्यों खरीद रहा है?

मनुष्य के जीवन के लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी है- हवा, पानी और अनाज। आजकल बढ़ते प्रदूषण के चलते वायुमंडल में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो रही है। इसलिए सम्पन्न लोग अब अपने घरों में, दफ्तरों में, कारों में एयर प्यूरीफायर या वायु- शोधन यंत्र लगा रहे हैं। घरों-कार्यालयों में ऑक्सीजन की संतुलित मात्रा बनाए रखने के लिए ऑक्सीजन सिलेंडर लगा रहे हैं; अर्थात ऑक्सीजन, हवा की बिक्री शुरू हो चुकी है। पानी तो पहले से ही बिक रहा है। तीसरी जो सबसे ज़रूरी चीज़ है अनाज, उसे भी कॉरपोरेट के हाथ में एकमुश्त दे देने की कोशिश का हिस्सा है तीनों कृषि कानून।

क्या है कृषि- कानून?

कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सरलीकरण) कानून

सरकार का दावा है कि किसान एपीएमसी अर्थात सरकारी मंडियों के बाहर भी अपनी उपज बेच सकेंगे और इस तरह वे आज़ाद हो जाएंगे। साथ ही निजी खरीदारों से उन्हें बेहतर दाम मिलेगा। अभी भी देश में मात्र 6% अनाज ही सरकारी मंडियों में बेचा जाता है, बाकी 94% तो व्यापारी ही खरीदते हैं। तो क्या ये व्यापारी किसानों को उचित दाम देते हैं? धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रति क्विंटल 1868 रु है। पर सोनभद्र के किसानों को 1100 रु प्रति क्विंटल से ज्यादा नहीं मिला है।

किसान व्यापारियों को कम कीमत पर धान बेचने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि यहां मंडियों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। भारत में सिर्फ 5 हज़ार मंडियां हैं, जबकि यहां 42 हज़ार मंडियों की ज़रूरत है। प्रत्येक 5 किलोमीटर के दायरे में एक मंडी होनी चाहिए। सरकार दीर्घकाल में फायदा होने का भी दावा करती है। बिहार में एपीएमसी कानून 2006 में खत्म कर मंडियों को समाप्त कर दिया गया। अनाज खरीदी के लिए पैक्स बनाया गया, लेकिन 2020 में बिहार के कुल गेहूं उत्पादन का मात्र 1% ही खरीदा गया। पंद्रह बरस के बाद भी सिर्फ 1 प्रतिशत। दीर्घकाल क्या सौ बरस का होगा ?

सरकार इस कानून के द्वारा अपनी मंडियों को समाप्त कर देगी और इसे कॉरपोरेट्स के हवाले कर देगी। कॉरपोरेट मनमानी कीमत तय करेंगे और उसे खरीदेंगे। इस साल हिमाचल प्रदेश में अदानी एग्री फ्रेश कंपनी बागवानों को सेब का दाम पिछले वर्ष की तुलना में प्रति किलो 16 रु कम दे रही है। जियो सिम को तो आप भूले नहीं होंगे। पहले फ्री और अब 599 रु। किसानों के साथ भी यही होगा।

कृषि (सशक्तिकरण और संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार कानून

सीधी भाषा में इसे कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग या ठेका खेती कहा जा सकता है। इस कानून के ज़रिए ठेकेदार या कॉरपोरेट्स किसानों से निश्चित समय के लिए निश्चित कीमत पर खेती करने के लिए किराए पर ज़मीन ले सकेगा और उसमें मनमाने तरीके से खेती करेगा। अगर इस करार को लेकर कोई विवाद हुआ तो किसान न्यायालय में भी नहीं जा सकेंगे, इस कानून के द्वारा यह सुनिश्चित किया गया है। एक अनुमंडल पदाधिकारी स्तर का अधिकारी ही ऐसे विवादों का निपटारा करेगा। आप समझ सकते हैं कि ये पदाधिकारी किसके पक्ष में रहेंगे, बड़े-बड़े ठेकेदारों के पक्ष में या साधारण किसानों के पक्ष में। इस तरह किसान अपनी ही ज़मीन पर दूसरे दर्जे का हो जाएगा, बेचारा बन जाएगा।

आवश्यक वस्तु संशोधन कानून

इस कानून के द्वारा खाद्यान्न के भंडारण पर लगी सीमा को समाप्त कर दिया गया है। सरकार का कहना है कि किसानों को इसका लाभ मिलेगा। वे ज़्यादा दाम मिलने पर बाद में इसे बेच सकेंगे। अब इन हुक्मरानों से कौन पूछे कि कितने किसानों के पास गोदाम है? होगा यही कि फसल के आते ही कॉरपोरेट्स अनाज को सस्ते में खरीद कर अपने गोदामों में भर लेंगें। जमाखोरी के द्वारा बाज़ार में बनावटी अभाव बनाएंगे और फिर ऊंची कीमत पर अनाजों को बेचेंगे।

वास्तव में इन तीनों कृषि कानूनों का उद्देश्य कृषि एवं अनाजों को कॉरपोरेट के हवाले करना है। कहा यह जा रहा है कि इससे कृषि क्षेत्र का मुनाफा बढेगा पर वह मुनाफा किसके जेब मे जाएगा? किसान इस बात को समझ गए हैं। इसलिए इन कानूनों को समाप्त कराने के लिए अडिग हैं। व्यापारियों को भी मुनाफे का नया क्षेत्र चाहिए अतः उनका हौसला बुलंद है। इस तरह टकराव जारी है ।

पूर्वांचल और बिहार के किसान

यह सवाल भी उठाया जाता है कि जब पूर्वांचल और बिहार के किसान ज़्यादा गरीब हैं, तो फिर वे आंदोलन क्यों नहीं कर रहे? इस प्रश्न का इशारा यह है कि अपेक्षाकृत संपन्न होने के बावजूद अगर पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान आंदोलन कर रहे हैं, तो यह पूर्वाग्रह से ग्रसित और राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित है।

देश में दो प्रकार के किसान हैं — विपन्न और खुशहाल किसान। बिहार, पश्चिमी पूर्वांचल और देश के अन्य कई हिस्सों में विपन्न किसान बसते हैं;  हालांकि एक जमाने में यहां भी खुशहाल किसानों की अच्छी संख्या थी। लेकिन कालक्रम में कई कारणों से वे खुशहाल से विपन्न किसान में तब्दील हो गये। विपन्न किसान परिवारों की नौजवान पीढ़ी दिल्ली, मुंबई, गोवा, तमिलनाडु, केरल, पंजाब, हरियाणा इत्यादि जगहों पर जाकर मज़दूरी करती है और घर के वृद्ध बची-खुची खेती-बारी संभालते हैं। इन इलाकों में न्यूनतम समर्थन मूल्य प्राप्त करने के लिए मंडिया नहीं है। इन्होंने कभी अपने अनाज मंडियों में नहीं बेचे और न ही उसके लाभ के अभ्यस्त हुए। इसलिए आज जब एमएसपी खत्म किया जा रहा है, तो इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। पूर्वांचल के सोनभद्र के किसानों को इस बार धान का अधिकतम मूल्य 1100रु प्रति क्विंटल के हिसाब से मिला है। इस तरह प्रति क्विंटल लगभग ₹800 का घाटा हुआ।

इन गरीब किसानों में न तो खोने का एहसास है और न ही बेहतर जीवन की आकांक्षा। इसलिए यहां के किसान आंदोलनरत नहीं है। यहां आंदोलन तभी हो सकता है जब किसान अपनी तरक्की की चेतना और संकल्प से लैस हों।

किसान आंदोलन के साथ-साथ हम और क्या करें

भारत में 14 करोड़ किसान परिवार हैं। इनके जीवन में सुधार से ही समाज और अर्थव्यवस्था में  सुधार होगा। खेती बहुत हद तक स्वायत्त, आत्मनिर्भर और आज़ाद  क्षेत्र है। लेकिन खेती भी धीरे-धीरे खाद, बीज, कीटनाशक, उपकरण, डीजल, बिजली इत्यादि के मामले में बाज़ार पर निर्भर होता गया है। इनके उत्पादक इन सामानों का दाम तय करते हैं। खेती की लागत बढ़ रही है। अनाज, सब्जी, फल, दूध, मांस-मछली, जड़ी-बूटी इत्यादि का उचित दाम नहीं मिलता है, क्योंकि इसका मूल्य- निर्धारण भी किसान नहीं करते, बाज़ार वाले करते हैं। बाज़ार मुनाफाखोरों और व्यापारियों के हाथ में है। ये कानून उन पर लगे प्रतिबंधों को और कम करेंगे।

इसलिए किसान अभी खेती के क्षेत्र में जो कर रहे हैं, उससे आगे बढ़कर उन्हें उद्यमशीलता अपनानी होगी। किसान अभी सिर्फ उत्पादन करते हैं; जबकि किसानों को उत्पादन के साथ-साथ भंडारण, प्रसंस्करण, वितरण और मूल्य निर्धारण भी करना है। खेती के नए-नए तरीके ढूंढने हैं, बीजों को उन्नत बनाना है, शोध करना है, पानी की व्यवस्था करनी है, खेती की लागत को कम करना है; यह सब काम किसानों को करना है। सरकारों के भरोसे बैठे न रहे।

Author

  • श्रुति से जुड़े झारखण्ड के संगठन विस्थापित मुक्ति वाहिनी को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले अरविन्द भाई, अभी जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी के अंशकालिक कार्यकर्ता हैं। अध्ययन, अनुवाद, प्रशिक्षण जैसी वैचारिक गतिविधियों में विशेष सक्रियता के साथ-साथ स्थानीय और राष्ट्रिए स्तर के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सवालों पर विशेष रुचि और समय-समय पर लेखन का काम करते हैं।

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