सर्पदंश से सबसे ज्यादा मृत्यु ग्रामीण क्षेत्रों में होती है

अनुज बेसरा:

मानसून के मौसम के आते ही चारों ओर हरियाली और ताजगी के साथ खेतों में हल चलाते किसानों की तोतो-नोनो की आवाज वातावरण में गूंजने लगी है। वहीं, देश-दुनिया सहित भारत में भी प्रकृति का विकराल रूप बाढ़, भूस्खलन, बादल फटना, वज्रपात, सुनामी जैसी मन को कुंठित और दुखी कर देने वाली घटनाओं की खबरें भी आने लगी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रकृति से जुड़ी हुई ही और एक घटना “सर्पदंश” भी कौतुहल का विषय बना हुआ है। विभिन्न माध्यमों से प्रत्येक दिन सर्पदंश की घटना और इससे सम्बंधित अफवाहें आम हो गई हैं।

सामान्यतः सर्पदंश की अधिकांश घटनाएं बरसात के समय ही घटित होती हैं और इनमें से भी सबसे ज़्यादा का शिकार, ग्रामीण क्षेत्र के लोग ही होते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भारत में पिछले 20 वर्षों में अर्थात सन 2000 से 2019 की अवधि के बीच सर्पदंश से मरने वालों की संख्या 12 लाख से अधिक दर्ज की गई है, यानि औसतन 58 हज़ार लोगों की मृत्यु प्रत्येक वर्ष सर्पदंश से भारत में हो जाती है। 

इस रिपोर्ट के अनुसार सर्पदंश के कारण लगभग 70 प्रतिशत मौतें 8 राज्यों के ग्रामीण इलाकों में दर्ज की गई हैं, जिनमें बिहार, झारखण्ड, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, आंध्रप्रदेश, राजस्थान तथा गुजरात के ग्रामीण क्षेत्र शामिल हैं। सर्पदंश के कारण आधे से अधिक मौतें जून और सितम्बर माह में मानसून की अवधि के दौरान होती हैं। रिपोर्ट के अनुसार सर्पदंश से सर्वाधिक मौतें ग्रामीण क्षेत्रों में हुई हैं जो करीब 97 प्रतिशत के करीब है। पुरुषों की मृत्यु का प्रतिशत 59% है जो महिलाओं की तुलना में 41 अधिक है, ऐसा इसलिए क्योंकि ग्रामीण पुरुष अधिकतर खाली बदन या कहें कि कम कपड़ों में रहते हैं, जिससे साँप के काटने की संभावना बढ़ जाती है। साथ ही ग्रामीण पुरुष, महिलाओं की तुलना में कम सचेत रहते हैं। अधिक श्रम के कारण थका होने के कारण कई बार तो सांप के काटे जाने पर पता भी नहीं चलता है। 

सर्पदंश से मरने वालों की सर्वाधिक संख्या 15 से 29 वर्ष के बीच के लोगों की है जो कुल मौतों का 25 प्रतिशत है। ये इसलिए भी क्योंकि इस उम्र के लोग सांप के काटने पर सीरियसनेस नहीं दिखाते। पूरे विश्व में सांप के 3458 प्रजातियां पाई जाती है जिसमें भारत में पाई जाने वाले 270 प्रजातियां भी शमिल हैं। विश्व में सबसे बड़ा सांप एनाकोंडा को माना जाता है, वहीं सबसे ज़्यादा ज़हरीला समुद्री सांप को माना जाता है जो सामान्यतः साऊथ ईस्ट एशिया और नॉर्थ आस्ट्रेलिया में पाया जाता है। इनके ज़हर की 1 मिलीग्राम बून्द से 1000 लोगों की मौत की सम्भावना बताई जाती है। 

भारत में पाए जाने वाले साँपों की 270 प्रजाति में लगभग 50 प्रजातियों के ही साँप ज़हरीले होते हैं। इनमें से भी लगभग 15 प्रजातियाँ ही ऐसी हैं जो अधिक ज़हरीली होती हैं और जिनके काटने से मौत होने की सम्भावना बढ़ जाती है। इसका फायदा, ओझा-गुणी (और झाड़-फूँक करने) वाले लोग भरपूर उठाते हैं। भारत में पाए जाने वाले साँपों में से सबसे ज्यादा ज़हरीला सांप, इंडियन करैत को माना जाता है जिसके एक बार के काटने से 60 लोगों की मृत्यु हो सकती है। वहीं दूसरे नंबर पर इंडियन कोबरा को माना जाता है, इसके काटने से हर साल भारत में 10000 से अधिक लोगों की मृत्यु हो जाती है। रसेल वाईपर जिसे कोरिवाला भी कहा जाता है और सौ-स्केल्ड वाइपर, जहरीले साँपों की श्रेणी में क्रमशः तीसरे और चौथे नंबर पर आते हैं। पांचवे नंबर पर द किंग कोबरा आता है जिसे विश्व का सबसे लम्बा जहरीला सांप माना जाता है, इसे छेड़ने पर यह ज़्यादा आक्रामक हो जाता है अन्यथा यह शांत स्वभाव का सांप माना जाता है। छठवें नंबर पर इंडियन पिट वाइपर पर आता है, जिसे स्थानीय भाषा में डाइर डेगा भी कहा जाता है। ये सामान्यतः बांस के पेड़-झाड़ियों में पाए जाते हैं।

वैसे तो भारतीय समाज में साँपों के प्रति प्राचीन काल से ही विशेष लगाव रहा है। अभी भी इंडियन कोबरा को भारतीय समाज में पूजनीय माना जाता है। नाग-नागिन से सम्बंधित कई फिल्मों को सिनेमाघरों में सम्मान पूर्वक देखा और दिखाया जाता है। सांप पालने वालों का एक अलग समुदाय भी है, जिन्हे सपेरा कहा जाता है इनका पेशा ही साँपों का करतब दिखाकर जीविकोपार्जन करना है। भारतीय आदिवासी समुदायों में विभिन्न मान्यताओं के अनुसार सांप पूजनीय और संरक्षणीय होते हैं। जैसे गोंड आदिवासी समुदाय में नाग और धमना सांप को मारना वर्जित है और उन्हें वे संरक्षण प्रदान करते हैं। वैसे ही अन्य आदिवासी समुदाय में भी सरीसृपों का विशेष संरक्षण किया जाता है। कई समुदाय तो नाग को सम्मान देते हुए इसे अपने नाम का टाइटल ही बना रखे हैं। विश्व स्तर पर 26 जुलाई को विश्व सांप दिवस के रूप में मनाया जाता है जिसका उद्देश्य सरीसृपों का संरक्षण और उसके खिलाफ हुए दुष्प्रचार को कम करते हुए जैव विविधता को बनाए रखना है।

जैसे कि ऊपर कहा गया है कि सर्पदंश से सबसे ज्यादा मृत्यु ग्रामीण क्षेत्रों में होती है, इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:-

(1) अशिक्षा और अंधविश्वाश:- ग्रामीण क्षेत्रों में सांप के काटे जाने पर लोग स्थानीय वैध – विद्या से झाड़-फूँक कराने के भरोसे रहते हैं और इलाज के लिए उनके पास जाते हैं, समय रहते मरीज का सही इलाज नहीं हो पाता परिणामस्वरूप सबसे ज्यादा मृत्यु इसी कारण से हो जाती है। भारत में पाए जाने वाले 270 साँपों के प्रजाति में से केवल 15 प्रजाति ही ऐसी हैं, जिनके काटने पर मौत की सम्भावना रहती है, बाकि साँपों में उतना ज़हर नहीं होता जिससे मरीज की मौत हो सके। कई बार लोग अन्धविश्वास के कारण सांप को दूध पिलाने के वास्ते उसके नज़दीक चले जाते हैं, जिससे सांप के काटने की सम्भावना बढ़ जाती है।

 (2) अस्पताल की दूरी:- ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों-अस्पतालों का काफी दूर होना भी साँप के काटने पर मृत्यु का कारण बन जाता है। ग्रामीणों को अस्पताल ले जाना, ज़्यादा खर्चीला और समय खर्च करने वाला लगता है इसलिए वह नज़दीक ही इलाज कराना अच्छा समझते हैं।

(3) एंटी वेनम दवाई की कमी:- एंटी वेनम के निर्माण के लिए वन विभाग की अनुमति की आवश्यकता होती है, जो कि कई चरणों की लम्बी प्रक्रिया है। एंटी वेनम के निर्माण/प्रशिक्षण के लिए घोड़ों की आवश्यकता होती है, जिसके लिए एक बड़ी जगह की आवश्यकता होती है। निजी कंपनियों के लिए यह एक खर्चीली प्रक्रिया है, जिसके कारण वे इस पर निवेश करना पसंद नहीं करते। इससे अस्पतालों, स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी वेनम की कमी बनी रहती है।

(4) आधारभूत संरचना, सड़क, परिवहन का आभाव:- ख़राब सड़कें और खर्चीले परिवहन साधन की वजह से लोग मरीज को चाहकर भी अस्पताल में समय पर नहीं पहुंचा पाते हैं। बरसात के मौसम में अधिकतर गाँव, ख़राब सड़कों के कारण, शहरों से कट जाते हैं जिससे समय रहते मरीज को ईलाज मुहैया नहीं हो पाता।

(5) खुले में शौच के लिए जाना:- ग्रामीण क्षेत्रों में लोग खुले में शौच जाने को मजबूर हैं। रात के समय बाहर निकलने से साँप और अन्य जहरीले जानवरों के काटने का खतरा बना ही रहता है। इस वजह से भी ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश की घटनाएं ज़्यादा होती हैं। वैसे इसमें, स्वच्छ भारत अभियान 2014 की वजह से कुछ कमी भी आई है।

उपरोक्त कारणों में से एक कारण जागरूकता की कमी भी है, जिसके कारण लोग 21वीं सदी के भारत में भी झाड़-फूँक और जादू -टोना में विश्वास करते हैं। जागरूकता के लिए एक विशेष पहल की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में सर्पदंश से मृत्यु की घटना को कम करने के लिए ग्राम प्रमुख, वार्ड मेम्बर, मुखिया, आंगनबाड़ी सेविकाओं, जल सहियाओं, शिक्षकों और नर्सों को विशेष प्रशिक्षण के साथ ज़िम्मेदारी दिए जाने से मृत्यु दर में कमी आ सकती है। सस्ते वाहन सुविधा की सुलभता भी घटना को काबू में ला सकती है। अंत में इतना ही कि सांप भी हमारे पारितंत्र/आहार श्रृंखला का अहम हिस्सा हैं। हमें स्वयं भी सावधानी बरतते हुए साँपों के प्रति फैले दुष्प्रचारों में नहीं आना चाहिए। सर्पदंश के मरीजों को तत्काल अस्पताल सविधा मुहैया कराना चाहिए।

फोटो आभार: मैक्स पिक्सल

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  • अनुज, झारखण्ड के सिमडेगा ज़िले से हैं। उन्होंने रांची के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में अनुज दिल्ली में रहकर आगे की पढ़ाई के लिए तैयारी कर रहे हैं।

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