ନୁଆଖାଇ ପର୍ବ | नुआखाई पर्व

डोलामणी:

ପଶ୍ଚିମ ଓଡ଼ିଶାର ପ୍ରସିଦ୍ଧ କୁର୍ଷି ଭିତ୍ତିକ ଗଣପର୍ବ ନୁଆଖାଇ। ଭାଦ୍ରବ ମାସ ଶୁକ୍ଲ ପକ୍ଷ ପଂଚମୀ ତିଥି ଦିନ ପାଲନ କରାଯାଏ। ଏହା ଶରତ ଋତୁ ଆଗମନର କାଲ। କ୍ରୁଷକ ଦ୍ବାରା ଅମଳ ହୋଇଥିବା ପ୍ରଥମ ଫସଲ ଧାନକୁ ନିଜର ଆରାଧ୍ୟା ଦେବାଦେବୀ, ପିଦର,ପେନ୍ ପୁରୁସା କୁ ଭୋଗଲଗାଇବା ହିଁ ନବାନ୍ନ ବା ନୁଆଖାଇ। ଗ୍ରାମ ର ଦେବାଦେବୀ କୁ ପୁଜାର୍ଚନା କରିବା ପରେ ଘରର ଦେବାଦେବୀ ପେନପୁରୁସା, ପିଦର କୁ ପୂଜା କରାଯାଏ। ନୁଆଁ ଧାନର ଚୁଡା, ଗୁଡ, କ୍ଷିର,ବେଲପତ୍ର, ଫୁଲ ଅର୍ପଣ କରାଯାଏ। ଭାଦ୍ରବ ମାସ ଶୁକ୍ଲ ପକ୍ଷ ରେ ଏହି ପର୍ବ ପାଳନ କରାଯିବାର କାରଣ କ୍ରୁଷକ ଚାଷ କରିଥିବା ଧାନ ଫସଲ ଏହି ସମୟେରେ ପାଚିବା ଆରମ୍ଭ କରିଥାଏ। ପୁରାତନ କାଳରେ ଏହି ପର୍ବପାଳନ କରିବା ପାଇଁ ବିଶିଷ୍ଟ ଦିନ ଧାର୍ଯ୍ୟ କରାଯାଉନଥିଲା। କିନ୍ତୁ ବର୍ତ୍ତମାନ ଏହି ପର୍ବ ପାଳନ କରିବା ପାଇଁ ପୁରୋହିତମାନେ ଦିନ ଧାର୍ଯ୍ୟ କରୁଛନ୍ତି। ଘରର ଦେବାଦେବୀ କୁ ଭୋଗଲଗାଇବା ପରେ ଘରର ବୟସ୍କ ଲୋକ ଚୁଡା କୁଣା  ସମସ୍ତ କୁଂ ଦେଇଥାନ୍ତି। ଚୁଡା କୁଣା ଖାଇ ସାରିବା ପରେ ବଡ ମାନକୁଂ ଜୁହାର (ନମସ୍କାର) କରାଯାଏ। ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆଶୀର୍ବାଦ ପ୍ରାପ୍ତ କରାଯାଏ। ଏହାପରେ ବନ୍ଧୁ, ସଂପର୍କିୟ ମାନକଂ ସହିତ ନୁଆଖାଇ ଜୁହାର ଭେଟ ହୋଇଥାଏ। ଘରର ସମସ୍ତ ଲୋକ ନୁତନ ପୋଷାକ ପରିଧାନ କରି ଥାନ୍ତି। ପନ୍ଦର ଦିନ ଆଗରୁ ଘରକୁ ଲିପାପୋଛା, ଧୁଆଧୋଇ କରାଯାଏ। ଏହି ଗଣପର୍ବ ସାମାଜିକ ଏକତାର ପ୍ରତିକ ଅଟେ। ପରିବାର ଭିତରେ ଯେତେ ବିବାଦ ଥିଲେ ସୁଦ୍ଧା ଭେଦଭାବ ଭୁଲି ଏକତ୍ର ଏହି ପର୍ବ ପାଳନ କରି ଥାନ୍ତି। ସଂନ୍ଧ୍ଯା ସମୟେରେ ନୁଆଖାଇ ଭେଟ ଘାଟ ହୋଇଥାଏ। ଡାଲଖାଇ, ରସରକେଲି, ମାଇଲାଜାଡୋ ପାରମ୍ପରିକ ଗୀତ ର ତାଲେ ତାଲେ ଝୁମିଥାନ୍ତି। ଏହି ପର୍ବ ର ଉଦ୍ଦେଶ୍ଯ ମିଲି ମିଶି ରହିବା ସତଭାବନା ଆଗାମୀ ପିଢି ଦେଖି ସିଖିବେ। ଦେଶର ଅର୍ଥନିତି ରେ କ୍ରୁଷି ର ପ୍ରାସଗିଂକତା। ଦେଶ ନିର୍ମାଣ ରେ କ୍ରୁଷକ ର ସହଭାଗୀତା ବିଷୟ ରେ ମହତ ବାର୍ତ୍ତା ଦେଇଥାଏ। କ୍ରୁଷକ ର ବିକାଶ ହିଁ ରାଷ୍ଟ୍ର ବିକାଶ ର ମୁଲ ଚାବିକାଠି ହେବା ଉଚିତ।।

हिंदी अनुवाद –

पश्चिम ओडिशा का प्रसिद्ध कृषि पर्व नुआखाई, भद्रपद (भादो) महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी के दिन मनाया जाता है। यह पर्व शरद ऋतु के आने को भी सूचित करता है। किसान द्वारा, उगाई पहली फसल के धान को उसके देवी-देवता और पूर्वजों को भोग लगाना ही नुआखाई का पर्व है। गाँव की देवी-देवता की पूजा के बाद परिवार के देवी-देवता और पूर्वजों की पूजा की जाती है। उन्हें नए धान का चूरा, गुड़, दूध, बेल का पत्ता और फूल अर्पित किए जाते हैं। 

भादो के महीने में जब धान पकना शुरू हो जाता है तब नुआखाई पर्व मनाया जाता है। सालों पहले इस पर्व को मनाने के लिए दिन तय नहीं था। लेकिन अब पुरोहित इसका दिन तय करते हैं। घर के देवी-देवता को भोग लगाने के बाद घर के बुज़ुर्ग सबको चुरा कुणा (नए धान का चूरा) देते हैं। चुरा कुणा खाने के बाद परिवार के बड़े-बुज़ुर्गों को जोहार किया जाता है और वो आशीर्वाद देते हैं। उसके बाद परिवार के अन्य लोगों, रिशतेदारों और प्रियजनों से नुआखाई जोहार भेंट होती है। इस दिन घर के सभी लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर्व से पंद्रह दिन पहले ही घर की लिपाई-सफाई की जाती है और रंग-रोगन किया जाता है। 

नुआखाई के दिन परिवार के लोग पिछले सारे विवादों और झगड़ों को भूलकर एक साथ इस पर्व को मानते हैं और नुआखाई भोज का आनंद लेते हैं। शाम को नुआखाई भेट घाट होता है और लोग, रासर केली, डाल खाई, मैला जाडो के पारंपरिक गीतों के सुर में झूमते हैं। इस पर्व का उद्देश्य है कि सब लोग मिलजुल कर रहें और आपसी सद्भाव बनाकर रखें ताकि उसे देख अगली पीढ़ी भी कुछ सीख सके। 

देश की अर्थव्यवस्था में खेती और किसान का योगदान और उसकी प्रासंगिकता, किसी भी अन्य क्षेत्र से कम नहीं है। किसानों के पर्व नुआखाई के अवसर पर हमें यह याद रखने की ज़रूरत है और देश के विकास को खेती और किसानों के विकास से जोड़कर देखने की ज़रूरत है।

Author

  • डोलामणी, ओडिशा के बलांगीर ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह ज़िन्दाबाद संगठन के साथ जुड़कर स्थानीय मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

Leave a Reply