युवतियों और युवकों की दुनिया – ‘युवानिया’

अमित:

कहा जा रहा है कि भारत विश्व के सबसे जवान देशों में से एक है। हमारी आबादी का एक तिहाई से अधिक हिस्सा, चौदह से चौबीस वर्ष की आयु के बीच है। इनमें से बहुत बड़ा तबका गाॅंव और शहरों की बस्तियों में रहता है और आज एक विशेष और विकट परिस्थिती में है। पढ़ाई, काम की तलाश में शहरों से सम्पर्क और मोबाइल के माध्यम से उनका परिचय, पैसे वाली शान शौकत की दुनिया से हो रहा है। यह दुनिया आकर्षित करती है। इस दुनिया की बातें और रीति-रिवाज़ अपने गाँव और समाज की परम्पराओं से अलग हैं। लड़कियों के लिये यह दुविधा और अधिक होती है क्योंकि संस्कृति और समाज की परम्पराओं को बचाने की साज़िश के चलते उन्ही पर सबसे अधिक अंकुश होते हैं और आदमी और लड़के उन पर नज़र रखने का काम करते हैं।

दूसरी परेशानी यह है कि पढ़ाई इस आशा से करते हैं कि नौकरी मिलेगी और कुछ आर्थिक स्थिरता आयेगी। लेकिन ऐसा अधिकाॅंश लोगों के लिये सम्भव नहीं हुआ। अब मजबूरीवश उन्ही कामों को करना पड़ रहा है जिनसे छुटकारा पाने के लिये पढ़ाई की थी। लम्बे समय तक कलम घिसने के कारण कड़े परिश्रम वाले कामों के लिये शरीर भी तैयार नहीं। साथ ही श्रम आधारित काम को हीन दृष्टि से देखने का एक नज़रिया भी बन गया, जिसके चलते ऐसे काम करने के लिये मन भी तैयार नहीं होता। इस कारण से भी युवाओं के मन में घोर निराशा है। 

युवकों और युवतियों को नया ज़माना पुकार रहा है लेकिन जड़ें, परम्पराओं में फंसी हैं। इस नये-पुराने, गाॅंव-शहर, दैविक सोच या वैज्ञानिक सोच, नौकरी और पैसे वाली दुनिया का सपना और मजबूरीवश श्रम आधारित कम पैसों वाली ज़िदगी की असलियत – इन विपरीत खिंचावों के बीच, ये युवतियाॅं और युवक क्या सोच रहे हैं, कहाॅं जा रहे हैं? हमारा भविष्य क्या होगा? हम अपना भविष्य खुद बनायेंगे या जैसा पानी बह रहा है उसके बहाव में हमें भी बहना पड़ेगा?

इन्ही आवाज़ों को बुलन्द करने के लिये युवानिया पत्रिका को शुरू करने का सोचा गया। युवतियों और युवकों की दुनिया उर्फ़ युवानिया।

युवानिया की संकल्पना यह है कि इसे देश के अलग-अलग राज्यों में रहने वाली युवतियाॅं व युवक मिलकर इसे वाॅलन्टियर के रूप में चलायें। यह किसी एक संगठन का मुख पत्र न होकर युवाओं की आवाज़ हो। उन युवतियों और युवकों की आवाज़ जो दूर दरास्त गाॅंवों में, पहाड़ों-जंगलों में, शहर की बस्तियों में रहते हैं। जिनका जीवन आसान नहीं है। जो गाॅंव से दूर शहरों में धूप में बिल्डिंगों में सरिया बाॅंधते हुए, गाॅंव का सुंदर वातावरण छोड़ कर शहरों के नालों पर रहकर, फ़ैक्टरियों औार घरों में काम करते हुए, मानसिक और शारीरिक शोषण सहते हुए भी किसी तरह अपने सपनों को दिलों में संजोये रखते हैं। वो आवाज़ें जो अब तक अपनी बस्तियों या गाॅंव के बाहर, किसी शहरी पत्रकार, फ़िल्मकार के माध्यम से ही निकलकर दुनिया के सामने आती हैं। युवानिया एक प्रयास है इन आवाज़ों को इनकी ज़ुबानी ही सुनने का। उनके विचार, उनकी भाषा। ये दुनिया को कैसे देख रहे हैं, अपने भविष्य के बारे में क्या सोच रहे हैं। यह सब ही युवानिया की विषय वस्तु है। साथ ही पत्रिका का यह भी प्रयास है कि दुनिया में हुए सार्थक प्रयासों को साझा किया जाये, जो युवतियों और युवकों को जीवन में आगे बढ़ने के लिये प्रेरित कर सकें और हमारे संविधान की मूल भावना के अनुरूप एक ऐसे समाज को बनाने में मदद करे जो अवसरों की समानता, जातीय-लैंगित-आर्थिक समानता, बंधुत्व, न्याय, धर्मनिर्पेक्षता, मानवीय हक व सभी की इज्ज़त पर आधारित हो। इसके लिये कुछ अनुभवी विचारकों के लेख भी छापे जायेंगे। कोशिश की जायेगी की इसमें महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, राजनैतिक और आर्थिक घटनाओं पर लेख प्रकाशित किये जायें जो गरीबों की नज़र से इन्हे देखने में हमारी मदद करेंगे।

कहा जा रहा है कि व्हाॅट्सैप आदि डिजिटल दुनिया में कौन पत्रिका पढ़ेगा? आज के युग में जहाँ एक मिनट से अधिक विडियो देखना भी पसंद नहीं करते, बच्चे, वहाॅं हम पत्रिका निकालने के पीछे पड़े हैं..!!! क्या यह सही है? क्या हमारा प्रयास समय के हिसाब से बेकार है? यह सही है कि यह वास्तविकता है। किसी को भी पढ़ने की आदत नहीं है। आम लोगों में तो नहीं ही है, कार्यकर्ताओं में भी नहीं है। जहाॅं से युवक और युवतियाॅं आते हैं वहाॅं स्कूलों की हालत बहुत ही रद्दी है। स्कूल, परीक्षा आदि सब ताम-झाम होते हुए भी शिक्षा लगभग शून्य है। जिन लोगों ने पूरे स्कूल काॅलेज काल मे केवल गाइड से पढ़ाई की हो, किताब देखी ही न हो, कहानी – कविता की एक भी किताब न देखी हो उनमें पढ़ने की आदत ढूॅंढना तो सही नहीं है। 

यह जानते हुए भी हमने क्यों तय किया कि पत्रिका निकालनी है? प्रमुख सोच यह थी कि लेखन के माध्यम से युवाओं की दुनिया में चल रहे सामाजिक-राजनैतिक-आर्थिक विषयों पर उन्हें सोचने के लिये मजबूर करना व उनके विचारों को व्यवस्थित रूप से जमाने का अभ्यास करवाना। यह युवानिया का प्रमुख कार्य था – गरीब वर्ग के युवाओं में लेखन में रुचि पैदा करना व इसकी क्षमता का विकास करना। लिखने के साथ पढ़ने की आदत को भी प्रोत्साहन देना। गरीब वर्ग के संघर्ष में जुड़े सभी साथी इस बात को समझेंगे कि पढ़ना और लिखना कार्यकर्ताओं के लिये कितना ज़रूरी है।

दूसरी बात यह है कि हालाँकि कहा जा रहा है कि आजकल लोग नहीं पढ़ते लेकिन क्या जो लोग सत्ता में बैठकर हमारे जीवन के निर्णय ले रहे हैं वे भी नहीं पढ़ते? कानून बनाने वाले नहीं पढ़ते? बड़ी बड़ी कम्पनियाॅं चलाने वाले लोग नहीं पढ़ते? ये सब क्या व्हाॅट्सैप पढ़कर सरकार चला रहे हैं? सत्ता चलाने वाले लोग सब पढ़ते हैं। बहुत पढ़ते हैं। देश-विदेश में क्या चल रहा है, बहुत कुछ पढ़ते हैं। बारीकी से जाॅंच करते हैं कि कहाॅं क्या चल रहा है। लगातार सोचते हैं – क्या करना, क्या नहीं करना। दिन-रात ये लोग दिमाग चलाते हैं तब जाकर कुछ मुठ्ठी भर लोग एक बड़ी आबादी को इनके बनाये रास्तों पर चलाते हैं, इनकी तरह सब को सोचने के लिये मजबूर करते हैं। आपके हमारे दिमागों में सही-गलत के मापदण्ड फ़िट करते हैं। इनकी नित नई शतरंज की चालों से भिड़ने के लिये गरीब वर्ग के युवक-युवतियों को इनसे ज़्यादा तेज़ी दिखानी होगी, इनसे ज़्यादा दिमाग चलाना होगा। तो हमें यह नहीं सुनना कि पढ़ने की आदत नहीं है। नहीं है तो बनायेंगे। अब तक नहीं लिखा तो लिखेंगे। नहीं सोचा तो सोंचेंगे। दुनिया में क्या चल रहा है उसे जानेंगे। अपनी ज़िंदगी को अपने हाथ में लेने के लिये जो भी बौद्विक श्रम करना पड़ेगा करेंगे। इसी की तैयारी का छोटा सा कदम है युवानिया। 

युवानिया पत्रिका का जन्म तो 2012 में पश्चिम मध्य प्रदेश के एक छोटे से गाॅंव साकड़ में आधारिशला शिक्षण केन्द्र के प्रांगण में हुआ था और तब एक साल तक इसे जयश्री, प्रियंका और अमित ने लेखन शिविरों के माध्यम से बड़ा किया था। इस एक साल में पाॅंच अंक निकाले गये थे जो क्षेत्र की आदिवासी समस्याओं पर केन्द्रित थे और आदिवासी युवाओं व कार्यकर्ताओं द्वारा लिखे गये थे। लेकिन सामाजिक परिवर्तनशाला के शिविरों के माध्यम से इसकेे पुनर्जन्म के बाद अगस्त 2020 से लगातार, महीने में दो बार निकाला गया। यह निरंतरता बनाये रखना हम सब के लिये एक बड़ी सफ़लता है। इसके लिये युवानिया टीम की पीठ थपथपानी चाहिये, विशेषकर दिल्ली से तेजस्विता और सिद्वार्थ और इनके साथ सम्पादक मण्डल के सदस्य – मध्य प्रदेश से सुरेश, राजस्थान से प्रेरणा, झारखण्ड से आमिर, बिहार से अखिलेश और ओडिशा से अन्नपूर्णा और एमलाॅन।

ज़ाहिर है कि यह काम इतनी विविध भाषाओं, संस्कृतियों और परिस्थितियों वाले देश में केवल एक पत्रिका नहीं कर सकती, इसलिये हमारी यह दृष्टि भी है कि अन्य भाषओं में, क्षेत्रीय स्तर पर भी ऐसी सैंकड़ों पत्रिकाएँ निकाली जायें। और यह कोई नई बात नहीं है। देश में हजारों की संख्या में, दसियों भाषाओं में छोटी छोटी पत्रिकाएं निकाली जाती रही हैं। बदलाव के काम से इन गली नुक्कड़ पर बात चलाने वाली पत्रिकाओं का अटूट संबंध है। गरीब वर्ग की बातों को सामने लाने के बहुत से अच्छे प्रयास आज भी बहुत जगह चल रहे हैं। माध्यम नए हैं। हम आशा करते हैं कि उनके साथ मिल कर युवानिया भी देश में वैकल्पिक मीडिया की आवाज़ को बुलन्द करेगी और देश के गाॅंवों, बस्तियों में रहने वाले युवतियों और युवकों के जीवन संघर्षों को न केवल दुनिया के सामने लाएगी, साथ ही उनके बीच आपसी वैचारिक सम्वाद स्थापित करने में भी मदद करेगी।

देश के लाखों छोटे-छोटे गाॅंवों में रहते हुए, शहरों की झोंपड़ पट्टियों में रहते हुए, धूप में खेतों में काम करते हुए, शहरों में कमर तोड़ मेहनत करते हुए, शहरों में झाडू़ लगाते हुए, फ़ैक्टरियों में काम करते हुए क्या सोचते हैं ये? क्या गीत या कविता फूटती है इनके पसीनों से? क्या इनकी खुशियाॅं हैं, क्या इनका गुस्सा है? – यह सब और बहुत कुछ लिखना है सबको, और युवानिया पत्रिका के माध्यम से एक-दूसरे की आवाज़ को सुनना है।

अंततः यह कि हम इसे जन भागीदारी से निकालना चाहते हैं। काम को मिलजुल कर करने कि दृष्टि से और वित्तीय दृष्टि से भी। आशा है आप यथा संभव हाथ लगाएंगे।

Author

  • अमित, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले में एक वैकल्पिक शिक्षा के प्रयोग पर शुरू हुआ स्थानीय स्कूल - आधारशिला शिक्षण केन्द्र चलाते हैं।

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