विदर्भ के गोसेखुर्द बाँध विस्थापितों के पुनर्वास और जातिभेद पर जीत की कहानी

विलास भोंगाड़े:

साल 1983 में दांडेकर कमिटी ने महाराष्ट्र राज्य के विदर्भ इलाके के पिछड़ेपन के कारणों पर एक रिपोर्ट पेश की थी, उसे विदर्भ के विश्लेषण की रिपोर्ट भी कहते हैं। विदर्भ में शिक्षा व्यवस्था ठीक नहीं है; आरोग्य व्यवस्था ठीक नहीं है; खेती का उत्पादन बराबर नहीं होता है; सिंचाई के साधन कम हैं। कोरडवाह (असिंचित) खेती बड़ी मात्रा में है। सिंचाई की व्यवस्था बहुत ख़राब है, जिसे ठीक किए जाने की ज़रूरत है। यहाँ जंगल-ज़मीन-पानी व खनिज बड़ी मात्रा में हैं लेकिन उनका विकास सही तरीके से नहीं हुआ है। इनके सही इस्तेमाल के लिए प्रयास किए जाने की ज़रूरत है। सिंचाई की अच्छी व्यवस्था के लिए बाँध बनाने की ज़रूरत है, कुएं और बोरिंग के लिए मोटर और पंप लगाने की ज़रूरत है। यह करने के बाद ही, खेती सिंचित होगी और सुजलाम-सुफलाम होगी। इसलिए ही पाउनी (ज़िला भंडारा) में वैनगंगा नदी पर गोसेखुर्द गांव के पास बाँध बनाया गया था, जिसे इंदिरा सागर का नाम दिया गया। इसे गोसेखुर्द बाँध के नाम से भी जाना जाता है। 

गोसेखुर्द बाँध का भूमिपूजन 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने किया था, तब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हाण थे। 33 दरवाजों वाले इस 11 किलोमीटर लम्बे बाँध की वजह से 200 गाँव विस्थापित हुए। इनमें से 93 गाँव पूरी तरह से ज़मीन-घर के साथ विस्थापित किए गए और 22258 हेक्टेयर ज़मीन डूब क्षेत्र में चली गई। साथ ही बड़ी मात्रा में जंगल भी डूब क्षेत्र में आए। गोसेखुर्द बाँध, करहंडला व्याग्र प्रकल्प (अभ्यारण) से लगा हुआ है। बाँध प्रभावित लोगों के उचित पुनर्वास के लिए गोसेखुर्द प्रकल्पग्रस्त संघर्ष समिति ने एक लंबा संघर्ष किया, जिसकी वजह से बाँध विस्थापितों को भू-अर्जन अधिनियम-1894 के मुताबिक मुआवज़ा मिला, साथ ही 2009 में 192 करोड़ और 2013 में 1899.60 करोड़ का पुनर्वास पैकेज भी प्राप्त हुआ। 

महत्वपूर्ण बात यह है कि गोसेखुर्द बाँध विस्थापित परिवारों को ज़मीन खरीदने और रोज़गार के लिए 3 लाख रूपए, व्यवसाय प्रशिक्षण के लिए प्रति परिवार 10 हज़ार रुपए का अनुदान मिला है और घर बनाने के लिए भी अनुदान राशी मिली है। बाँध विस्थापित परिवारों को 185 चौरस मीटर से 740 चौरस मीटर का भू-खंड पुनर्वास के लिए मिला है। लेकिन इस सबके लिए यहाँ के लोगों ने 1991 से लेकर 2016 तक लम्बा संघर्ष किया। इस संघर्ष के दौरान उन्हें अपनी समस्याओं से जुड़े तमाम सवालों और ज़मीन का महत्व भी समझ आया। इतनी सारी मुसीबतें थी कि उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। गरीब से लेकर अमीर तक, सब इसकी चपेट में आए। गरीब का दर्द अलग होता है और अमीर का दर्द अलग, लेकिन जाति का भी एक दर्द है और यह दर्द बहुत अलग है।

विस्थापित होने वाले 200 गाँव में अमीर, गरीब, किसान, भूमिहीन और ज़मींदार; सभी लोग थे। उनकी बोली, रीति-रिवाज और रहन-सहन में भी फ़र्क था। गाँव में जाति आधारित मोहल्ले और घर थे। कुणबी, तेली, बौध, मातंग, चर्मकार और ढिवर (मछवारा) समुदाय के लोग गाँव में रहते थे। उनकी रिहाइश के अनुसार ही गाँव में ढिवर मोहल्ला, कुणबी मोहल्ला, तेलीपुरा और दलित बस्तियों जैसे मोहल्ले और बस्तियां बनी हुई थी। विस्थापित होने के बाद नए गाँव के लिए जब ज़मीन का वितरण होना था तो गाँव के कुणबी समुदाय के लोगों ने ज़िला अधिकारी को पत्र लिखकर, पुराने गाँव के अनुसार ही ज़मीन का वितरण करने का आग्रह किया। भीवापुर ताल्लुका के गाँव के लोगों ने भी ऐसा ही निवेदन किया था, कुछ अन्य गाँव के लोग भी बोल रहे थे कि हम दलितों के घर के पास, अपने घर नहीं बना सकते। 

ज़िलाधिकारी के साथ हमने एक बैठक की और इसका विरोध किया। हमने कहा कि नए गाँव में ऐसे मोहल्ले नहीं होने चाहिए, यह संविधान के विरुद्ध होगा। यदि ऐसा होता है तो प्रशासन जाति भेद को बढ़ाने का ही काम करेगा, जिसका उसे विरोध करना चाहिए। गरीब हो, अमीर हो, दलित हो, तेली हो या कुणबी हो; सभी को नए गाँव में बिना किसी भेदभाव के ज़मीन मिलनी चाहिए। हमने प्रशासन से एक मज़बूत स्वर में यह मांग की, साथ ही इसे करने के तरीकों को लेकर भी अपने सुझाव दिए। हमने यह सुझाव दिया कि सभी भूखण्डों पर नंबर डालकर एक ड्रॉ (पर्ची) निकाला जाए। ज़िलाधिकारी ने हमारे सुझाव को मानते हुए, इसी अनुसार ज़मीन वितरित की। गरीब, पिछड़ी जातियों और दलित परिवारों के भूखंड के पास जिन अमीर और तथाकथित ऊँची जाति के लोगों को भूखंड मिले वह इससे नाखुश थे, लेकिन प्रशासन के निर्णय के आगे वह कुछ नहीं कर पाए।  

नए गाँव में जब अलग-अलग समुदायों के परिवारों के घर आस-पास बने तो उन्हें एक-दूसरे की जीवनशैली को देखने का अवसर मिला। दलित परिवारों को, कुणबी और तेली परिवारों के पूजा-अर्चना के तरीके समझ में आए, उनके देव-धर्म और आस्था की तस्वीरें देखने को मिली। यह अलग-अलग समुदाय, अब एक दूसरे के त्यौहार, शादी, जन्मदिन, मृत्यु आदि जैसे सामाजिक क्रियाकलापों में शामिल होने लगे। सभी एक-दूसरे के साथ बैठने लगे, बात करने लगे, खेलने लगे और एक-दूसरे को समझने लगे। अब एक दलित महिला और कुणबी महिला की बातचीत दिन-रात होने लगी, ढिवर समाज की महिला के साथ तेली-कुणबी समाज की महिला की भी दोस्ती होने लगी। इस तरह से आपसी मेल-जोल बढ़ने के कारण जाति की कटुता कम हो रही थी। यह विभिन्न समुदाय, एक-दूसरे से सांस्कृतिक-सामाजिक मेल-जोल के साथ-साथ, शाक-भाजी भी बांटने लगे थे। यह एक नए प्रकार का मिलन था, यह अलग-अलग अनुभवों का आदान-प्रदान था।

जब खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल, पूजा-अर्चना में सहभाग बढ़ने लगा तो विभिन्न समुदाय के लड़के-लड़कियाँ भी आपस में बातचीत करने लगे और साथ खेलने लगे। अब ये रमणीय स्थलों, बाज़ारों और स्कूल-कॉलेजों में साथ जाने लगे, इससे मन और तन दोनों मिलने लगे। कुणबी परिवार के लड़के और ढिवर परिवार की लड़की का मनोमिलन होने लगा, एक दलित लड़की एक तेली परिवार के लड़के के प्यार में डूब रही थी। अलग-अलग जातियों के युवाओं की शादियों का जो मौका हम लम्बे समय से खोज रहे थे, हमें इस माहौल में मिल रहा था। इससे ज़रूर कुछ लोगों के बीच मन-मुटाव हुए, कुछ झगड़े-फसाद हुए, बहुत से परिवारों ने इसका विरोध भी किया, लेकिन यह प्रक्रिया चलती रही। अलग-अलग समुदायों के युवाओं की शादियाँ हो रही थी और उनके साथ-साथ उनके परिवार भी मिल रहे थे। वे एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल हो रहे थे और एक-दूसरे का मान-सम्मान कर रहे थे। 

मैं इसे एक बहुत ही अलग अनुभव के रूप में देखता हूँ। नए गाँव और पुराने गाँव की यादों और अनुभवों को याद करता हूँ और समझता हूँ। यह अनुभव मुझे मेरे जीवन का एक परिवर्तनकारी अनुभव लगता है, नया समाज बनाने वाली इस अद्भुत प्रक्रिया को मैं सलाम करता हूँ। 

विस्थापन- घर, ज़मीन व रोज़गार के अवसर छीन लेता है, जीवन को संघर्षमय और दुखदायी बना देता है। जहाँ जन्म हुआ हो वहाँ की ज़मीन-जगह छोड़ना, बहुत दुःख पहुँचाने वाला अनुभव होता है। लेकिन यही विस्थापन एक नया जीवन भी प्रदान कर सकता है। इसके लिए विस्थापितों को जीने के साधन मिलने चाहिए, जल-जंगल-ज़मीन का संरक्षण होना चाहिए, साथ ही जाति-भेद भी ख़त्म होना चाहिए। जाति प्रथा को ख़त्म किए बिना नए समाज का निर्माण संभव नहीं है, हम सामाजिक कार्यकर्ताओं को इस भूमिका को स्वीकार करना चाहिए। 

विस्थापन के मुद्दे को लेकर भू-अर्जन और पुनर्वास पर ही मुख्य रूप से बात की जाती है, लेकिन धर्म और जाति जैसे सामाजिक मुद्दों पर भी सकारात्मक बात की जानी चाहिए। विस्थापित होने वाली महिलाओं का दर्द चर्चा में नहीं आ पाता है, उनकी समस्या को देखा नहीं जाता। यह मानव समाज के सही मूल्यों को अह्वेलना है। विस्थापन के समय पालतू जानवरों की बातें नहीं होती, जो एक खेतिहर परिवार की जीविका का मुख्य साधन है। उनके लिए भी मुआवज़ा मिलना चाहिए, तभी विस्थापितों का उचित पुनर्वास होगा। साथ ही हमें यह भी याद रखना है कि जाति का द्वन्द समाप्त करके ही न्यायपरक और अच्छा पुनर्वास हो सकता है। 

Author

  • श्रुति से जुड़े महाराष्ट्र के नागपुर ज़िले के संगठन कष्टकरी जन आन्दोलन को बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले विलास भाऊ, संगठन के साथ जुड़कर विस्थापन, पुनर्वास, दलित परिवारों और घरेलू कामगार महिलाओं के मुद्दों पर काम करते आए हैं। गाना गाने में रूचि रखने वाले विलास भाऊ अध्ययन और प्रशिक्षण जैसी वैचारिक गतिविधियों में भी विशेष सक्रियता के साथ काम करते हैं।

Leave a Reply