कोरोना महामारी के बाद झारखण्ड राज्य में पलायन की महामारी का सम्भावना: एक गंभीर समस्या

अनुज बेसरा:

आज़ादी के लगभग 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी अधिकांश भारतीय गाँवों की स्थिति वैसी ही है, जैसी आज़ादी मिलने के समय पर थी। इनके लिए आज भी आज़ादी का मिलना या न मिलना दोनों बराबर सा ही है। आज भी ये लोग शहरों, सरकारी बाबुओं, बड़ी इमारतों को देख बस इतना ही समझ पाए हैं कि शहरों में जाकर बस मज़दूरी और धांगर का काम ही करना है। झारखण्ड के सन्दर्भ में ये मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि जब भी किसी के द्वारा बड़े शहरों में जाने-बसने की बात की जाती है तो गाँव में लोगों का सवाल यही होता है – पैसा कमायक जाथिस? (पैसा कमाने जा रहे हो?) ये इसलिए कहा जाता है क्योंकि पीढ़ी दर पीढ़ी यह सिलसिला एक परंपरा की तरह गाँव में प्रवेश कर गया है। हर समस्या का समाधान परदेश जाने में ही छुप सा गया है। 

ऐसी ही घटना मेरे साथ भी हुई जब मेरी दिल्ली आने की बात हुई – दिल्ली पैसा कमायक जाथिस? का काम करबे? कहाँ कमायक जाथिस? इत्यादि सवालों के पिटारे मेरे लिए भी खोले गए, और खोलते भी क्यों नहीं, गाँव से वर्ष भर करीब 50 लोग पलायन जो किए रहते हैं बम्बई और दिल्ली शहर।

लोगों के ये सवाल दिल से दिमाग तक छप चुके थे। ट्रेन से दिल्ली आते वक्त ट्रेन की धक-धक की आवाज़ के साथ मेरे मन से भी सवाल के गुब्बारे फूट रहे थे। बात यहीं खत्म नहीं होती है क्यूंकि मुख्य सवाल तो अब शुरू होता है – क्या दिल्ली (सभी शहर) में बस, पैसा कमाया जा सकता है और कुछ नहीं? (नोट:- और कुछ नहीं से मेरा तात्पर्य शिक्षा, कौशल, तकनीकी ज्ञान, अनुभव इत्यादि से है) लोग गाँव को न सोचकर बस शहरों को ही पैसा अर्जित करने की जगह क्यों सोचते हैं? क्या शहरों की तरह ही गाँव में रोज़गार के अवसर उत्पन्न नहीं किए जा सकते? क्या गाँव को छोड़कर जाने से ही पैसा कमाया जा सकता है? क्या गाँव में भी शहरों की तरह धन अर्जित करने वाला अभिवृति नहीं लाई जा सकती? जब स्मार्ट सिटी बन सकती हैं तो स्मार्ट गाँव क्यों नहीं? बड़े उद्योगों के लिए सस्ता ऋण मिल सकता है तो गाँव में छोटे कुटीर उद्योगों के लिए सस्ता ऋण क्यों नहीं? अगला आपके दिल दिमाग को झकझोर देने वाला मुख्य सवाल यह कि क्या हमने इसी दिन के लिए अलग राज्य (झारखण्ड) की मांग कर रहे थे?

सवाल भले ही गहरे, चिंतनीय और गंभीर हो मगर समाधान और जवाब तो आपको और हमें मिलकर ही ढूंढना है। इतिहास गवाह है कि मानव सभ्यता आरंभ से ही कठिन रास्तों से सहज रास्ता, दुर्लभ जगहों से सुलभ जगह, कम सुविधा से उच्च सुविधा वाले परिवेश – वातावरण में आने का प्रयास करती आई है। हमेशा अपने पास आवश्यकता के अनुसार बदलाव करती आई है। पलायन भी कुछ उसी तरह है, लोग दुविधा से सुविधा की ओर गमन कर रहे होते हैं।

समस्या में जाने से पहले पलायन क्या है इसे समझते हैं –

पलायन:- पलायन एक स्थान से दूसरे स्थान तक लोगों की आवाजाही है। यह एक छोटी या लंबी दूरी के लिए अल्पकालिक या स्थायी, स्वैच्छिक या मजबूरी वश, अंतर्देशीय या अंतर्राष्ट्रीय हो सकता है। झारखण्ड से सामान्यतः अंतर्देशीय पलायन अल्पकाल के लिए किया जाता है। भोजन की कमी, कम वेतन, जलवायु परिवर्तन, धार्मिक उत्पीड़न, बेरोज़गारी आदि के कारण पलायन होते हैं। झारखण्ड से पलायन के मुख्य कारण अभी तक में मुख्य रूप से बेरोज़गारी, अशिक्षा, कम वेतन, विस्थापन आदि हैं। शैक्षणिक स्तरों की कमी के कारण लोग दूरदर्शी और चिंतनशील नहीं हो पाते हैं। परिणामस्वरूप परदेश जाने को ही आय प्राप्ति का माध्यम समझ बैठते हैं। गढ़वा, सिमडेगा, गुमला आदि जिलों में प्रायः लोगों में कृषि के बाद रोज़गार का आभाव होता है। शहरों की चमक-दमक भी लोगों को अपनी और आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ती है।

आज पलायन को लेकर झारखण्ड की स्थिति किसी से छुपी नहीं रह गई है। जिस तरह लोग खेलों में रिकॉर्ड बनाते हैं, हम झारखण्डी भी पलायन में रिकॉर्ड बनाने के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार के साथ पूर्ण प्रतियोगिता में हैं। अब देखना यह रह गया है कि झारखण्ड के इस अबुआ राज में भी पलायन के धब्बा वाली यह ट्रॉफी किसके हाथ लगती है। राज्य कल्याणकारी और सर्वहितैशी होता है, इन सब समस्याओं का समाधान उनका ध्येय होता है। परंतु देश की संपत्ति की हिस्सेदारी में 51 फ़ीसदी हिस्से पर महज 1 फ़ीसदी लोगों का कब्ज़ा और बाकी बचे 49 फीसदी सम्पत्ति पर 99 फीसदी जनसंख्या का दबाव जैसी रिपोर्ट से समझ सकते हैं कि समस्या कहां से उत्पन्न हो रही है (स्रोत:- बैंक क्रेडिट सुईस की 2018 की रिपोर्ट)। खैर हमें अभी इसमें नहीं जाना है।

झारखण्ड में पलायन करना एक परम्परा बनती जा रही है। लोगों के दिमाग में हर समस्या का एक ही समाधान है – परदेश जायक हय! वर्तमान में गढ़वा, सिमडेगा, गुमला जैसे ज़िलों में तो पलायन एक गंभीर और होश उड़ा देने वाली स्थिति पर है। यहाँ प्रत्येक गाँव से औसतन 20 से 30 लोग वर्षभर पलायन किए हुए रहते हैं। वर्तमान में पूरा देश कोविड -19 महामारी से लड़ और जूझ रहा है। 2020 में कोविड के मद्देनजर केंद्र सरकार द्वारा सम्पूर्ण देश में लागू लॉकडाउन के बाद 2021 में फिर से देश के विभिन्न राज्यों के साथ झारखण्ड में भी लॉकडाउन चल रहा है। ऐसे में देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ राज्य की आर्थिक व्यवस्था भी लगभग धराशाही सी हुई पड़ी है। वस्तुतः राज्य में पलायन की समस्या आने वाले समय में और भयावह होने की सम्भावना है, यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं है। इसके लिए अभी भी राज्य में दूरगामी कदम उठते नजर न आना एक दूसरा पहलू है। 

पलायन से समाज और संबंधित राज्य को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसलिए इसको समझना ज़रूरी है, क्योंकि यही आगे चलकर समाज और राज्य के विकास में अवरुद्ध उत्पन्न करती है-

  1. राज्य की श्रम शक्ति का ह्रास – पलायन के परिणामस्वरूप जिस श्रम शक्ति का प्रयोग राज्य के विकास कार्यों के लिए किया जा सकता था वह संभव नहीं हो पाता है। लोग अपना हुनर और कौशल पलायन किए हुए राज्यों के बढ़ोतरी के लिए उपयोग में लाते हैं। अंत में बुढ़ापा और बीमारी से ग्रस्त होकर वापस लौटते हैं, जो बाद में राज्य सरकार के लिए बोझ हो जाते हैं।
  2. राज्य की क्रय शक्ति में कमी – पलायन से संबंधित राज्य की क्रय शक्ति में कमी आती है। राज्य के नागरिक दूसरे राज्यों में जाकर वहां से अपनी ज़रूरत की सामग्री खरीदते हैं जिससे वस्तु व सेवा कर जो राजस्व का एक बहुत बड़ा माध्यम है, उस राज्य को प्राप्त होता है जहाँ लोग पलायन कर जा रहे हैं। यदि ये सभी लोग अपने राज्य में रह रहे होते तो वस्तु व सेवा कर अपने राज्य को प्राप्त होता। जिससे राज्य की आर्थिक स्थिति (राजस्व) में भी बढ़ोतरी होती।
  3. पारिवारिक-सामाजिक अस्थिरता उत्पन्न होना – पलायन हमेशा परिवार का प्रमुख और स्वस्थ व्यक्ति ही करता है। अतः उसके दूसरे जगह चले जाने से परिवार में अस्थिरता उत्पन्न हो जाती है, जो आगे चलकर भविष्य में पारिवारिक और सामाजिक समस्या उत्पन्न करती है। मानव तस्करी की गंभीर समस्या इसी से मिलती-जुलती है।
  4. पर्यटन में हानि – पलायन से राज्य की राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि खराब होती है। लोग राज्य को निर्धन समझते हैं, जिससे पर्यटन आदि के लिए आने वाले लोग उस राज्य में आना पसंद नहीं करते। परिणामस्वरूप पर्यटन से अर्जित हो सकने वाली आय नहीं मिल पाती है।

ये सभी समस्या जहाँ शुरू होती है, समाप्त भी वहीं की जा सकती हैं। अकसर गाँव के लोग ही रोज़गार के तलाश में पलायन करते हैं। यदि गाँव में रोज़गार के अवसर उपलब्ध करा दिए जाएँ तो संभवतः इसमें कमी आए। पलायन करने वाले लोगों में गाँवों में रोज़गार के अनंत अवसर के प्रति चेतना जगाने की आवश्यकता और निर्देशित किए जाने की ज़रूरत है। इसके लिए ग्राम सभा और स्थानीय समिति को विशेष महत्व और शक्तियां देने की आवश्यकता है ताकि वे अपने स्तर पर अपनी आवश्यकताओं के अनुसार रोज़गार के अवसर तलाश सकें। कृषि और वनोत्पाद से जुड़ी गतिविधियों के लिए भी उचित बाज़ार सुलभ कराने की आवश्यकता है। 

अक्सर गाँवों में बिचौलियों के कारण ग्रामीण कृषकों को हानि उठानी पड़ती है। गाँव में छोटे स्तर पर सरकार की अगुवाई में संगठित कृषि कराई जा सकती है। अंत में सबसे महत्वपूर्ण पूंजी की उपलब्धता सरल और सुलभ कराना होगा। झारखण्ड एक आदिवासी बहुल राज्य है विभिन्न कानूनी प्रशासनिक वित्तीय प्रक्रियाओं में अड़चनों के कारण आदिवासी उद्यमों को समय पर उचित ऋण सुविधा नहीं मिल पाती है। इससे परेशान होकर वे परदेश जाने को ही आसान पूंजी प्राप्ति का माध्यम समझने लगते हैं।

Author

  • अनुज, झारखण्ड के सिमडेगा ज़िले से हैं। उन्होंने रांची के डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। वर्तमान में अनुज दिल्ली में रहकर आगे की पढ़ाई के लिए तैयारी कर रहे हैं।

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