अखिलेश, मिथुन:

जन जागरण शक्ति संगठन के दो युवा साथियों ने कुनाल की बीमारी व उसके इलाज के चलते परिवार को क्या-क्या मुश्किलों का सामना करना पड़ा की ये सारी जानकारी कुनाल की माता यशोदा देवी और चाची चिंता देवी से बात कर निकाली है और एक लेख के रूप में इसको संकलित करने का प्रयास किया है।

कुनाल कुमार, एक गरीब परिवार से था। पढ़ाई के साथ-साथ पशुओं को चारा देने, आँगन की सफाई करना, बर्तन धोना, खाना पकाना आदि कामों में वह अपने मम्मी-पापा का हाथ भी बंटाता था। कुनाल का सपना था कि पढ़ाई करके आगे कोई अच्छा रोज़गार ढूँढे और अपने माता-पिता की सेवा करे। उसका मन खेल-कूद से ज़्यादा, दादा-दादी और मम्मी-पापा की सेवा में लगता था। कुनाल कुमार, बिहार के अररिया ज़िले की साहसमल पंचायत का रहने वाला था। वह आठवीं कक्षा में पढ़ता था और उसकी उम्र केवल 14 वर्ष थी। उसकी माता का नाम यशोदा देवी है और पिता का नाम कन्हैया कुमार पासवान है। कन्हैया जी दिहाड़ी मज़दूर हैं और यशोदा देवी घर का काम करती हैं। इनके परिवार में कुल 7 लोग थे, जिसमें से एक यशोदा देवी का बड़ा बेटा कुनाल था। 26 नवंबर 2020 को कुनाल की मृत्यु एक गंभीर बीमारी से हो गई।

पिछले साल अप्रैल महीने में, कुनाल को उसके बायें काख में मांस का एक गोला दिखाई दिया। उसने अपने परिवार वालों को बताया कि उसके कांख में मांस का गोला बन गया है और यह बढ़ता ही जा रहा है। इसे छूने या दबाने पर दर्द का एहसास नहीं होता है। उसके माँ-बाप ने गााँव के दवाई दुकानदारों को दिखाया। दुकानदार ने जांच कर, अपने हिसाब से दवाई दे दी। दो महीने तक कुनाल को दुकानदार द्वारा बताई गई दवाई खिलाई गई पर कोई सुधार नहीं हुआ, परिवार वालों ने कुनाल की झाड़-फूंक भी करवाई। इधर मांस का गोला बढ़ता जा रहा था। 

कोई सुधार नहीं होने के कारण परिवार वाले कुनाल की जांच करवाने और उसे दिखाने के लिए ज़िले के एक प्राइवेट डॉक्टर के पास लेकर गए लेकिन उन्होंने बिना कोई इलाज किए, कुनाल को पूर्णिया ज़िला में रेफर कर दिया। परिजनों ने कहा एक बार अपने ज़िला के परिचित डॉक्टर को दिखा देना चाहिए। इसके चलते जब एक डॉक्टर को दिखाया तो डॉक्टर ने कहा, कुनाल के इलाज के लिए उसका ऑपरेशन करना पड़ेगा। ऑपरेशन करवाने के बाद, कुनाल ठीक हो गया। कुछ ही दिनों के बाद (अगस्त 2020 में), कुनाल के शरीर के उसी हिस्से में फिर से मांस तेज़ी से बढ़ने लगा। इस बार डॉक्टर ने मांस के टुकड़े का जांच करवाने के लिए, उसका सैम्पल झारखंड भेजा। 

लेकिन इधर कोविड-19 के कारण, लॉकडाउन लगा दिया गया। इसके कारण रिपोर्ट आने में काफ़ी देरी हो रही थी। परिवार वाले डॉक्टर पर दबाव बना रहे थे, क्यूंकि बच्चे की स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। लॉकडाउन के कारण यातायात की सभी सुविधाएं भी बंद हो गई थी। पड़ोसी की मोटर साइकिल से मरीज़ को लेकर हॉस्पिटल आना-जाना करना पड़ता था। देरी होने के कारण, डॉक्टर ने कुनाल की रिपोर्ट ऑनलाइन मंगवाई। जांच रिपोर्ट से पता चला कि कुनाल को कैंसर की बीमारी है। डॉक्टर ने फिर उसे पटना के आई.जी.आई.एम.एस. अस्पताल में रेफर कर दिया। कुनाल के घर से पटना की दूरी लगभग 500 किलोमीटर की है।

कुनाल का परिवार दलित समुदाय से आता है और उसके पिता एक दिहाड़ी मज़दूर हैं। वह 200-250 रु/प्रति दिन पर मज़दूरी करते हैं। एक तो वैसे ही दिहाड़ी मज़दूर को प्रति दिन काम नहीं मिलता है ऊपर से लॉकडाउन के कारण तो काम बिल्कुल ही बंद हो गया। इनके पास आय का दूसरा कोई स्रोत नहीं है और कुनाल का इलाज भी करवाना था। लॉकडाउन में सब कुछ महंगा भी हो गया था। यातायात की सुविधा दोगुनी से भी ज़्यादा महंगी हो गई थी। फिर भी परिवार बच्चे को सितंबर 2020 में पटना लेकर गया, तो वहां पर सबसे पहले उसकी कोविड-19 की जांच करवाई गई। जांच में वह नेगेटिव पाया गया। पहले दिन जब डॉक्टर ने कुनाल को देखा और दवाइयां दीं तो कुनाल की बीमारी में बहुत सुधार नज़र आया। 

जब दूसरी बार वो पटना गए तो पहले वाले डॉक्टर नहीं थे, उनका तबादला हो गया था, इसलिए किसी और डॉक्टर ने मरीज़ को देखा और दवाइयााँ दी। इस बार कुनाल की स्थिति में कोई सुधार नज़र नहीं आया। यहाँ से कुनाल की हालत बिगड़ने लगी, वह खुद से चल भी नहीं पा रहा था। परिवार वालों ने उसे अस्पताल में भर्ती करवाने की बहुत कोशिश की, लेकिन कुनाल को भर्ती नहीं किया गया। डॉक्टर यही कह रहे थे कि वह ठीक हो जाएगा, भर्ती करने की आवश्यकता नहीं है। 

कन्हैया जी के घर की आर्थिक स्थिति पहले से ही बहुत कमज़ोर थी। घर का निजी संसाधन सब बिक चुका था, घर पर पाले हुए मवेशी भी बेच दिए गए थे। घर के दरवाजों पर तीन-चार छोटे-बड़े पेड़ लगाये हुए थे, उन्हें भी बेचना पड़ा था, फिर भी पैसे की पूर्ति नहीं हो पा रही थी। यह देखते हुए गााँव के लोगों से कुनाल के इलाज के लिए चंदा इकठ्ठा करना पड़ा। परिवार ने लोगों से कर्ज़ा भी लिया। कुनाल के इलाज के लिए, उसे सात-आठ बार पटना ले जाना पड़ा था।

परिजनों ने अनुदान के लिए आवेदन दिए। कुछ दिनों बाद अनुदान की राशि आने पर, उन्हें दो बार निशुल्क दवाइयां भी दी गई। लेकिन कभी-कभी डॉक्टर नहीं देखते थे, कम्पाउण्डर ही देख कर दवाइयां दे दिया करते थे। लगभग ढाई महीने पटना में कुनाल का इलाज चला, इस दौरान उन्हें 8 बार पटना जाना पड़ा। हर बार जब पटना जाते थे तो तीन से चार दिन पटना में ही रहना पड़ता था। 

परिवार के लोग जन जागरण शक्ति संगठन से जुड़े हुए हैं। संगठन का कार्यालय पटना में है, जिसके चलते परिवार जब भी पटना आते, तो कार्यालय में रहते थे। कुनाल की हालत काफी गंभीर थी। वह रात भर सो नहीं पाता था, जिसके कारण रात-रात भर माँ-बाप को भी जगना पड़ता था। डॉक्टर ने इलाज के तौर पर  कीमोथेरेपी के लिए कहा, कुनाल की 2 बार कीमोथेरेपी हुई, लेकिन जब तीसरी बार कीमो चढ़ाया जा रहा था तो उसी दौरान कुनाल की मौत हो गई। ऐसे समय में भी, अस्पताल से कुनाल के शव को गाँव वापस लाने के लिए कोई मुफ़्त एम्बुलेंस सेवा भी नहीं मिली। परिवार को पैसा देकर एम्बुलेंस को घर तक लाना पड़ा, जिसका कुल किराया 7500 रूपए उन्हें देना पड़ा। आज कुनाल तो नहीं रहा लेकिन उसके परिवार को उसके इलाज के लिए न केवल अपने संसाधन-संपत्ति बेचनी पड़ी बल्कि कर्ज़ा भी लेना पड़ा। 

फीचर्ड फोटो आभार: मुज़कॉर्नर

Authors

  • अखिलेश, बिहार के अररिया ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। गाने लिखना, गाना और सबको खेल खिलाने में माहिर। जन जागरण शक्ति संगठन के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

    View all posts
  • मिथुन / Mithun

    मिथुन बिहार के अररिया ज़िले से हैं। वह जन जागरण शक्ति संगठन के साथ जुड़कर अपने क्षेत्र में सामाजिक मुद्दों पर काम कर रहे हैं।

    View all posts

One response to “अररिया, बिहार के 14 वर्षीय कुनाल की मौत के जिम्मेदार कौन?”

Leave a Reply to कुनाल कुमार की बीमारी का ईलाज ना हो पाने का ज़िम्मेदार कौन? – Mithun's websiteCancel reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading