ଜ୍ୟୋତି ଜୋଜୋ:

ପ୍ରିୟଦର୍ଶିନୀ ମହିଳା ମହାବିଦ୍ୟାଳୟ ରେ ପଢୁଥିବା ମୁଁ ଜଣେ ଛାତ୍ରୀ। ପ୍ରତି ବର୍ଷ ପରି ଏ ବର୍ଷ ମଧ୍ୟ ଆମ ମହାବିଦ୍ୟାଳୟ ରେ ମହିଳା ଦିବସ ପାଳନ କରାଗଲା । ସମସ୍ତ ଛାତ୍ରୀ ଏବଂ ଅଧ୍ୟାପିକା ମାନେ ଏକତ୍ରିତ ହୋଇ ମହିଳା ଦିବସ କୁ ପାଳନ କଲୁ। କୋରୋନା ମହାମାରୀ ଯୋଗୁଁ ସାବଧାନତା ବରତି, ଦୂରତା ବଜାୟ ରଖି, ମାସ୍କ ବ୍ୟବହାର କରି ନିଜ ସୁରକ୍ଷା କୁ ଧ୍ୟାନ ଦେଇ ଆମେ ମହିଳା ଦିବସ କୁ ପାଳନ କଲୁ ।  ଆସିଥିବା ମୁଖ୍ୟ ଅତିଥି ମାନେ ନାରୀ ସମ୍ୱନ୍ଧ ଅନେକ ବିଷୟ ଆମକୁ ବୁଝାଇଲେ । 

ଆଜିର ଯୁଗରେ ନାରୀ ନିଜ ଚେଷ୍ଟା ବଳରେ ବହୁତ ଉନ୍ନତି କରୁଛି । ପାଠ, ଖେଳକୁଦ, ଚାଷ, ରୋଜଗାର କ୍ଷେତ୍ରରେ ନାରୀ ମଧ୍ୟ ନିଜକୁ ନିୟୋଜିତ କରି ସଫଳ ହେଉଛନ୍ତି । ଆଇନ, ଅଧିକାରରେ ମଧ୍ୟ ନାରୀ ପାଇଁ ବିଶେଷ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରାଯାଇଛି । ସମାଜ ରେ ପରିଚୟ ମିଳି ଥିବାରୁ ଆଜି ନାରୀ ନିଜ କୁ ଧନ୍ୟ ମନେ କରୁଛି । ଯେତେ ବ୍ୟବସ୍ଥା, ଆଇନ, ଅଧିକାର ଥିବା ସତ୍ବେ ଆଜି ବି ନାରୀ ନିର୍ଯାତନା ର ଶିକାର ହେଉଛନ୍ତି । ଯୁଗ ଯୁଗ ରୁ ନାରୀ ସାମାଜିକ ନିର୍ଯାତନା ଓ ଘରୋଇ ନିର୍ଯାତନା ର ଶିକାର ହେଉଛନ୍ତି । ଆଜି ଏତେ ସବୁ ସୁବିଧା ଥାଇ ମଧ୍ୟ ନାରୀ ନିଜ କୁ ଅସୁରକ୍ଷିତ ମନେ କରୁଛି ବା ଅସୁରକ୍ଷିତ ଅଛି କହିଲେ କିଛି ଭୁଲ ହେବନି ।

ଆଜି ହେଉଛି ମହିଳା ଦିବସ। ଆଜି ଦିନଟି ମହିଳାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦିଆଯାଏ। ତାଙ୍କ ନିଜର ଚେଷ୍ଟା ବଳରେ ଜଣେ ନାରୀ ବା ମହିଳା ନିଜକୁ ସୁଦକ୍ଷ ର ପରିଚୟ ଦେଇ ପାରିଛି। ଆଜିର ବିଜ୍ଞାନ ଯୁଗରେ  ମଣିଷ ନିଜର ଭାବନା ପ୍ରକାଶ ପାଇ ଅନେକ ପ୍ରକାର  ୱାଟସପ, ଫେସବୁକ୍, ୟୁଟୁବ ର ବ୍ୟବହାର କରୁଛି। ମୋବାଇଲ ରେ କଥା ହୋଇ  ନିଜର ଭାବନା ପ୍ରକାଶ କରି ପାରୁଛି । କିନ୍ତୁ ଜଣେ ନାରୀ ତାର ନାମ ଯିଏ କି ମା, ଭଉଣୀ, ତାଙ୍କୁ ତ ଏ ସମାଜ ବ୍ୟବହାର କରୁଛି। ନାରୀ ତାର ଭାବନାକୁ ପ୍ରକାଶ କରିବା ପାଇଁ କିଛି ବି ନାହିଁ। ତାକୁ ଭୟ ଲାଗେ ଏ ସମାଜ କଣ କହିବ, ଘର ଲୋକେ କଣ କହିବେ। କହିବାକୁ ମଧ୍ୟ ତାର ସାହାସ ନ ଥିବ କାହିଁକି ନା ଏ କର୍ମ ମୟ ସମାଜ ରେ ସେ ନିଜ କୁ ନିଜେ ବାନ୍ଧି ହୋଇଯାଏ। ତାର ଆଖିର ଲୁହ କୁ କାହାକୁ ଦେଖା ଯାଏନି। ନିଜର ପରିଚୟ ତିଆରି କରିବା ପାଇଁ ଯେତେ ମନ ରେ ଇଚ୍ଛା ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଅର୍ଥ ସମସ୍ୟା ବାଧକ ହୋଇଥାଏ। ନାରୀ ନିଜର  ଇଚ୍ଛା କୁ ଭୁଲିଯାଇ ତାର ଘର ପରିବାରର ସବୁ ସୁଖ ଦୁଃଖର ଭାଗୀଦାର ହୋଇଥାଏ। ପରିବାର, ସମାଜ ଆଦେଶ ଦେଇଥାଏ । 

ନାରୀ  ବିଜ୍ଞାନ ଯୁଗର ରୋବୋଟ ଭଳି ତାଙ୍କ ଆଦେଶକୁ ମନି ଚାଲି ଥାଏ। ନାରୀ ତା ଜୀବନରେ ପରିବାର ର ଖୁସିରେ ଖୁସି ହୋଇଥାଏ। କିନ୍ତୁ ନାରୀ ର ଦୁଃଖ କୁ କାହାକୁ ଦେଖା ଯାଏନି। ଶାଶୂଘରେ ନାରୀ ଦ୍ଵାରା କିଛି ବି ଭୁଲ ହେଲେ ତାକୁ କୁହାଯାଏ ମା ବାପା କିଛି ଶିକ୍ଷ୍ୟା ଦେୟି ନାହାନ୍ତି। ସମସ୍ତଙ୍କୁ ବୁଝିବା କଥା ଶିକ୍ଷ୍ୟା ର ସମାପ୍ତ ନାହିଁ । ବିଜ୍ଞାନ ଯୁଗରେ ଆଜିବି ନାରୀ ନିଜକୁ ଏକା ମନେ କରୁଛି। ସବୁ ସୁବିଧା ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ନିଜକୁ ଅସୁରକ୍ଷିତ ମନେ କରୁଛି।ସମାଜରେ ତାର ପରିଚୟ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ନିଜକୁ ଅସହାୟ ମନେ କରୁଛି। ନାରୀ ମାନଙ୍କ  ପାଇଁ ଯେତେ  ଅସୁବିଧାକୁ ସୁବିଧା କରାଗଲେ ମଧ୍ୟ ଆଜିର ଦିନରେ ନାରୀ ଅସୁରକ୍ଷିତ । ସେଥିପାଇଁ ପ୍ରଥମେ ପରିବାର ରେ ନାରୀ କୁ ସମ୍ମାନ ଦିଅ, ସମାଜ ରେ ନାରୀ କୁ ସମ୍ମାନ ଦିଅ, ପରେ ୱାଟସପ, ଫେସବୁକ୍ ଆଦି ନାନା ପ୍ରକାର ଆପ୍ ମାନଙ୍କରେ ନାରୀ ସୁରକ୍ଷା ଭିଡିଓ ବନେଇବା ଅତି ସହଜ ଅଟେ କିନ୍ତୁ ନାରୀ କୁ ସୁରକ୍ଷା ଦେବା  କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ମଧ୍ୟ ହେବା ଜରୁରୀ। ଯେପରି ନାରୀ ନିର୍ଭୟ ରେ ନିଜର ପରିଚୟ ପାଇ ପାରିବ। ସମାଜ ରେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ମଣିଷ ର ସୁନ୍ଦର ଭାବନା ହିଁ ନାରୀ ର ପରିଚୟ ଦେଇ ପାରିବ। “ଯଦି ଭକ୍ଷକ ହେବ ରକ୍ଷକ ନାରୀର  ପରିଚୟ ହେବ କ୍ଷୟ”।

हिन्दी अनुवाद

ज्योति जोजो:

मैं राउरकेला में स्थित प्रियदर्शनी महिला कॉलेज की छात्रा हूं। हर साल की तरह इस साल भी हमारे कॉलेज के सभी छात्राओं और अध्यापक-अध्यापिकाओं ने एक साथ मिलकर महिला दिवस मनाया। मैं भी इसमें शामिल थी। इस दौरान कोरोना महामारी का खयाल रखते हुए महिला दिवस मनाते वक्त हमने शारीरिक दूरी रखकर और मास्क पहनकर सुरक्षा का ध्यान रखा। कार्यक्रम में शामिल हुए मुख्य अतिथियों ने महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों पर अपनी बात रखी। 

आज के समय में महिलाएं अपने प्रयासों के माध्यम से बहुत प्रगति कर रही हैं। महिलाएं शिक्षा, खेल, खेती, रोज़गार के क्षेत्र में भी सफल हैं। महिलाओं के अधिकार और उनके बचाव के लिए कानून मे विशेष प्रावधान हैं। पिछले कुछ समय में कई अलग-अलग क्षेत्रों में महिलाओं ने समाज में अपनी खास पहचान बनाई है। लेकिन विडम्बना यह है कि सभी कानूनों और अधिकारों के बावजूद, अधिकांश महिलाओं को अभी भी दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ रहा है। सालों से महिलाएं सामाजिक और घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं, ऐसा प्रतीत होता है मानो तमाम नियम और कानून बस दिखावा भर हैं। 

आज विज्ञान के दौर में जहाँ मानव अपने भावों और विचारों को व्यक्त करने के लिए बड़े स्तर पर तकनीक का प्रयोग कर रहा है और व्हाट्सअप, फेसबुक, यूट्यूब जैसे प्लैटफॉर्म पर मोबाइल के जरिये अपने विचार व्यक्त कर रहा है। वहीं माँ, बहन और पत्नी आदि किरदारों तक सीमित रखकर समाज अभी भी महिलाओं का बस उपयोग ही कर रहा है। अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए महिलाओं के पास ना ही इन माध्यमों तक पहुँच है और ना ही इन्हें प्रयोग करने की आज़ादी। उसे डर है कि समाज क्या कहेगा, घर के लोग क्या कहेंगे? 

इसी तरह घर के अंदर भी उसे अपनी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने की आज़ादी नहीं है। वह बोलने का साहस भी नहीं कर पाती है, बस अपनी भावनाओं को दबाकर परिवार की सेवा करने में ही लगी रहती है। उसकी आंखों के आंसू कोई नहीं देख पाता। अगर वो अपनी स्थिति से निकलना भी चाहे तो समाज उसे निकलने नहीं देता, आर्थिक नियंत्रण भी अपने हाथों में न होने के कारण वह खुद भी इनसे बाहर निकल नहीं पाती। मजबूरन महिला अपनी इच्छाओं को भूल अपने परिवार की खुशियों और दुखों को ही अपनी खुशी और दुख के रूप में अपना लेती है। विज्ञान के युग में वो एक रोबोट की तरह है जो दूसरों की आदेश को मानते जाती है। ससुराल में अगर महिला से कोई गलती  हो जाती है तो उसे कहा जाता है कि उसके माता-पिता ने उसे कुछ नहीं सिखाया। 

शिक्षा के प्रसार से लोगों को महिलाओं की तकलीफ़ें शायद अब समझ आने लगी हैं लेकिन बस इतना ही काफी नहीं है। आज भी नारी खुद को अकेली महसूस करती है। न्यायिक व्यवस्था होने पर भी असुरक्षित महसूस करती है। समाज में एक पहचान बना लेने के बाद भी वो कई मौकों पर खुद को असहाय पाती है। इसलिए हमारा काम केवल जानना और समझना भर नहीं है, बल्कि महिलाओं के प्रति अपने आचरण को बदलना भी ज़रूरी है। केवल व्हाट्सअप, फेस्बूक मे महिलाओं के बारे पोस्ट डालने से बात नहीं बनेगी। सबसे पहले अपने परिवारों मे माँ और बहनों को सम्मान दें, उनको समझ कर उनके साथ खड़े हों। समाज मे हर मनुष्य का सुंदर स्वभाव ही नारी को अपना परिचय दे सकता है। इसीलिए कोई कहा है  “यदि भक्षक ही बनेगा रक्षक तो नारी की पहचान का होगा क्षय।”

Author

  • ज्योति जोजो, ओडिशा के झारसुगुड़ा ज़िले से हैं और उड़िया सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं। वह अभी राउरकेला में स्थित प्रियदर्शनी महिला कॉलेज से ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रही हैं।

    View all posts

Leave a Reply

Designed with WordPress

Discover more from युवानिया ~ YUVANIYA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading