पारंपरिक जीवन शैली को बचाने के लिए संघर्षरत है बांका, बिहार का संथाल समुदाय

बाबूलाल बेसरा:

जीते भोर हंसाईबो खेलायबो, मोरेलो गो माय कोइना सोंग।

मोरेला गो माय धोरेरो आगीन, पोरेरो कपड़ा, बोनेरो काठी। 

गमा केरा एका कोदार माटी, हेलो गो माय हमारा सोंगे।

यह गीत उस समय गाते हैं जब खेतों में काम कर या मजदूरी करके शाम को घर वापस आते हैं। गांव में मिलजुल कर मांदर, नगाड़े, बासुरी और झाँझ के साथ महिला-पुरूष मिलकर नाचते गाते हैं। इसे “लांडगडे” कहते हैं, यह लांगा और एडे संथाली शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है, थकान को भूलना। बिहार से झारखंड के अलग होने के बाद बिहार के बांका जिले में अन्य जिलों की अपेक्षा आदिवासी संथाल समुदाय की जनसंख्या अधिक है, यहां संथाल समुदाय के साथ-साथ कोल खैरा में पहाड़िया कोडा जनजातीय समुदाय के लोग भी निवास करते हैं, जो अलग-अलग भाषा बोलते हैं। इनके अलावा सवर्ण, पिछड़े और हरिजन समुदाय के ओग भी यहां बसे हैं जिनके अलग-अलग रिती-रिवाज हैं।

यहां मैं खासकर संथाल समुदाय का चर्चा कर रहा हूं, इनके जीने का एक मात्र श्रोत खेती और मज़दूरी है। पुराने ज़माने की बात है, एक दिन एक इंसान मज़दूरी करने गया था। देर शाम लौटने के बाद घर में घनघोर अंधेरा हो चुका था। उस समय लकड़ी के एक औज़ार से घर्षण से आग पैदा की जाती थी, जिसे स्थानीय भाषा में “धाडरा” कहते हैं। इसे घर के चूल्हे के पीछे रखा जाता था, ताकि वह गरम रहे। थका-मांदा इन्सान रोशनी जलाने की चाह में उसकी खोज करने लगा। लेकिन सुनसान घर पाकर पहले से ही अवारा जानवर अपने-अपने हिसाब से उनके लिए अनुकूल जगहों पर पहुँच चुके थे। ये जानवर कुत्ता, बिल्ली, मुर्गा और गधा थे।

थके-मांदे व्यक्ति ने ज्यों ही धाडरा खोजने के लिए चूल्हे के पीछे हाथ डाला, त्यों ही बिल्ली ने अपने पैने पंजों से उनके हाथों को लहू-लुहान कर दिया। जब उसने घर से निकलना चाहा तो दरवाजे के पास बैठा कुत्ता शूर सुनकर जग गया और उस व्यक्ति के पैरों में अपने पैने दाँत गड़ा दिए। आगे बढ़ने पर आंगन में खड़े गधे ने अपने पैरों से आदमी के पीठ पर लात जमा दी और फिर वह व्यक्ति भागने लगा। इस सबसे पैदा हुए शोरगुल को सुन छत पर बैठा मुर्गा अपने पंख फड़फड़ाने लगा। पंख फड़फड़ाने की आवाज उसे पकड़ो-पकड़ो की आवाज़ सुनाई दी और वह भोला-भाला व्यक्ति, बिना आगे-पीछे की सोचे सदा के लिए उस घर को छोड़कर चला गया। लांडगडे के अवसर पर इन्हीं कहानियों और इतिहास को गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है।

ओलोक-पाडहाक चेदमेसे जिबोनरे, अकील तेदोम खाटो गेया रे।

देखो सेरे देशमाझी परगाना मपानी, बुद्ध बीनू जुमी हुबी गेल।

भावार्थ: लिखना-पढ़ना सीखो, अपनी जीवन में ज्ञान से तुम पीछे हो।

देखो सारे गांव-परगना, देश में जान के बिना डूब गया।

इस गीत के माध्यम से मैं यह बताना चाहता हूँ कि दूसरे समुदाय के लोगों ने संथाल समुदाय के लोगों की ज़मीन को छीन लिया। इन लोक गीतों को, बुजुर्गों की कही कहानियों को सुनकर और लिखित इतिहास को पढ़कर और वर्तमान हालातों को देखते हुए मुझे यही एहसास होता है कि संथाल समुदाय के साथ बिल्कुल ऐसा ही हुआ है। आजादी के 70 सालों के बाद भी संथाल समुदाय की स्थिति में कोई ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है। ज़मीन छीने जाने का मुख्य कारण अपने समुदाय के बुद्धिजीवी लोगों की बात न मानकर अन्य गैर आदिवासी समुदाय जिन्हें हम “दिकू” कहते हैं, की बातों पर विश्वास करना और नशा करना यानि शराब पीना है। जब से मुझे होश है, शिक्षा तो हमारे आदिवासी समुदायों में लगभग शून्य ही है। हमारे लोग भोले इंसान तो हैं, लेकिन इसी भोलेपन के कारण वह शोषण का शिकार भी बन जाते हैं। धर्म परिवर्तन, अपने रीति-रिवाज, पर्व-त्योहार और पहनावे की अनदेखी से हम अपनी संस्कृति ही खो देते हैं और इतिहास मिटते नजर आते हैं।

फाल्गुन और चैत्र महीने में जब वनों में विभिन्न पेड़-पौधों में फूल आ जाते है, उस समय हम बाहा पर्व मनाते हैं। पुराने समय में इसे बड़े हर्ष उल्लास से नियम-पूर्वक मनाया जाता था, लेकिन आज-कल गाँव के बस पाँच-सात व्यक्ति मिलकर सखुवा वृक्षों के कुँज (जिसे जाहेर थान कहते हैं) पर फूल चढ़ा देते हैं। इस त्यौहार में युवक-युवती बहुत कम ही भाग लेते हैं, ऐसे अन्य पारंपरिक पर्व-त्यौहार भी मिटते नज़र आ रहे हैं।

फोटो आभार: शेखर मार्डी

2010-11 में आदिवासियों एवं वनवासियों के कुल 1968 वन अधिकार दावा पत्रों में केवल नौ लोगों के दावे मंजूर हुए और भारी संख्या में निरस्त कर दिए गए। इसे देखते हुए मैंने 21 अगस्त 2018 को बांका जिले के कुछ साथियों के साथ मिलकर आदिवासी मजदूर किसान मुक्ति वाहिनी नाम के एक संगठन के निर्माण का काम शुरू किया। शुरूआत में हमें अनेक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। हम लोग 3-4 साथी मिलकर गांव-2 जाते तो लोग हमें ‘पार्टी वाले’ और ‘नक्सली’ कहते। एक दिन बेलहर प्रखण्ड के चिन्गुलिया गांव गये तो लगभग एक सौ से ज़्यादा लोग जमा हुए, जिन्हें हम लोगों ने वनाधिकार कानून के बारे में जानकारी दी और अगली मीटिंग की तारीख तय कर वापस लौटे।

दूसरी बार जब हम लोग वहां पहुंचे तो केवल 10-20 लोग ही मीटिंग के लिए जमा हुए। कारण पूछने पर एक व्यक्ति ने कहा कि आप लोग ‘पार्टी वाले’ लोग हैं, इसलिए डर से गांव के लोग घर से बाहर नहीं निकलते हैं। बात आगे बढ़ाते हुए हमने लोगों से पूछा कि पार्टी वाले लोगों को आप लोगों ने देखा है क्या? तो उन लोगों ने कहा कि हाँ उन लोगों के पास हथियार होते हैं और वह रात को मीटिंग करते हैं। यह सुनकर हम लोगों ने कहा कि अच्छी बात है, हमारे पास भी हथियार हैं और हम तो रात-दिन मीटिंग करते हैं। यह कहते हुए वनाधिकार कानून से संबधित पर्चे हमने लोगों को दिए और कहा कि यह वनाधिकार कानून ही हमारा हथियार है। आज इस गांव के लोग जागरूक हो गये हैं और बार-बार हमें बुलाते भी हैं।

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  • बाबूलाल बेसरा, बिहार के बांका ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। अपने क्षेत्र के संगठन- आदिवासी मजदूर किसान मुक्ति वाहिनी के साथ मिलकर अपने समुदाय के लिए काम करते हैं।

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