एमलॉन तिर्की:

कई अड़चनों और लंबे संघर्ष के बाद ओडिशा के वरपालि गाँव में लोगों ने खुद से सामुदायिक हक के लिए दावा भरने की प्रक्रिया शुरू करने की ठान ली है। लोगों के सामुदायिक वन अधिकारों को पूरी तरह से नज़रअंदाज करते हुए, यहाँ के प्रशासन ने कुछ ही जगहों पर केवल व्यक्तिगत वन अधिकार की स्वीकृति पर ज़ोर दिया है। यह, वन विभाग को अपनी इच्छा के अनुसार लोगों के जंगल में प्रवेश पर रोक लगाने का अवसर देता है। हाल ही में कोरोना बीमारी के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान भी वन विभाग ने आदिवासियों द्वारा जंगल से वन उपज संग्रह करने पर रोक लगाई थी। इस दौरान बाज़ार बंद होने के कारण लोगों की आजीविका पर भी भारी असर पड़ा था।

यहाँ के आदिवासी और अन्य वनाश्रित समुदाय अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए पूरी तरह से जंगल पर निर्भर हैं। लोगों का वन विभाग पर पहले से ही गुस्सा था और उनके इस फैसले से लोगों की निराशा और बढ़ गई। कई जगहों पर लोगों ने इसका पुरज़ोर विरोध किया। स्थानीय संगठन के माध्यम से कई राज्यों में लोगों ने विरोध जताते हुए अपने-अपने इलाके में स्थानीय प्रशासन व मुख्यमंत्री को ज्ञापन दिया जिसके फलस्वरूप वनोपज संग्रह पर लगा प्रतिबंध हटा दिया गया।

लेकिन लोगों की यह सफलता अस्थायी है, क्योंकि आगे चलकर वन विभाग कभी भी ऐसे ही प्रतिबंध फिर से लगा सकता है। लोगों को भी यह समझ आ गया कि जब तक सामुदायिक अधिकार पत्र उनको नहीं मिलता तब तक वन विभाग लगातार उन्हें परेशान करता रहेगा। इसलिए देशभर में लगे लॉकडाउन और कोरोना महामारी के खतरे के बावजूद जंगलों मे गाँव के पारंपरिक अधिकार के लिए सामुदायिक वन अधिकार का प्रक्रिया नये सिरे से शुरू करना तय किया गया।

दावा भरने का प्रक्रिया की शुरआत हाल ही में क्यूं न हुई हो, लेकिन अपने अधिकारों के लिए संघर्ष बहुत पहले से शुरू हो चुका था। सभी गांवों की संघर्ष की अपनी अलग ही कहानी है।

ऐसा ही एक गाँव है बरपालि, जहां पर लंबे संघर्ष के बाद सामुदायिक वन अधिकार प्रक्रिया की शुरुआत हुई है। बरपालि, बलांगीर जिले के रेंगाली पंचायत मे स्थित बरतिया गाँव का एक छोटा सा पाड़ा (टोला) है जो गंधमार्दन रिज़र्व फॉरेस्ट के इलाके में आता है। करीब 30 परिवार के इस गांव में सबर और कोल आदिवासी समुदाय रहते हैं।

रिजर्व फॉरेस्ट में होने की वजह से वन विभाग और बरपालि के लोगों के बीच टकराव होता ही रहता था। कई बार रेंजर और फॉरेस्ट गार्ड, ज़मीन खाली करने को लेकर धमकाते तो कभी मारपीट करते। महिलाओं के ऊपर अत्याचार करते और पालतू जानवर उठा ले जाते। ज़मीन से हटाए जाने के डर से लोग अपनी मुर्गी, बकरी या अन्य जानवर अफसरों को दे देते थे। ज़िंदाबाद संगठन से जुड़े गांव के प्रधान सिकारी सबर, वन विभाग के अधिकारियों-कर्मचारियों को कुछ भी नहीं देते थे और गांव वालों को भी देने से मना करते। वह संगठन की मदद से गाँव वालों को एकजुट करते और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहन करते। इस वजह से वन विभाग ने उन पर और अन्य लोगों पर फर्जी केस लगा दिए। सिकारी सबर कई बार मार खा चुके हैं और कई बार उन्हें जेल भी जाना पड़ा। इन सबके बावजूद गांव के लोग डटे रहे।

वन अधिकार कानून आने के बाद, संगठन द्वारा कई बार लोगों को कानूनी जानकारी दी गई और व्यक्तिगत अधिकार के दावे भी भरे गए, लेकिन इन्हें भी वन विभाग ने खारिज कर दिया। इस गांव के लगभग 7 परिवारों को ही व्यक्तिगत वन अधिकार का पट्टा मिल पाया है।

उसी समय से सामुदायिक वन अधिकार दावा भरे जाने की प्रक्रिया भी शुरू की गई। वन विभाग, वन सुरक्षा समिति के माध्यम से लोगों को भड़काने का काम लगातार ही कर रहा था। बरपालि गांव, सुनामुंडी और बरतिया दोनों गावों के बीच में है, दोनों ही गांव के लोगों ने बरपालि के लोगों को सामुदायिक दावा भरने नहीं दिया। उन्हें डर था कि सामुदायिक दावा भरने से उनके गाँव की कुछ ज़मीन भी उनके हाथ से चली जाएगी। एक बार जब बरपालि में संगठन की मीटिंग का आयोजन किया गया तो मीटिंग के दौरान सुनामुंडी और बरतिया के लोग वन सुरक्षा समिति के भड़कावे मे आकर संगठन के कार्यकर्ताओं को पीटने आ गए थे। इस वजह से तुरंत ही मीटिंग रोकनी पड़ी और गाँव के लोगों को संगठन कार्यकर्ताओं को बचाकर दूसरे गाँव में ले जाना पड़ा। इस दौरान संगठन को ये बात बहुत अच्छी तरह से समझ आ गई कि वन अधिकार कानून की समझ केवल सामुदायिक दावा भरने वाले गांव को ही नहीं, बल्कि उसके नज़दीक अन्य गांवों के लिए भी ज़रूरी है। 

इसके पश्चात कानूनी जानकारी की एक लंबी प्रक्रिया पूरे क्षेत्र मे चलाई गई। जिससे लोगों में यह समझ बढ़ी है कि वन अधिकार कानून, किसी का अधिकार छीनने की नहीं बल्कि अधिकार को मान्यता देने की बात करता है। आज बरपालि गाँव के साथ नज़दीकी गावों के लोग भी नए सिरे से सामुदायिक वन अधिकार के लिए दावा भरने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं।

ऐसी ही 2 ट्रेनिंग का आयोजन, गाँव के मुखिया और वॉलेंटियर के साथ अक्टूबर 2 से 3 अक्टूबर को कांटाबांझी में और 30 से 31 अक्टूबर को तूरेकेला ब्लॉक के गंजाउदार गाँव मे किया गया। इन दोनों ट्रेनिंग मे 31 गाँव के करीब 60 लोग शामिल हुए। ट्रेनिंग मे वन अधिकार कानून की जानकारी के साथ-साथ सामुदायिक अधिकार दावा फॉर्म भरने की प्रक्रिया और GPS मैपिंग कैसे की जाती है को व्यवहारिक तौर पर बताया गया। कोरोना बीमारी के चलते शारीरिक दूरी बनाए रखने और अन्य सावधानियों का भी खास खयाल रखा गया।

ट्रेनिंग के बाद इन्ही वॉलेंटियर ने, गाँव के मुखिया और संगठन के सहायता से गांव मे कई बार मीटिंग और ग्राम सभा का भी आयोजन किया। साथ ही सामुदायिक वन अधिकार दावा फॉर्म भरने की प्रक्रिया को भी शुरू किया गया। खपरखोल, मूरीबहाल, टीटलागढ़, तूरेकेला, बेलपारा और बोंगोमुंडा, इन 6 ब्लॉक के करीब 31 गांवों ने दावा भरने की प्रक्रिया शुरू की है। इसमें GPS मैपिंग और संयुक्त सत्यापन (Joint Verification) होना अभी बाकी है।

हकों के लिए लंबे संघर्ष और कानूनी प्रक्रिया से गाँव मे लोगों का आत्मविश्वास बढ़ा है। गांव के लोग वन अधिकार की प्रक्रिया के साथ गाँव में वन और अन्य प्रकृतिक संसाधनो का प्रबंधन, नियंत्रण और संरक्षण का काम खुद से करने की ओर बढ़ रहे हैं। 

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  • एमलॉन, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ काम कर रहे हैं। 

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