(बारेली लोकगीत)

निवी गोफन पेवो पागडो रे, आमु वासी ने भीलड़ा,
काव्यो बुले लेदा रे ,आमु वासी ने भील।
खेड़ी – खेडी ने रसे वाव्या रे आमु वासी ने भीलेडा!
वावी जुवार उग्यो बाजरो रे आमु वासी ने भीलड़ा!
निवी गोफन पेवो पागडो रे आमु वासी ने भीलड़ा।
बाजरा कुवेपने आया रे आमु वासी ने भीलड़ा!
कुवपी – कुवपी ने रस वव्या रे आमु वासी ने भीलड़ा!
नेदी – नेदी ने रस ववी रे आमु वासी ने भीलड़ा!
निवी गोफन पेवो पागडो रे आमु वासी ने भीलड़ा।
बाजरा नेसवने आया रे आमु वासी ने भीलड़ा!
तीन बेवी ने मांडवो घाल्या रे आमु वासी ने भीलड़ा! 
निवी गोफन पेवो पागडो रे आमु वासी ने भीलड़ा! 
हा हूरो करीने टूहेसू रे आमु वासी ने भीलड़ा!
बाजरा खुड़ने ने आया रे आमु वासी ने भीलड़ा!
खुड़ी – खुड़ी ने रस ववी रे आमु वासी ने भीलड़ा!  
निवी गोफन पेवो पागडो रे आमु वासी ने भीलड़ा।
गाड़े – गाड़े लाविने रस वाव्यो रे आमु वासी ने भीलड़ा! 
मोसी – मोसी ने रस वाव्यो रे आमु वासी ने भीलड़ा!  
निवी गोफन पेवो पागडो रे आमु वासी ने भीलड़ा।
दवी – दवी ने रस ववी रे आमु वासी ने भीलड़ा! 
खाई – खाई ने ताकत आवे रे आमु वासी ने भीलड़ा!
निवी गोफन पेवो पागडो रे आमु वासी ने भीलड़ा।

यह हमारे क्षेत्र का एक लोकगीत है जो पहले से ही गाया जाता है, इसे लिखने में मेरी मदद मेरे दोस्त गुड्डू ने की है। यह गाना नवाई त्यौहार पर गाया जाता है। खरीफ की फसल पकने पर उसे खाने से पहले प्रकृति और पुरखों को यह पहले दिया जाता है, फिर हम सब उसे खाते हैं।

इस गीत में कहा गया है कि हम यहाँ निवास करने वाले भील हैं, हरे रंग की गोफन (एक स्थानीय हथियार) और सर पर पीले रंग की पगड़ी (साफा) हमारा अपना पहनावा है। हम सब मिलकर खेतों में समूह में काम कर रहे हैं। सबसे पहले हम बैल लेकर आए, फिर उस बैल से खेत की जुताई की और बाजरा बोया। बहुत अच्छे से फसल की देखभाल की, कुल्पा चलाया, निंदाई की और बाजरा पकने पर उसके दानो को चिड़ियों से बचाया। फिर बाजरे को काट उसके दाने को निकाला, उस दाने का घट्टी (चक्की) से आटा निकाला और उसकी रोटी बनाकर खाई, जिससे हमे बहुत ताकत मिली।

इस गीत में बाजरे की फसल पकने की पूरी प्रक्रिया का वर्णन है। खेत खेड़ना, कुलपना, निंदाई करना, चिड़ियों से बचाना। फिर पकने पर गाड़ी भरके लाना, दाना निकालना और अंत में खाकर शरीर की ताकत बढ़ाना। इस गीत को गाँव के लड़के भारी आवाज़ में गाकर रात भर नाचते हैं।

फोटो आभार – फेसबुक प्रोफाइल आधारशिला शिक्षण केंद्र

Author

  • सुखलाल, मध्य प्रदेश के बड़वानी ज़िले से हैं और सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़े हैं। वह वहाँ के स्थानीय मुद्दों और छात्र मुद्दों पर आदिवासी छात्र संगठन के साथ जुड़ कर काम कर रहे हैं।

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