एलीन लकड़ा

वर्तमान में जिस रफ्तार से सरकारी संस्थान, संसाधन और साधन/सेवाओं का निजीकरण और कोर्पोरेटीकरण हो रहा है, ऐसे लगता है देश के सभी समस्याओं का हल इसी में है। नए कानून और नीतियाँ बनाकर यह प्रक्रिया नीतिगत तरीके से हो रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली और यातायात सेवा में प्राइवेट प्लायेर्स को जगह मिल ही गई है। नीति आयोग ने वनों को पुनर्जीवित करने के लिए निजीकरण को ही एक रास्ता बनाने का सुझाव दिया है। अब कृषि क्षेत्र में नए तीन कानून के तहत प्राइवेट प्लेयर्स के हाथों में बड़ी आसानी से आ गई।

कृषि क्षेत्र के ये तीन नए कानून हैं, कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2020, कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार अधिनियम 2020 और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020।

कृषक उत्पाद व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम कृषि उपज के व्यापार के लिए निजी बाज़ारों को बढ़ावा देता है। केंद्र सरकार इसे किसानों के लिए अनुकूल बता रही है क्योंकि वह अब जहां चाहे अपनी उपज बेच सकेंगे, लेकिन सवाल यह है कि कितने किसान दूर के बाजारों में अपने उत्पाद बेचते हैं और ऐसा करने के लिए उनके पास पर्याप्त संसाधन भी हैं? 80% से अधिक किसानों के पास 2 हेक्टेयर से अधिक की कृषि भूमि नहीं है और अधिनियम में कोई ऐसा प्रावधान (clause) नहीं है जहां कृषि उपज बाज़ार समिति या एपीएमसी के बाहर की कीमतों को विनियमित/नियंत्रित कर सके, एपीएमसी को ही आम भाषा में ‘अनाज मंडी’ या ‘कृषि मंडी’ के रूप में जाना जाता है। देश में करीब 7000 एपीएमसी हैं जिनका व्यापार और रोज़गार का अपना एक पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) है। अनाज बेचने ओर खरीदने वालों के अलावा माल ढुलाई करने वाले, हिसाब-किताब वाले अकाउंटेंट, वहाँ छोटा-मोटा सामान बेचने वाले लोगों सहित अनेक लोगों को इन मंडियों से रोज़गार मिलता है।

फोटो आभार : म.प्र. राज्य कृषि विपणन (मंडी) बोर्ड

यह अधिनियम एपीएमसी को बायपास करते हुए बिचौलियों या व्यापारियों या निजी कंपनियों को सीधे किसानों या अन्य निजी व्यापारिक केंद्रों से खरीदने की अनुमति देता है। एपीएमसी या अनाज मंडियाँ तुरंत बंद नहीं होगी, लेकिन जब अधिकांश खरीद-बिक्री या कहें कि व्यापार इन मंडियों के बाहर हो रहा होगा, तो फिर इनकी ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी। एपीएमसी मंडियों में जो उत्पाद किसान बेचता है उन्हीं पर उसे न्यूनतम समर्थन मूल्य मिल पाता है, इसलिए यह न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी के लिए भी सीधा तौर पर खतरा है। इस अधिनियम से निश्चित रूप से निजी कंपनियों और व्यापारियों को लाभ होगा, क्योंकि अब उन्हें खरीदने के लिए किसी लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होगी। उन्हें राज्यों को कृषि उत्पाद खरीदने के लिए करों का भुगतान नहीं करना होगा। समय के साथ उन्हें कृषि उत्पाद के कीमतों को विनियमित/ नियंत्रण करने की क्षमता भी मिलेगी।

कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर समझौता 2020 अधिनियम से अनुबंध (कांट्रैक्ट) खेती या ठेके की खेती के लिए रास्ता साफ हो जाएगा, और अब निजी कंपनियां किसानों के साथ सीधे संपर्क कर सकेंगी, साथ ही किसानों से सीधे खरीदने के लिए एक न्यूनतम दाम दिए जाने का प्रावधान भी नहीं रखा गया है। इससे किसानों को शुरुआत में लाभ हो सकता है, लेकिन समय के साथ कंपनियां अपनी इच्छा के अनुसार दरों की तय करेंगी। कंपनियाँ किसानों पर विशेष फसलों की खेती करने का दबाव भी बना सकती हैं, जिससे देसी फसलों, बीजों और खेती करने के तरीकों के खत्म होने का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है।

तीसरा अधिनियम आवश्यक वस्तु (संशोधन), अधिनियम 2020,के तहत आवश्यक वस्तुओं की सूची से अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू को हटा दिया गया है। यह अधिनियम माल की जमाखोरी को भी बढ़ावा देगा क्योंकि इसके अनुसार स्टॉक या भंडारण केवल तभी सीमित किया जा सकता है, जब तक कि खराब न होने वाले माल (नॉन-पेरिशेबल गुड्स) जैसे- अनाज, दाल, तेल-बीज आदि की खुदरा कीमत औसत से 50% से अधिक और खराब होने वाले सामान (पेरिशेबल गुड्स) जैसे फल, सब्जियां, आदि का खुदरा मूल्य औसत से 100% अधिक ना हो जाए। (खुदरा मूल्य वह मूल्य है जिस पर एक आम उपभोक्ता चीज़ों को खरीदता है।)

यह अधिनियम निजी कंपनियों के लिए अपने मनमर्जी से कीमतों के निर्धारण की व्यवस्था की नींव बन सकता है। यह कानूनी संशोधन इन खाद्य वस्तुओं के उत्पादन, भंडारण, परिवहन और वितरण को नियमित करेगा, साथ ही भारतीय नागरिकों की खाद्य सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा साबित होगा।

कुल मिलाकर ये तीनों कानून बड़े कारोबरियों के हित में हैं और किसानी के पेशे में लगे छोटे और मझोले किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए सबसे ज़्यादा घातक हैं। इस तरह से निजीकरण के रास्ते अपनाने पर सरकार को लग रहा कि देश की डूबती अर्थव्यवस्था में खेती ही एकमात्र ऐसा सेक्टर है जो लाभ में है। यह जानना हमारे लिए अति आवश्यक है कि निजीकरण से देश की अर्थव्यवस्था में सुधार लाने की आड़ में आर्थिक रूप से सम्पन्न वर्ग को ही फायदा पहुंचाने की नीति को अमल में लाया जा रहा है। इससे देश में गैर-बराबरी ही बढ़ेगी और हाशिये के लोगों की परिस्थितियां और खराब होंगी।

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  • एलीन, सामाजिक परिवर्तन शाला से जुड़ी हैं और दिल्ली की संस्था श्रुति के साथ लम्बे समय तक जुड़ी थीं। वह वर्तमान में रांची में रहती हैं और एक संस्था के साथ जुड़ कर काम कर रही हैं।

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