राकेश जाधव: लिखते-लिखते कोरे कागज ख़त्म हो गए थे, मैंने फ़टाफ़ट अपने ढीले कपड़े खूंटी पर लटकाए और झोला उठाकर… READ MORE
मिनाक्षी : क्या आज़ाद हैं हम…?बंधी तो नहीं हैं ज़ंजीरों में, फिर भी बंधे हुए हैं हम।डाली तो नहीं पाऊं… READ MORE
दीपिका माथुर और तन्नु : बहुत याद आती है, अपने अंदर छुपी उस छोटी-सी बच्ची की,जो शायद अब मर चुकी… READ MORE
युवानिया पत्रिका, युवाओं को उनकी सोच को कलमबद्ध करने का एक मंच देने का प्रयास है। इस पत्रिका के माध्यम से हम मुख्यतः युवा मन के विचारों को सामने लाना चाहते हैं। साथ ही आस-पास के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य पर युवाओं के विचारों को भी साझा करना चाहते हैं।
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